भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 432

अथ तृतीयः परिच्छेदः सर्वनामार्थ-खण्डनम् अथ यान्यवलम्ब्य बहुलं वाग्व्यवहारास्तेषां सर्वनाम्नामर्थाः कथं निर्वाच्याः । तथाहि—ईश्वरसद्भावे किं प्रमाणमिति ब्रुवाणः प्रतिवक्तव्यः, किं शब्दोऽयमाक्षे- पार्थो वा, कुत्सितार्थो वा, वितर्कार्थो वा प्रश्नार्थो वा स्यात् ? तत्र यदि प्रथमः पक्षः; तदेश्वरसद्भावे नास्ति प्रमाणमित्युक्तं स्यात् । तथाच सति न प्रतिज्ञामात्रा- त्साध्यसिद्धिरिति हेत्वादिकं वाच्यं भवति । तच्च भवता नाभ्यधायि, तस्मात् न्यूनत्वं दोषः । अत एव न द्वितीयः; ईश्वरसद्भावे कुत्सितं प्रमाणमित्यस्यापि प्रतिज्ञा- मात्रत्वात् । अपिच—साध्यासाधकत्वाद्। तत् कुत्स्यते भवता, अन्यथा वा ? अन्यथा चेदलं तदुद्भावनया, साध्यसिद्धेरप्रत्यूहत्वात् । नापि प्रथमः ; प्रमाणञ्च साध्यसा- धकञ्चेति व्याघातात् । सर्वनामार्थ का खंडन जिन सर्वनामों का अवलम्बनकर बहुत-से व्यवहार होते हैं, उनका क्या अर्थ है ? देखिये—'ईश्वरे किं प्रमाणम्' इस प्रश्न के कर्त्ता से पूछना चाहिए कि यहाँ किम्-शब्द का अर्थ निषेध है, कुत्सा है, वितर्क है या प्रश्न ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण प्रथम पक्ष में 'ईश्वर-सद्भाव में प्रमाण नहीं है' यह अर्थ हुआ । पर वह ठीक नहीं, क्योंकि प्रतिज्ञामात्र से साध्य की सिद्धि नहीं होती । अतः कुछ हेतु तो कहना ही होगा और उसे आपने कहा नहीं है, जिससे न्यूनत्व दोष हो जायगा । इसीलिए द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण 'ईश्वर में कुत्सित प्रमाण है' यह भी प्रतिज्ञामात्र है । किञ्च—आप प्रमाण की जो कुत्सा ( निन्दा ) करते हैं, वह उसके साध्य के असाधक होने से या अन्य किसी कारण से ? यदि अन्य किसी कारण करते हों, तो उसका उद्भावन व्यर्थ है, क्योंकि उसके बिना भी साध्य की सिद्धि हो ही जाती है । प्रथम कल्प भी युक्त नहीं है, कारण साध्य का असाधक हो और प्रमाण भी हो, यह वचन परस्पर व्याहत है ।