भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 428, कुल 610 में से

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पृष्ठ 428

परिच्छेद ] अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ४०६ नाम । तस्मात् क्षणिकत्वस्वीकारे तदनुगुणापोहादिसमस्तस्वीकारः, तदेकपरिहारे वा समस्ततदनुगुणपरिहार इति सर्वज्ञोऽपि नान्यथा प्रमातुं क्षमः । न च समस्ततदनुगुणपदार्थजातं कथारम्भे स्वशब्देनाभिधातुमुचितम्, तदैव शास्त्रप्रणयनप्रसङ्गात् , परिषदनपेक्षितत्वाच्च । न च तद्व्यतिक्रमोद्भावनाय समस्ततदनुगुणोहः परस्परस्य शास्त्रमनाश्रित्य शक्यः । न च तत्तदनुगुण- व्यतिक्रमे तदुपेक्षे वा तत्त्वप्रतिपत्तिजयाविति अकामेनापि तदधिकारप्रवृत्तं शास्त्रमेवाऽऽश्रयणीयमिति । तदेतदपेशलम् ; किं तदनुगुणं प्रमेयान्तरं यदनभ्युपगमे विरोधमुद्भावयेदि- त्युच्यते । द्वयमभ्युपगम्यं सम्भवति । एकं तावद्यदनभ्युपगमे कथैव प्रवर्तयितुमश- क्या, यथा प्रमाणादि सर्वकथकसिद्धम् । इतरत्तु प्रतिदर्शनसिद्धं किञ्चित्, यथा क्षणभङ्गेश्वरादि । तत्र यदि प्रथममभ्युपगम्यैव कथाप्रवृत्तिरिति तत्स्वीकारे क्षणिकत्व का स्वीकार करता हो, वह क्षणिकत्व के अनुगुण अपोह आदि सभीका स्वीकार करेगा । यदि वह एक क्षणिकत्व का अस्वीकार करेगा, तो उसके अनुगुण समस्त अपोहादि का भी अस्वीकार करना पड़ेगा । इसके अन्यथाकरण में परमेश्वर भी समर्थ नहीं है । क्षणिकत्व के अनुगुण अपोहादि सम्पूर्ण पदार्थों का कथाकाल में अभिधान नहीं हो सकता, कारण यदि सम्पूर्ण पदार्थों का उसी काल में अभिधान करें, तो उसी काल में शास्त्र का प्रणयन हो जायगा। फिर सम्पूर्ण के अभिधान को परिषद् चाहती भी नहीं है । विरोध के उद्भावन के लिए सम्पूर्ण तदनुगुण की ऊहा शास्त्र के आश्रयण के बिना हो भी नहीं सकती और क्षणिकत्व के अनुगुण अपोहादि का विरोध होने पर क्षणिकवादी का और अपोहादि व्यतिक्रम की उपेक्षा करने पर स्थिरवादी का तत्त्वनिर्णय या विजय हो ही नहीं सकती । अतः न चाहते हुए भी क्षणिकत्वादि के साधन में प्रवृत्त शास्त्र अवश्य मानना होगा । खंडन—यह मत सुन्दर नहीं है । कहिये, तदनुगुण अन्य प्रमेय कौन हैं, जिनके अनभ्युपगम में अपसिद्धान्त का उद्भावन हम करेंगे—ऐसा आप कहते हैं । कथा में दो ही बातें स्वीकार्य होती हैं । एक तो यह, जिसके अनभ्युपगम से कथा की प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती । जैसे—सब कथकों द्वारा सिद्ध प्रमाणादि । दूसरी प्रति- दर्शन से सिद्ध कुछ; जैसे क्षणभङ्ग, ईश्वर आदि । उनमें प्रथम प्रमाणादि के स्वीकार करने ५२

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