खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 429, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें४१० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय
पश्चात्तदनङ्गीकारोऽपसिद्धान्तः । तन्न ; स्वव्याघातकत्वेन तस्य भवद्भिरेव जातित्वाङ्गीकारात् । जातेश्च निरनुयोज्यानुयोगे निवेशात् । नापि द्वितीयः ; दर्शनभेदनियतं हि क्षणभङ्गादि यत्कथारम्भेऽभ्युपगन्तव्यं तत् किं तदभ्युपगमस्य प्रकृतसाध्यापोहाद्युपायतया, उत तन्नान्तरीकतया ? न प्रथमः ; क्षणभङ्गसाधनप्रस्तावे अपोहादि परित्यजतः सौगतस्यापसिद्धान्ताभावापत्तेः, तदभ्युपगमस्य तदनुपायत्वात् । अन्योन्याभ्युपगमोपायत्वे चान्योन्यविचारस्य निष्पत्तिरेव न स्यात् , विचारे सति प्रामाणिकत्वप्रतीतौ तदभ्युपगमः तदनभ्युपगमे च विचार इति । अभ्युपगतोपायत्यागविषय एवायमपसिद्धान्तो नान्यत्रेति चेन्न । यो हि यदुपायस्तमभ्युपगम्य विचारः प्रवर्तयितव्य इत्येव कुतः ? तस्योपायतया तेन विचारः प्रवर्तयितव्य इत्येव युक्तम् , न तु तदभ्युपगमोऽपि तावता तदुपायः स्यात् । तस्य च तदभ्युपगमस्य च पृथक्कारणत्वाभ्युपगमे प्रमाणस्योपदर्शयितु- पर ही कथा की प्रवृत्ति होती है, अतः उनको स्वीकार कर बाद में उनका अनङ्गीकार अपसिद्धान्त कहें, तो वह युक्त नहीं । कारण स्वव्याघातक होने से उसे आप ही जाति मानते हैं और जाति का निरनुयोज्यानुयोगरूप निग्रहस्थान में निवेश है । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण दर्शन-विशेष में नियत क्षणभङ्गादि का जो कथा के आरम्भ में स्वीकार किया जाय, क्या वह इसलिए कि क्षणभङ्गादि का अभ्युपगम, प्रकृत साध्य अपोहादि के साधन का उपाय है या अपोह के नान्तरीयक ( व्याप्य ) होने से ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण क्षणभङ्ग के साधन की अवस्था में अपोहादि के त्यागनेवाले बौद्ध को अपसिद्धान्त नहीं होगा । अपोह का अभ्युपगम क्षणभङ्ग के साधन का उपाय नहीं है । अन्योन्य के अभ्युपगम को अन्योन्य का उपाय मानें, तो अन्योन्य के विचारों की निष्पत्ति ही नहीं होगी; कारण विचार होने पर प्रामाणिकत्व की प्रतीति होने पर अन्योन्य का अभ्युपगम होगा और अभ्युपगम होने पर विचार, इस तरह अन्योन्याश्रय है । समर्थन—अन्योन्य का अभ्युपगम स्वसूत्रकार के प्रामाण्य से होता है, विचार से नहीं, अतः अन्योन्याश्रय नहीं है । खंडन—जो जिसका उपाय है, उसे मानकर ही विचार की प्रवृत्ति करनी चाहिए, यह कैसे हो सकता है । वह उपाय है, इसलिए उसीसे विचार करना चाहिए, यही युक्त है । एतावता उपाय का अभ्युपगम भी उसका उपाय