भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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साध्यस्याभावापच्याऽनुमन्तव्यः । तथाच सैव दूषणमस्त्वनभ्युपगमे, कृतं तयाऽभ्यु- पगमं परिकल्प्य तेनानभ्युपगमविरोधादपसिद्धान्तोपन्यासेनेति । एवं निग्रहान्तरखण्डनमूहनीयम् । इति कवितार्किकचक्रवर्ति-श्रीश्रीहर्षकृते खण्डनखण्डखाद्ये निग्रहानिरुक्तिर्नाम द्वितीयः परिच्छेदः

अपोह से व्यापक क्षणिकत्व का स्वीकार किया जाता है । तब तो व्यापक क्षणिकत्व के स्वीकार के अभाव में व्याप्य के सत्त्व की अनुपपत्ति ही दोष मानिये । उससे कल्पित क्षणिकत्व के स्वीकार से श्रुत क्षणिकत्व के अस्वीकार का विरोध होने से अपसिद्धान्त का कथन व्यर्थ है । इसी प्रकार अन्य निग्रहस्थानों का खण्डन भी स्वयं कर लेना चाहिए । द्वितीय परिच्छेद का भाषानुवाद समाप्त