खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
३८६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [द्वितीय ] अनुक्तस्थाने चाऽप्रतिपादितकरणेऽपि दोषः ; परस्मिन्नजातप्रतिपत्तौ प्रति- पादितत्वानुपपत्तेरित्यादि स्वयमहनीयम् । प्रतिज्ञाविरोध-लक्षण-खण्डनम् प्रतिज्ञान्तरादीति आदिपदेन किमिष्टम् ? प्रतिज्ञाविरोधादीति चेन्न । यत एकवक्तृकैकवाक्यांशयोर्मिथो व्याघातः साध्यविपरीतव्याप्तत्योद्भावनानपेक्षोद्भावनः प्रतिज्ञाविरोधः । तदेतदलक्षणम् ; तथाहि-- 'इह भूतले घटो नास्ती'त्यादावपि गतत्वेनातिव्यापकमिदम् । वचनयोर्हि व्याघातोऽन्योन्यविरुद्धार्थत्वम् । तच्चेहास्ति, घटोऽस्तीत्यंशस्य घटसत्त्वबोधकत्वात् , नकारस्य च तन्निषेधकत्वात् । नन्वयुक्तमिदमुच्यते । न हि 'घटो नास्ती'त्यत्र घटोऽपि विधीयते यदि 'पूर्वकाल में अप्रतिपादित विशेषणवत्स्वरूप से अभिधान प्रतिज्ञान्तर है', ऐसा लक्षण करें, तो यद्यपि प्रकरणलभ्य विशेषण भी प्रतिपत्ति का विषय होने से प्रति- पादित ही है, अप्रतिपादित नहीं, अतः उक्त स्थल में अतिव्याप्ति नहीं है; तथापि पर को जहाँ प्रतिपत्ति नहीं हुई है, वहाँ प्रकरणलभ्य विशेषण के भी अप्रतिपादित होने से अतिव्याप्ति वैसी ही बनी हुई है, इत्यादि दोष स्वयं ऊहनीय हैं । प्रतिज्ञा-विरोध-लक्षण का खंडन 'प्रतिज्ञान्तरादि' यहाँ 'आदि' पद से किसका ग्रहण इष्ट है ? समर्थन--प्रतिज्ञाविरोध का ही ग्रहण करेंगे । खण्डन--यह संभव नहीं, क्योंकि उसका लक्षण ही नहीं कर सकते । यदि 'साध्य के अभाव के व्याप्तत्व के उद्भावन की अनपेक्षा से जिसका उद्भावन हो, ऐसा एक वक्ता के एक वाक्य के दो अंशों का परस्पर व्याघात प्रतिज्ञा-विरोध है' ऐसा लक्षण करेंगे, तो वह युक्त नहीं । देखिये-- 'इह भूतले घटो नास्ति' यहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । परस्पर विरुद्ध अर्थ होना ही वचनों का व्याघात है । वह विरोध यहाँ 'घटः' इस अंश के घटसत्त्व बोधक होने से और 'न' के घट-निषेध-बोधक होने से विद्यमान ही है । समर्थन--'घटो नास्ति' इस वाक्य में घट और घट-निषेध दोनों का विधान नहीं है, जिससे व्याघात हो । किन्तु घट-निषेध का ही विधान है, फिर इस वाक्य
परिच्छेद ] प्रतिज्ञा-विरोध-लक्षण का खण्डन ३८७ घटनिषेधोऽपि च, येन मिथो व्याघातः स्यात् । किन्तु घटो निषिद्ध्यते, घटनिषेध एव तु विधीयत इति यावत् । तत्कुतो व्याहतिरिति चेत् । मैवम्; घट इत्यस्य तावदंशस्य घटविधिवोधकत्वम्, नास्तीत्यस्यापि तत्प्रतिषेधार्थत्वं भवताऽपि मन्तव्यम् । यदि त्वेवं नाभ्युपैषि, तदा तयोरविरुद्धार्थ- तया घटश्चाऽपेक्षितनिषेधास्तित्वं च भूतलाश्रितं द्वयमस्य वाक्यस्य बोधनीयं स्यादिति । तस्माद्विधिरूप एव घट इति तन्प्रतिक्षेप एव न नेति किमेतौ एक- कर्तृकवाक्यांशौ न भवतः, परस्परविरोधाथर्माभिधायकौ वा न भवतः, येन लक्षणमिदं भवतस्तत्र न गच्छेत् । न मिथो विरुद्धत्वमात्रं मिथो व्याघातकत्वम्, किन्त्वेकदेशकालादौ परस्पर- विरुद्धार्थयोरस्तित्वम् । न च नास्तीत्यनेन एकदेशकालादौ विधिनिषेधौ वर्तमानौ बोध्येते इति चेन्न । उक्तोत्तरत्वान, देशकालाद्यनन्तर्भावे विरोधधर्मस्यानुपपत्तेः । किञ्च—यद्येकदेशादौ विरुद्धास्तित्वं प्रामाणिकमभ्युपैषि, तदा विरुद्धशब्द- में व्याघात कहाँ है ? अतः 'घटो नास्ति' इस वाक्य में व्याघात है, यह कथन युक्त नहीं है । खंडन—'घटः' यह अंश घटविधि का बोधक है और 'नास्ति' यह अंश घट- निषेध का—यह तो आप भी मानेंगे । यदि ऐसा न मानें, तो दोनों के अविरुद्धार्थक होने से घट और घटनिषेध दोनों का भूतल में अस्तित्व वाक्यार्थ हो जायगा । तस्मात् 'घट' विधिरूप है और 'न' का अर्थ उसका निषेध ही है । फिर क्या यह एककर्तृक वाक्य का अंश नहीं हुआ या परस्पर विरुद्ध अर्थ का वाचक नहीं है, जिससे आपके लक्षण की अतिव्याप्ति न हो ? समर्थन—परस्पर विरोधमात्र व्याघात नहीं है, किन्तु एकदेश या एककाल में विरुद्ध दो पदार्थों का अस्तित्व व्याघात है । उक्त वाक्य से एकदेश अथवा एककाल में वर्तमान विधि-निषेध बोधित नहीं होते, अतः उक्त वाक्य में व्याघात नहीं है । खण्डन—घट और घट-निषेध दोनों परस्पर विरुद्ध हैं—यह तो आप भी मानते ही हैं । वह विरोध एकदेश और एककाल के अन्तर्भाव के बिना हो नहीं सकता । अतः अगत्त्या देश-काल का अन्तर्भाव भी मानना ही पड़ेगा । किञ्च--विरुद्ध पदार्थों का एकदेश या एककाल में अस्तित्व प्रामाणिक है या नहीं ? यदि एकदेश में अस्तित्व प्रामाणिक है, तो रूप-रस के तुल्य वे दोनों एक
३८८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय स्तवायमन्य एव सामयिकार्थः कश्चित्, प्रमाणेन तथाभूतस्य ग्रहणादेव विरुद्धत्वाभ्युपगमशान्तेः । अथ प्रामाणिकं तन्नाभ्युपैषि, तदाऽप्रामाणिकं मिथो व्याघातकत्वं क्व नाम नास्तीत्यतिव्याप्तिः । अथ मन्यसे—यथा परेणाभिधीयेते अर्थौ तथा मिथो व्याघातकाविति ब्रूमः, तत्र च प्रमाणं प्रसरत्येवेति । न; कथमपि तत्र प्रमाणप्रसृतौ विरोधाभावात्परि- भाषामात्रत्वापत्तेः । यथा परेणोक्तोऽर्थस्तथा मिथो व्याघातक इत्यपि क्वचिन्मिथोव्याघातक- मर्थमप्रमाय न वक्तुं शक्यम् । प्रसज्यते मिथो व्याघातः, न प्रसाध्यत इति चेन्न । क्वचिदप्यप्रमितस्य प्रसञ्जयितुमपि भवताऽशक्यत्वात् । देश में रहने से विरुद्ध ही नहीं हैं । उन्हें विरुद्ध कहना तुम्हारा सङ्केतमात्र है । यदि उन दोनों का एकदेश में अस्तित्व प्रामाणिक नहीं है, तो 'अमुक वाक्य व्याहत है' इस कथन का यह अर्थ हुआ कि यहाँ अप्रामाणिक व्याघात दोष है । फिर इससे हानि क्या हुई, कारण प्रामाणिक दोष ही कार्य का प्रतिबन्धक होता है । ऐसा अप्रामाणिक व्याघात कहां नहीं है ? वह 'घटो नास्ति' इस वाक्य में भी है, अतः पूर्वोक्त अतिव्याप्ति वैसी ही बनी हुई है । समर्थन—वादी ने जिस प्रकार अर्थात् सामानाधिकरण्यरूप से बन्ध्यात्व और मातृत्व रूप दो अर्थों का प्रयोग किया है, उस (सामानाधिकरण्य) रूप से वह व्याघातक है—यह हम कहते हैं । वहाँ वाद्युक्त 'बन्ध्या-माता' इस वाक्य के बाधितार्थक होने से अप्रमाण होने पर भी उक्त वाक्यप्रतिपाद्यत्वरूप से बन्ध्यात्व-मातृत्व-सामानाधिकरण्य प्रमाण- विषय हैं ही, अतः उक्त दोष नहीं है । खंडन—किसी प्रकार अर्थात् वाक्यप्रतिपाद्य- त्वरूप से भी यदि वन्ध्यात्व और मातृत्व का सामानाधिकरण्य प्रमाण का विषय है, तो रूप-रस के तुल्य वे दोनों विरुद्ध ही नहीं हैं, अतः विरोध का कथन परिभाषामात्र है । किञ्च—जबतक परस्पर व्याघातकत्व अन्यत्र प्रमित नहीं होता, तबतक 'जिस प्रकार पर ने कहा, उस प्रकार मिथो व्याघात है' यह साधन नहीं किया जा सकता । समर्थन—पर द्वारा उक्त वन्ध्या में माता इस प्रसञ्जक (आरोपक) वाक्य से परस्पर व्याघात का प्रसञ्जन (आरोप) मात्र होता है, साधन नहीं । खण्डन—जो कहीं प्रमित नहीं है, उसका प्रसञ्जन भी नहीं हो सकता । तर्कस्थल में भी हृद में प्रमित ही धूमाभाव का पर्वत में प्रसञ्जन होता है ।
परिच्छेद ] प्रतिज्ञा-विरोध-लक्षण का खण्डन ३८६ मा प्रमायि, अप्रमायैव तद्व्यवहार इति चेन्न । कचिदप्यप्रमितमाभास- मात्रोपस्थितं क नाम नोपस्थापयितुं शक्यमित्युक्तैवातिव्याप्तिगर्वतते । अनेकत्र नियतयोरेकत्र प्रसञ्जनमिति चेन्न । प्रसञ्जकस्य तद्द्वयस्यैकत्र स्थितिनियतताप्रमितावविरोधस्यानेवंभवे चाऽनापादकत्वस्याऽऽपत्तेः । एकैकव्याप्याभ्यां पृथक् पृथक् तद्द्वयापादनमिति चेन्न । एकैकमव्याघातात् । अर्थाद् द्वयं स्यादिति चेन्न । अर्थापत्त्यर्थत्वेनाव्याघातात् । अर्थादापादनम् , न साधनमिति चेन्न । मिथो विरोधित्वेन तर्काभा- सत्वापत्तेः, इष्टापादनाच्च । समर्थन—प्रमित न हो, तो क्या हानि है, पर का जो अभ्युपगम है, उसीसे प्रसञ्जन होगा, जैसा कि भ्रम के 'नेदं रजतम्' इस बाध में शुक्ति-रजततादात्म्य प्रतियोगीरूप से भासता है । खण्डन—अप्रमित और केवल भ्रम से उपस्थित व्याघात का प्रसञ्जन कहाँ नहीं होता, अर्थात् सर्वत्र हो सकता है । अतः 'घटो नास्ति' इस वाक्यस्थल में भी उसका प्रसञ्जन होने से पूर्वोक्त अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है । समर्थन—वन्ध्या में वन्ध्यात्व और माता में मातृत्व प्रमित है, उन दोनों के एक धर्मी में [ 'वन्ध्या-माता' इस वाक्य में ] प्रसञ्जक के बल से प्रसञ्जन करेंगे । खण्डन—दो विरुद्ध धर्मों का एक में प्रसञ्जन बिना किसी प्रसञ्जक के हो नहीं सकता । उस प्रसञ्जक में यदि प्रसञ्ज्यद्वय की व्याप्ति प्रमित है, तो उन दोनों के एकत्र प्रमित होने से वस्तुतः विरोध ही नहीं है, केवल विरोध की परिभाषामात्र है । यदि व्याप्ति प्रमित नहीं है, तो वह आपादक ही नहीं हो सकता । समर्थन—एक-एक के व्याप्य दो प्रसञ्जकों से मिलित दोनों का आपादन नहीं होता, किन्तु पृथक्-पृथक् दोनों का आपादन होता है । खण्डन—ऐसा होने पर दोनों एकत्र साधक तो हैं नहीं, अतः व्याघात ही नहीं होगा । समर्थन—दोनों के व्याप्यों से एक-एक का अवस्थान होने पर अनुपपत्ति से ही दोनों की एकत्र अवस्थिति होने से व्याघात है । खण्डन—प्रत्येक दोनों के एकत्र आपादन की अनुपपत्ति से आप उन दोनों की अवस्थिति का एकत्र साधन करते हैं या आरोपमात्र ? प्रथम पक्ष में उक्त अनुपपत्ति अर्थापत्तिरूप प्रमाण होने से उससे प्रमित विरुद्धद्वय का एकत्र अवस्थान रूप-रस के तुल्य व्यहत ही नहीं है । यदि कहें कि अनुपपत्ति से प्रसञ्जनमात्र करते हैं और प्रसञ्जन में प्रमा की अपेक्षा नहीं, कारण प्रसञ्जन ज्ञानमात्र से ही होता है, अतः पूर्वोक्त दोष नहीं है,
मिथो व्याघातात् कथं तथा स्यादिति चेन्न। तद्वयधार्मिकत्वात् व्याघा- तापत्तेर्धर्मिणि प्रमापेक्षायामव्याघातात्।
प्रतिबन्दी-लक्षण-खण्डनम्
एवमादीनां दोषाणां परं प्रत्यभिधाने तवापि सर्वमिदं सुवचमिति चेन्न। तवाप्यन्यत्र दोषो मयाऽऽपाद्यत इति प्रतिबन्दीं गृह्णतः किं परपक्षे दोषापादन- तो जैसे व्यापक धर्मद्वय का एकत्र अवस्थान व्याघात है, वैसे ही उनके व्याप्य आपादक दोनों का एकत्र अवस्थान भी व्याघात है, अतः उनसे प्रसञ्जन तर्काभास हो जायगा। किञ्च—एक-एक का आपादन इष्ट है, अनिष्ट नहीं। अनिष्ट का आपादान ही तर्क है। इससे भी यह तर्काभास ही है। समर्थन—एक-एक का आपादन ही विरुद्ध धर्मद्वय के आपादन में पर्यवसित होता है। अतः वह अनिष्टापादन ही है, इष्टापादन कैसे होगा ? खंडन—तब तो 'एक धर्माविरुद्ध धर्मद्वय युक्त है' ऐसा ही व्याघात का आपादन हुआ। यह तब हो सकता, जब धर्मद्वययुक्त धर्मी प्रमित हो। यदि उसे प्रमित मान लें, तो रूप-रस के तुल्य प्रमित होने से वे व्याहत ही नहीं हैं।
प्रतिबन्दी-लक्षण का खंडन
समर्थन—आप अद्वैतसिद्धि में प्रवृत्त हैं। यदि आपको नैयायिक आदि प्रतिज्ञा- हानि आदि निग्रहस्थान से निगृहीत करें, तो जैसे आप प्रतिज्ञाहानि आदि के लक्षण का खण्डनकर प्रतिज्ञाहानि आदि का निवारण करते हैं, वैसे ही नैयायिक आदि द्वैतसिद्धि में प्रवृत्त हों और यदि आप भी प्रतिज्ञाहानि आदि निग्रहस्थानों का उपन्यास १. शांकरीकार इस ग्रन्थ का इस प्रकार संहलापन करते हैं — कहा जा सकता है कि विरोध, व्याघात आदि पद यदि सार्थक हों तो उनका खण्डन निरवकाश है। यदि वे निरर्थक हैं, तो आपने ही सार्थक समूह के साथ उनका जो उच्चारण किया, वह अनुपपन्न हो जायगा। किञ्च — प्रतीत व्याघात का खंडन कर रहे हैं या अप्रतीत का ? यदि प्रतीत का कहें, तो वह प्रतीति प्रमात्मक है या अप्रमात्मक ? यदि प्रमात्मक कहें, तो खंडन व्याहत है। अप्रमात्मक कहें, तो भ्रान्ति अभ्रान्तिपूर्वक होने से पुनरपि खण्डन व्याहत है। यदि अप्रतीत व्याघात का खंडन करते हैं तो भी खंडन व्याहत है। अप्रतीयमान दोषवत्तया ज्ञाप्य ही नहीं हो सकता। अतः यह प्रतिबन्दी सर्वथा दुरुत्तर है इस आशय से शंका करते हैं — एवम्' इत्यादि से।
परिच्छेद ] प्रतिबन्दी-लक्षण का खण्डन ३६१ मात्रं विवक्षितम्, उत यस्त्वया तत्र समाधिरभिधेयः, स मयाऽप्यभिप्रायेण स्वपक्षे समाधिः ? न तावदाद्यः ; अप्रस्तुतत्वात् । परोक्तदोषानुद्धारे तावतैव कथायास्तदर्थस्य वा पर्यवसानात्, निग्रहापरिहागावधित्वान्नयोः । द्वितीये तु स एवाभिधीयताम्, का नो हानिः ? भवांस्तावदभिधत्तां कस्तत्र समाधिः, ततो मयाप्यभिधेय इति चेन्न । मया तदभिधानस्य साम्प्रतमप्रस्तुतत्वात् । नहि मया स्वपक्षसाधनं त्वया च तद्दूषणं प्रकृते वक्तुमारब्धमस्ति । किन्तु त्वया स्वपक्षो निर्वाह्यः, तद्दूषणञ्च मयाऽभिधा- नोयमिति कथा प्रस्तुता वर्तते । ईदृशि च कथाविभागे मत्पक्षसमाधानाय मां पर्यनुयोक्तुं भवतः कुतोऽधिकारः ? अथ विशेषतस्तन्निराङ्कने किं प्रयोजनम्, अस्ति तावदेतादृशि चोद्ये परिहारो करें, तो नैयायिक आदि भी प्रतिज्ञाहान्यादि के लक्षणों का खण्डनकर प्रतिज्ञाहान्यादि का निवारण कर ही सकते हैं । अर्थात् प्रतिबन्दी उत्तर दे सकते हैं । खंडन — क्या आप अन्य पक्ष में दोष के आपादन द्वारा प्रतिबन्दीरूप दोष देकर केवल परपक्ष में दोष का आपादनमात्र चाहते हैं या जो परपक्ष में दोष है, वह दोष मेरे पक्ष में भी है, इस अभिप्राय से स्वपक्ष में समाधि ( समाधान ) चाहते हैं । अर्थात् दोष- सामान्य विवक्षित है या परिहारसाम्य ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं, कारण सम्प्रति परपक्ष में दोष प्रस्तुत ही नहीं है । स्वपक्ष में परोक्त दोष का उद्धार न होने से ही वितण्डारूप कथा तथा वादजल्परूप कथा का अर्धभाग समाप्त हो जाता है, कारण निग्रहस्थान का अपरिहार ही उनकी अवधि है । द्वितीय पक्ष में उस समाधि को ही कहिये, मेरी क्या हानि है ? समर्थन — पहले आप ही कहिये कि आपके पक्ष में क्या समाधि है, पीछे हम भी अपने पक्ष में समाधि कहेंगे । खंडन — हमारे पक्ष में समाधान सम्प्रति अप्रस्तुत है, कारण हमने स्वपक्ष में समाधान कहने और आपने हमारे पक्ष में दूषण कहने का आरम्भ नहीं किया । किन्तु आप अपने पक्ष का निर्वाह करें और हम आपके पक्ष में दोष दें, ऐसी कथा प्रस्तुत है । इस कथा में मेरे पक्ष में समाधान के लिए मुझे प्रेरणा करने में आपका अधिकार कैसे हो सकता है ? समर्थन — विशेषरूप से अपने पक्ष में समाधान देने से क्या लाभ है, इस दोष
| ३६२ | सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य | [ द्वितीय |
|---|
यतस्त्वयाऽपि स्वपक्षेऽसौ स्वीकार्य इत्याशयस्ते । सोऽपि न युक्तः ; न हि मत्पक्षे चेत्समाधिरस्ति तावता स्वपक्षेऽपि तेन भवितव्यमित्यत्र किञ्चिदपि प्रमाणमस्ति । साम्यादेवेमिति चेन्न । वैषम्यस्यावश्याभ्युपेयत्वात् । यदि तद्गतमसाधारणं स्वरूपमादाय मद्दर्शनं प्रतितन्त्रसिद्धान्तं वा तत्र समाधिः स्यात् । अत्र च स्वपक्षे तदभावान्न स्यात् , तथा सति साम्यमात्रात्कथं समाधिरसावत्रापीति निश्चेतुं शक्यते । कोऽसौ तत्र विशेष इति चेन्न । मया साम्प्रतं तदभिधानस्याप्रस्तुतत्व- मित्युक्तत्वात् । चोद्यसाम्यात् समाधिसाम्यमिति चेन्न । दूष्यगतविशेषाभावाभावविशेषि- तत्त्वादिनापि तद्वैषम्यसम्भवात् । यथा-सद्व्यवहारस्य सत्तास्वीकारत्वे तुल्येऽपि का समाधान है ही, कारण आप भी अपने पक्ष में उस समाधान को स्वीकार करते हैं। खण्डन—आपका यह आशय युक्त नहीं, है, कारण मेरे पक्ष में समाधान होने से आपके पक्ष में भी समाधान हो, इसमें कुछ प्रमाण नहीं है । समर्थन—दोष तुल्य होने से समाधान भी तुल्य है, ऐसा अनुमान हो ही सकता है । अर्थात् 'प्रत्यक्षदोषाः परिहारवन्तः एकदोषत्वात्, स्वमस्थदोषवत्' यह अनुमान हो ही सकता है। खण्डन—समाधेय की व्यक्तिगत विशेषता को लेकर तथा स्वदर्शन-प्रतिदर्शन के सिद्धान्तों का आश्रयण कर समाधान में वैषम्य अवश्य मानना ही पड़ेगा । देखिये—जहाँ नैयायिक द्रव्य में सद्व्यवहारविषयत्व से सत्ता की सिद्धि करता हो और 'यदि सत्ता की सिद्धि सद्व्यवहारविषयत्व से ही हो, तो सत्ता में भी सद्व्यवहारविषयत्व से सत्ता की सिद्धि क्यों न हो?' ऐसी प्रतिबन्दी मीमांसक देता हो, वहाँ समाधेय व्यक्ति सत्ता और द्रव्य भी विशेष हैं तथा सत्ता में सद्व्यवहार स्वरूपसत्त्व को विषय करता है, ऐसा नैयायिकदर्शन, प्रतिदर्शन (मीमांसा) सिद्धान्तरूप समाधि है और तुम्हारे पक्ष में द्रव्य में वह समाधान नहीं है । अतः दोष के साम्यमात्र से यहाँ भी वही समाधि है, यह निश्चय कैसे हो सकता है ? समर्थन—दोष तुल्य होने पर भी समाधि में वैषम्य का प्रयोजक विशेष क्या है ? खण्डन—मैं विशेष का अभिधान करूँ, यह अप्रस्तुत है—यह कह ही आया हूँ । अर्थान्तर के भय से मैं उसे कह नहीं सकता । समर्थन—फिर भी जब प्रश्न सम है, तब समाधि भी सम ही होनी चाहिए । अर्थात् तुम्हारे पक्ष में जो समाधि है, उसीका हम यहाँ साधन नहीं करते । किन्तु
सत्तायां तदभ्युपगमेऽनवस्थया तदाश्रये च तदभावेन । एवमन्यत्रापि बहुलं दर्शनादिति । किञ्च—परोद्भावितमसिद्ध्यादिकमपरिहृत्य प्रतिबन्द्या प्रत्यवतिष्ठमानस्य कोऽभिप्रायः, ‘किं यदिदं दोषतया परेणोद्भावितं तददूषणम् , अदूष्येऽपि गतत्वात् , उत दूषणमपि सन्नोद्भावनीयं तुल्ययोगक्षेमत्वात् ?’ यथाऽऽहुः— ‘यत्रोभयोर्’त्यादि । नाद्यः; यद्यत्रासिद्ध्यादिलक्षणमस्ति उद्भाविते दूषणे तदा दोषत्वस्या- शक्यपरिहारत्वात् , परिहारेऽपि वा तस्यालक्षणत्वप्रसङ्गात् । यद्येतद् दूषणं कथं तर्ह्यदूष्यत्वेन वादिनाऽङ्गीकृतेऽपि प्रतिवन्दीस्थाने गतमिति चेत्; यद्येतददूषणं कथं दोषलक्षणोपपन्नमित्यत्रापि दीयतां दृष्टिः । उसीके सदृश समाधि का ही साधन करते हैं । एवञ्च स्वरूपविशेषादि होने पर भी कोई विरोध नहीं है । खण्डन — दूष्य व्यक्ति में रहनेवाले विशेषों (भाव-अभावों) में भी समाधि में भेद हो सकता है । देखिये—सद्-व्यवहार सत्ता-साधन में तुल्य होने पर भी सत्ता में सत्ता मानने में अनवस्था [का भाव] है और द्रव्य में सत्ता मानने में अनवस्था का अभाव है । इसी प्रकार अन्यत्र भी बहुत-से स्थलों में दोष सम होने पर भी समाधि में वैषम्य देखा जाता है । किञ्च — स्वपक्ष में प्रतिवादी द्वारा उद्भावित असिद्धि आदि का परिहार न कर प्रतिबन्दी से समाधान करनेवाले का क्या अभिप्राय है—‘क्या आप जिस दोष को देते हैं, वह दोष नहीं है, क्योंकि आपके मत में भी वह अदूष्य है,’ यह अभिप्राय है अथवा ‘दूषण तो है, पर उसका उद्भावन नहीं करना चाहिए, क्योंकि दोनों पक्षों में उसकी स्थिति तुल्य है ?’ यही बात कुमारिल भट्ट ने कही भी है कि ‘जहाँ दोष दोनों पक्षों में समान हों और उनका समाधान भी तुल्य हो, ऐसे अर्थ के विचार में किसी एक पर पर्यनुयोग नहीं करना चाहिए।’ इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण यदि यहाँ कथित दोष में दोष का लक्षण घटता है, तो दोषत्व का परिहार अशक्य है । यदि दोषत्व का परिहार करें, तो वह दोष का लक्षण ही नहीं कहलायेगा । समर्थन—यदि यह दोष है, तो वादी द्वारा अदूष्यत्वरूप से स्वीकृत प्रतिबन्दी में कैसे गया ? खण्डन—यदि यह दोष नहीं है, तो दोष के लक्षण से युक्त कैसे हुआ, इस पर भी ध्यान दीजिये । ५०
३६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय नियामकभावे तर्हेतदीयदूषणत्वे सन्देहः पर्यवसित इति चेत्; अस्तु दोषत्व- सन्देहेऽपि भवदीयसाधनस्यासाधकत्वात् सन्दिग्धासिद्धवत् । किञ्च-यल्लक्षणवतोऽस्य दोषत्वसन्देहस्तल्लक्षणक एवायमन्यत्रापीति तत्राप्यसिद्ध्यादेरदूषणत्वमेव स्यादितीयं प्रतिबन्दी दुरुत्तरा प्रतिवादिनेति । नापि द्वितीयः ; तथाहि - उभयवादिसम्मतादूष्यत्वं धूमानुमानादिकं यदि प्रतिबन्दीकरोति परस्तदा तद्दर्शनेऽन्यत्र कचिदप्येतदसिद्ध्यादिकं नोद्भावनीयम्, परसाधनेषु तस्यैव धूमानुमानादेः प्रतिबन्द्या भयादित्येषा मयाऽपि सुग्रहैव तं प्रति प्रतिबन्दी । अत्रापि शक्यत एव पठितुम् - 'यत्रोभयोः समो दोषः' इत्यादि । समर्थन—नियामक अर्थात् विशेष-दर्शन का अभाव होने से प्रकृत दोष में दोषत्व का सन्देह ही होगा । अर्थात् निश्चित दोषस्वरूप से आप भी उसका उद्- भावन नहीं कर सकते । खंडन-दोषत्व का सन्देह ही रहे, तो हानि क्या है । संदिग्ध असिद्धि के तुल्य दोष के सन्देह से ही आपका हेतु साधक नहीं होगा । किञ्च-जिस लक्षण से युक्त असिद्ध्यादि में प्रकृत स्थल में दोषत्व का सन्देह है, उस लक्षण से युक्त ही असिद्ध्यादि अन्यत्र भी हैं । अतः यदि असिद्ध्यादि को यहाँ दूषण न मानें, तो अन्यत्र भी असिद्ध्यादि दूषण न कहलायेंगे, यह प्रतिबन्दी प्रतिबन्दीवादी को भी दुरुत्तरणीय ही है । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है । देखिये - 'वर्णा अनित्याः श्रावणत्वात् ध्वनिवत्' नैयायिक की इस अनुमिति में मीमांसक द्वारा उपान्त्य वर्ण में असिद्धि और शब्दत्व में अनैकान्तिकत्व दोष देने पर नैयायिक उभयमत में अदूष्य धूमानुमान को यदि प्रतिबन्दी करें (अर्थात् नैयायिक यह कहे कि यदि प्रस्तुत स्थल में असिद्धि और अनैकान्तिक दोष हों, तो वे दोष धूमानुमान में भी हो जायेंगे, कारण धूम भी आकाश में अनैकान्तिक है तथा आर्द्वेन्धन-संयुक्त प्रदेश अन्यत्र पर्वत में असिद्ध है ), तो नैयायिक-मत में कहीं भी धूमानुमानरूप प्रतिबन्दी के भय से असिद्धि आदि का उद्भावन न हो सकेगा । भाव यह है कि यदि प्रस्तुत श्रावणत्वानुमान में धूमानुमानरूप प्रतिबन्दी के भय से असिद्ध्यादि दोष न कहलायें, तो उक्त प्रतिबन्दी के भय से कहीं भी असिद्ध्यादि दोष न कहलायेंगे—ऐसी प्रतिबन्दी नैयायिक पर भी हो सकती है । यहाँ भी 'यत्रोभयोः' इत्यादि श्लोक पढ़ ही सकते हैं ।
परिच्छेद ] प्रतिबन्दी-लक्षण का खण्डन ३६५ अथ यं विशेषमादाय प्रतिबन्दी स्यात् तन्मात्रस्यानुद्भावनम्, न तु सामान्यत एवेति चेन्न । तत्र विशेषे प्रतिबन्द्या त्याजितदुष्टत्वे गतत्वात्तल्लक्षणमेव नेति स्यात् । विशिष्य तद्विशेषत्याजने च तादृशस्य लक्षणस्यासिद्धिरेव स्यादिति कृतं प्रतिबन्द्या । अथ मद्दर्शनमात्राभ्युपगततादृश्यत्वं किञ्चित्पदार्थं प्रतिबन्दीकरोति तदैतदुक्तं तेन स्यात्—इह नेदं दूषणं वक्तव्यमित्यभिधानेऽनयैव युक्त्या तवेष्टभङ्गप्रसङ्गा- दिति । तन्न; इदमीह दूषणं वक्तव्यम्, अनभिधानेऽस्यैवानिष्टस्य परसिषाधयि- षितस्य सिद्धिप्रसङ्गादित्यभिधानानुकूलाया अपि प्रतिबन्द्याः सम्भवात् । नन्वेवमेवास्तु, तथाचाभिधानेऽनभिधाने चोभयतःपाशा प्रतिबन्दीरज्जुर्भवत समर्थन.—असिद्धि के जिस प्रकार-विशेष को लेकर प्रतिबन्दी करते हैं, उस दोष से विशिष्ट प्रकृत हेतु का उद्भावन नहीं होता । किन्तु सामान्यतः असिद्धि का उद्भावन तो होता ही है । खंडन—प्रतिबन्दी ने जिस (असिद्धि) विशेष में दोषत्व तो दूर कर दिया और असिद्धि का लक्षण है, उस स्थल में उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन —असिद्धि आदि दोषों के लक्षण में 'प्रतिबन्दी से त्याजित दुष्टत्व से अन्य' ऐसा निवेश करने पर अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—यदि ऐसा है, तो प्रतिबन्दी का उद्भावन व्यर्थ है, असिद्धि के लक्षण का अभाव है, केवल इतना ही उद्भावन करना चाहिए । समर्थन —जहाँ 'प्रपञ्चः सत्यो व्यावहारिकत्वात्' इस नैयायिक के अनुमान में वेदान्ती असिद्धि का उद्भावन करे और उस पर नैयायिक ऐसी प्रतिबन्दी का उपन्यास करे कि “यदि मेरी अनुमिति में असिद्धि-दोष हो, तो 'प्रपञ्चो मिथ्या व्यावहारिकत्वात्' इस आपके अनुमान में भी असिद्धि हो जायगी", वहाँ उसका यही अभिप्राय है कि 'यहाँ इस दोष का अभिधान न करो, यदि करोगे, तो इसी दोष से तुम्हारे इष्ट का भी भङ्ग हो जायगा ।' खंडन—'यहाँ दोष अवश्य कहना चाहिए । यदि न कहेंगे, तो पर के सिषाधयिषित अनिष्ट का प्रसङ्ग हो जायगा', ऐसे अभिधान के अनुकूल प्रतिबन्दी भी सम्भव हो सकती है । समर्थन—ऐसा ही रहे, क्या हानि है ? यदि असिद्धि का अभिधान करते हैं, तो इसी दोष से मेरे अभीष्ट की असिद्धि होती है और यदि अभिधान नहीं करते,
३६६ सोनुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ द्वितीय एव दुर्निवारा स्यात् । मैवम्; मिथो विरुद्धायाः प्रतिबन्द्यास्तर्काभासत्वात्, मिथो विरुद्धत्वस्य तर्कदूषणत्वात् । सत्प्रतिपक्षानुमानवद् द्वयोरपि परस्परप्रति- क्षेपेणैव उपक्षीणत्वादिति । न्याय-द्वितीयाध्यायप्रथमाह्निकसूत्रे च 'प्रमेयता च तुलाप्रामाण्यवत्' इत्यत्र आपादितदृष्टान्ताभावलक्षणदोषसाम्येन प्रत्यवस्थितं पूर्वपक्षवादिनं निराकर्तुमाचार्यः तो पर के सिषाधयिषित मेरे अनिष्ट की सिद्धि होती है—इस प्रकार उभयतः पाश- प्रतिबन्दी वेदान्ती पर ही होती है । खंडन—असिद्धि आदि दोषों के अभिधान- अनभिधान से मेरे पक्ष में दोष का आपादन आप करते हैं—यह तृतीय प्रतिबन्दी होती । है वह युक्त नहीं, कारण परस्पर विरुद्ध दो धर्मों में एक का आपादन तर्काभास हो जाता है, कारण मिथोविरोध तर्क का दोष है। आपके मत में प्रतिबन्दी को तर्क- विशेष ही माना गया है । सत्प्रतिपक्षानुमान के तुल्य यदि अभिधान पक्ष में दोष हो, तो अनभिधान पक्ष दोषयुक्त नहीं है और यदि अनभिधान पक्ष में दोष हो, तो अभिधान पक्ष में दोष नहीं है—इस प्रकार परस्पर के प्रतिक्षेप से दोनों पक्षों में दोष अनुपपन्न है । समर्थन—यदि इस तरह आप प्रतिबन्दी को दूषक न मानें, तो 'यत्रोभयोः समो दोषः' इत्यादि वचन द्वारा भट्टपाद ने उसे जो दूषक बतलाया है, उससे विरोध हो जायगा । खंडन—भट्टपाद के उक्त वचन के साथ उद्योत- कर के वचन का विरोध होने से उसमें हमारा कोई आदर नहीं है। इसी बात को ग्रन्थकार के शब्दों में कहना हो, तो यों कहा जा सकता है कि 'न्यायदर्शन के द्वितीयाध्याय के प्रथम आह्निक के १६ वें सूत्र ( 'प्रमेयता च तुलाप्रामाण्यवत्' ) के वार्तिक में आपादित दृष्टान्ताभावरूप दोषसाम्य द्वारा प्रत्यवस्थित पूर्वपक्षवादी का निराकरण करते हुए जिन आचार्य उद्योतकर ने 'समानमित्यनुत्तरमभ्युपगमात्' इत्यादि कहा है, उन्हींको भट्ट का प्रतिभट ( प्रतियोद्धा ) बना दीजिये।' अर्थात् उन्होंने भी भट्ट के इस वचन की उपेक्षा की है, अतः वे ही भट्ट से निपट लें । हम तो उद्योतकर का वह वचन प्रमाण मानकर प्रतिबन्दी को अदूषक ही मानेंगे, यह भाव है । उक्त सूत्र, भाष्य और वार्तिक का पूरा प्रसंग इस प्रकार है—शंका हुई कि चक्षु आदि प्रमेय होने से उनमें प्रमाणत्व कैसे रहेगा, क्योंकि प्रमाकरणत्वरूप प्रमाणत्व और
‘समानमित्युत्तरमभ्युपगमात्, अभ्युपगतं तावद्भवता नास्मत्पक्षे दृष्टान्तोऽस्तीति’ ब्रुवन्नुद्द्योतकरो ‘यत्रोभयोस्ति’त्यादि वदतो भङ्गस्य प्रतिभटीकर्तव्यः । अपसिद्धान्त-लक्षण-खण्डनम् तत् किं प्रतिबन्द्यादि दूषणं न भवत्येव ? नन्वेवं भवतोऽपसिद्धान्तः प्रमाविषयत्वरूप प्रमेयत्व परस्पर विरोधी होने से एक में दोनों नहीं रह सकते । इस पर समाधान करते हुए सूत्रकार ने कहा—‘प्रमेयता च तुलाप्रामाण्यवत् ।’ यहाँ ‘च’ शब्द का अर्थ ‘अपि’ ( भी ) है । एवञ्च जैसे तुला या तराजू प्रमेय होती हुई भी प्रमाण ( प्रमापक ) होती है । यहाँ भाष्यकार, वार्तिककार ने और भी उदाहरण देते हुए कहा है कि ‘जैसे एक ही वृक्षरूप पदार्थ में अनेक कारकत्व और अनेक कालयोगित्व का व्यवहार होता है, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिए । एक में अनेक कालसम्बन्धिता में प्रमाण कारण का कार्यानुगतत्व रूप में अनुभव ही है ।’ इस पर बौद्ध कहता है कि ‘यह ठीक नहीं, अननुगत ही कारण और अनन्वित ही कार्य हैं, क्योंकि क्षणिक पदार्थों में ही कार्य-कारणभाव हुआ करता है । एवञ्च कारण से कार्य अनुगत है, इसमें कोई प्रमाण नहीं ।’ इस पर नैयायिक कहता है कि ‘कारण से अननुगत ही कार्य होता है, इसमें कोई दृष्टान्त नहीं है ।’ बौद्ध इसके उत्तर में कहता है—‘कार्य के ‘कारण से अनुगत होने में भी तो कोई दृष्टान्त नहीं है ।’ इस प्रकार प्रतिबन्दीरूप प्रश्न करने पर उसके समाधान में प्रयुक्त ‘समानमिति अनुत्तरमभ्युपगतत्वात्’ इस सूत्र के व्याख्यान में उद्योतकर ने इस बात को मान लिया है कि मेरे पक्ष में दृष्टान्त नहीं है, अतः स्वमत में दृष्टान्ताभाव को मानकर परपक्ष में दृष्टान्ताभावरूप दोष देनेवाले आपके प्रति मतानुज्ञा नामक निग्रहस्थान प्राप्त हुआ । अर्थात् यहाँ उद्योतकर ने स्पष्ट ही प्रतिबन्दी को दूषक मानकर प्रतिपक्षी को मतानुज्ञा नामक निग्रहस्थान से निगृहीत किया है । अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन प्रश्न—तब क्या प्रतिबन्दी आदि दूषण होते ही नहीं ? ऐसा मानने पर तो आपको अपसिद्धान्त दोष हो जायगा । कारण स्थान-स्थान पर शंकराचार्य प्रभृति ने प्रतिबन्दी को माना ही है । उत्तर—यदि ऐसा है, तो प्रकृत से सम्बद्ध होने के कारण ‘अपसिद्धान्त’ का ही लक्षण बतलाइये । लक्षण न कहकर केवल वचनमात्र से
स्यादिति चेत्; तर्हि दर्शय अपसिद्धान्तस्य लक्षणं प्रकृतसम्बद्धतया । वाङ्मात्रे- णापसिद्धान्ते भवतः किमिति नापसिद्धान्तः स्यात् । सिद्धान्तविपरीताभ्युपगमोऽपसिद्धान्तः । प्रतिबन्द्यादि च भवता सिद्धान्तत्वे- नाभ्युपेतम्, ' मयेदं दर्शनमाश्रित्याभिधेयमि' ति भवता दर्शनविशेषस्याभ्युपेतत्वात् । दर्शनस्य च तत्तत्पदार्थस्वीकारात्मकत्वात्, तेषु च पदार्थेषु प्रतिबन्दीदूषणादेः प्रविष्टत्वादिति चेन्न । लक्षणमेव तावदपसिद्धान्तस्य नोपपद्यते, मत्सिद्धान्तविप- रीतमभ्युपगच्छतो भवतोऽपसिद्धान्तप्रसङ्गात् । स्वसिद्धान्तस्तथाऽपेक्षित इति चेन्न । विशेषणपूरणमन्तरेण तदलाभात् । अन्यथा सर्वत्र विशेषणोपादानप्रयासवैयर्थ्यं स्यात् । एवमेवाभ्युपगमे भवत एवाप- सिद्धान्तकृत्या निवृत्त्याऽऽपतेत् , त्वत्सिद्धान्ते शतशो हेत्वादौ विशेषणोपादान- यदि अपसिद्धान्त हो जाता हो, तो आपको ही अपसिद्धान्त क्यों नहीं है ? अर्थात् लक्षणाधीन ही लक्ष्य का ज्ञान होता है, अतः प्रथम अपसिद्धान्त का लक्षण ही कहिये । निर्वचन—'सिद्धान्त से विपरीत का अभ्युपगम ( स्वीकार ) अपसिद्धान्त है।' आप प्रतिबन्दी आदि को सिद्धान्तरूप से मानते हैं, कारण 'हम अमुक दर्शन का आश्रयण कर कहेंगे' इस प्रकार कहकर आपने दर्शन ( शास्त्र )-विशेष को मान ही लिया है । दर्शन तत्तत् पदार्थों का स्वीकारात्मक है और उन पदार्थों में प्रतिबन्दी दूषण भी प्रविष्ट है । खण्डन—अपसिद्धान्त का यह लक्षण ही युक्त नहीं, कारण मेरे सिद्धान्त से विपरीत सिद्धान्त का अभ्युपगम तो आप भी करते हैं, अतः आपके इस अभ्युपगम में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'स्वसिद्धान्त से विपरीत का अभ्युपगम अपसिद्धान्त है।' दूसरे के सिद्धान्त से विपरीत सिद्धान्त मानने में तो कहीं भी अपसिद्धान्त नहीं होता । खंडन—जबतक 'स्व' का विशेषण रूप से निवेश न हो, तबतक उक्त अर्थ का लाभ ही नहीं होगा । अन्यथा [ यदि विशेषण-प्रवेश के बिना ही विशेषण का लाभ हो जाता हो तो ] सर्वत्र विशेषण के उपादान का प्रयास ही व्यर्थ हो जायगा । क्षण- भर यह मान लें कि विशेषण देने में श्रम व्यर्थ ही है अर्थात् बिना विशेषण दिये ही सर्वत्र विशेषण का लाभ हो जाता है, तो अपसिद्धान्तरूप कृत्या लौटकर आप पर ही आ गिरेगी, कारण आपके शास्त्र में शतशः हेतु आदि में विशेषणों का उपादान
परिच्छेद ] अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ३६६ दर्शनात् । परसिद्धान्तहेतूनाञ्च अनुपात्तविशेषणानामनैकान्तिकीकृत्य त्वच्छास्त्रे बहुशो दूषितत्वात् । प्रथमं स्वशब्दं विशेषणमनुपादाय दूषणभयेनेदानीं तत्करणे च हेत्वन्तरं नाम निग्रहस्थानं भवतः । हेत्वन्तरं हि प्रथममविशेषणं साधकभागमभिधाय पश्चाद्विशेषणवत्तद्वचनम् । किञ्चैवं लक्षणमभिधानस्य भवतोऽप्राप्तकालतापातः । अप्राप्तकालोऽवयव- विपर्यास इति । लक्ष्यमभिधाय हि लक्षणाभिधानं युक्तम्, तस्य च भवता विपर्यासः कृतः । एवमेवाभ्युपगमे भवत एवापसिद्धान्तापातात् । यस्तु प्रथमत एव स्वेतिविशेषणमुपादत्ते, तं प्रत्यनुपात्तविशेषणपक्षाभिहितो दोषो वक्तव्यः । मदीयो हि सिद्धान्तः स्वसिद्धान्त एव मम । अत्र वाक्येऽभ्युपगमपदश्रवणादभ्युपगन्ता लभ्यते, तस्य यः स्वकीयः स स्व- शब्दार्थः पर्यवस्यतीति चेन्न । ममाभ्युपगन्तृत्वात्, मयापि हि किञ्चिदभ्युपगम्यत एव । देखा जाता है तथा विशेषणरहित जो परसिद्धान्त के हेतु हैं, उन्हें आपके शास्त्र में शतशः अनैकान्तिक दोष से दूषित किया गया है । पहले स्वशब्दरूप विशेषण न देकर दूषण के भय से बाद में वह विशेषण दें, तो हेत्वन्तररूप निग्रहस्थान हो जायगा । 'प्रथम विशेषणरहित साधक भाग का अभिधान कर पीछे विशेषणयुक्त साधन का कथन' हेत्वन्तर है । किञ्च—'सिद्धान्त-विपरीताभ्युपगम अपसिद्धान्त है' ऐसा लक्षण करनेवाले आपके मत में 'अप्राप्तकालता' नामक निग्रहस्थान हो जायगा । देखिये—अप्राप्तकाल 'अवयव का विपर्यास' है । लक्ष्य का अभिधान करके ही लक्षण का अभिधान करना उचित होता है, किन्तु आपने उसका विपर्यास किया है । यदि आप अप्राप्तकालता को दोष न मानें, तो आपको ही अपसिद्धान्त हो जायगा । जो वादी प्रथम ही स्व-विशेषण देकर लक्षण का उपादान करते हैं, उनके प्रति भी स्वपद के अनुपादान पक्ष का दोष कहना चाहिए, कारण मेरा सिद्धान्त भी मेरा स्वसिद्धान्त ही है और उसके विपरीत का आप अभ्युपगम करते हैं । अतः आपका अभ्युपगम भी अपसिद्धान्त हो जायगा । समर्थन—इस वाक्य में 'अभ्युपगम' पद का श्रवण है, अतः अभ्युपगन्ता का भी लाभ होता है । उसका जो स्वकीय हो वही यहाँ 'स्व' शब्द का अर्थ होगा । खण्डन—मैं भी अभ्युपगन्ता ही हूँ, कारण मैं भी कुछ तो मानता ही हूँ ।
विपरीताभ्युपगन्ताऽपेक्षित इति चेन्न । अविशेषात् । सिद्धान्तविपरीताऽभ्युपगन्ता विपरीताभ्युपगन्तेति चेन्न । तथाप्यविशेषात्, ममापि त्वत्सिद्धान्तविपरीताभ्युपगन्तृत्वात् । स्वसिद्धान्तविपरीताभ्युपगन्ता तथाऽपेक्षित इति चेन्न । नूनमतिप्राज्ञोऽसि, यत् स्वपदमभ्युपगन्त्रा विशेषयितुं प्रवृत्तोऽभ्युपगन्तारमेव स्वपदद्वारा विशेषयसि, परस्पराश्रयादपि न बिभेषि, स्वपदेऽपि साधारण्यप्रत्यवस्थानं परोक्तं पुनस्तद- वस्थमेवेति च न प्रतिसन्धत्से । यस्य यः सिद्धान्तस्तेन तत्परित्यागोऽपसिद्धान्तस्तदीय इति चेत् । मैवम्; यस्य यः सिद्धान्त इति पुरुषव्यक्तिविशेषसिद्धान्तव्यक्तिविशेषपरत्वे असाधा- रण्यादव्यापकत्वं लक्षणदोषः । यस्येति सिद्धान्तसम्बन्धिन इत्यर्थे तेनेति सिद्धान्तसम्बन्धिनेत्यर्थे च भवतोऽपसिद्धान्तात् । तथाहि—सिद्धान्तसम्बन्धिनो मम यः सिद्धान्तः, तस्य सिद्धान्तान्तरसम्बन्धिना भवता त्यागोऽस्त्येव । समर्थन—विपरीत का अभ्युपगन्ता स्वशब्द का अपेक्षित अर्थ है। खण्डन— इसमें भी कुछ विशेष नहीं है, कारण मैं भी आपके विपरीत का अभ्युपगन्ता ही हूँ । समर्थन—सिद्धान्त के विपरीत का अभ्युपगन्ता स्व-शब्द का अर्थ है। खण्डन—तब भी कुछ विशेष नहीं हुआ, कारण हम भी आपके सिद्धान्त के विपरीत के अभ्युपगन्ता हैं ही। समर्थन—स्वसिद्धान्त के विपरीत का अभ्युपगन्ता स्व-शब्द का अर्थ है। खण्डन— निश्चय ही आप अति बुद्धिमान् हैं, कारण स्वपद को अभ्युपगन्ता से विशिष्ट करने के लिए प्रवृत्त होकर अभ्युपगन्ता को ही स्वपद से विशिष्ट करते हैं और अन्योन्याश्रय से नहीं डरते । अभ्युपगन्ता के विशेषण स्वशब्द में भी परोक्त प्रश्न वैसा ही है, इसका भी ध्यान नहीं करते । समर्थन—'जिसका जो सिद्धान्त हो, उसका उसके द्वारा त्याग अपसिद्धान्त है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—यहाँ । 'यत्-तत्' शब्द पुरुष-व्यक्ति के विशेष-सिद्धान्त व्यक्तिविशेष का यदि ग्रहण करें, तो असाधारण ( एकव्यक्तिवृत्ति ) होने से जिस व्यक्ति का यत् शब्द से ग्रहण करेंगे, उससे अन्यत्र लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । यदि 'यत्-तत्' शब्द को सिद्धान्तसम्बन्धीपरक मानें, तो आप पर ही अपसिद्धान्त हो जायगा। देखिये—सिद्धान्तसम्बन्धी मेरा जो सिद्धान्त, उसका अन्य सिद्धान्त- सम्बन्धी आप द्वारा त्याग है ही।
परिच्छेद ] अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ४०१ त्याग एव तस्य नास्ति, मया परिगृहीतविषयत्वात् त्यागस्येति चेन्न । यदि त्यागोऽस्वीकारस्तदा न परिगृहीतविषयतानियमः । अथ स्वीकृतस्यास्वीकार- स्तदा मया स्वीकृतस्य भवताऽस्वीकारो भवत्येव तथेति विशेषो नास्ति । अथ तेनैव स्वीकृतस्य तेनैवास्वीकारः । सोऽपि न; तेनेति स्वीकृत्यर्थे ममापि स्वीकृतृत्वेन मया स्वीकृतस्य भवताऽस्वीकारे तवापसिद्धान्तापातः । एकेनैकस्य स्वीकृतस्यास्वीकारोऽपसिद्धान्त इति चेन्न । एकेनेति यद्येकसङ्ख्या- योगिनेति, तदा मम यथैकसङ्ख्यायोगित्वं तथा तवापीति स एवापसिद्धान्ता- पातः । अथैकेनेति अभिन्नेनेति; तथापि स्वस्मादभिन्नत्वं तव च मम च समानम् । अन्यस्मादभिन्नत्वं न मम, न वा तवेत्यपसिद्धान्तविषयोच्छेदः । अथ स्वीकृतु- रस्त्वीकर्तृ तो न भिन्नत्वं तदाऽयमर्थः स्यात् —'स्वीकर्तृ तो न भिन्नेनैकस्य स्वीकृत- स्यास्वीकारोऽपसिद्धान्तः।' तथाच स एव भवतोऽपसिद्धान्तः, मया यदीयाङ्गी- समर्थन—हमारे द्वारा आपके सिद्धान्त का त्याग ही नहीं है, कारण परिगृहीत का ही त्याग होता है और हमने उसका ग्रहण ही कहाँ किया है ? खण्डन—यदि त्याग शब्द का अस्वीकार अर्थ है, तो स्वीकृत का ही त्याग होता है, यह नियम नहीं रहा । यदि स्वीकृत का अस्वीकार ही त्याग है, तब भी कोई हानि नहीं, कारण मेरे द्वारा स्वीकृत का आप द्वारा अस्वीकार भी त्याग है ही । अतः इस कथन से भी कोई विशेष लाभ नहीं । समर्थन—'उसके द्वारा स्वीकृत का उसीके द्वारा अस्वीकार त्याग है', अतः यह दोष नहीं है । खण्डन—यहाँ तद्-शब्द का स्वीकर्ता अर्थ मानें, तो मैं भी स्वीकर्ता हूँ । अतः मेरे द्वारा स्वीकृत का आप द्वारा अस्वीकार होने से आपका पुनः अपसिद्धान्त हो जायगा । समर्थन—'एक व्यक्ति द्वारा एक के स्वीकृत का अस्वीकार अपसिद्धान्त है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—'एक' शब्द का यदि एकत्वसंख्यायोगी अर्थ करें, तो जैसे हम एकत्वसंख्या से युक्त हैं, वैसे ही आप भी एकत्वयोगी हैं । अतः आप पर भी वही अपसिद्धान्त है । यदि एक शब्द का अभिन्न अर्थ करें, तो भी 'स्व' से अभिन्न आप भी हैं और हम भी । अन्य से अभिन्नत्व न हममें है, न आपमें ही । अतः अपसिद्धान्त के विषय का ही उच्छेद हो जायगा । यदि स्वीकर्ता में अस्वीकर्ता से अभिन्नत्व की विवक्षा करें, तो यह अर्थ हुआ कि 'स्वीकर्ता से अभिन्न एक द्वारा स्वीकृत का अस्वीकार अपसिद्धान्त है,' तो वही अपसिद्धान्त आपके प्रति हुआ । देखिये—मैंने ५१
कारः किञ्चित्स्वीकर्तुरभिन्नस्य भवतस्तदीयास्वीकर्तृत्वात् । एतेन—एकस्यैकेन स्वीकारास्वीकारावपसिद्धान्त इत्यपास्तम् । मिलितयो- रेवाऽऽवयोरपसिद्धान्तापातात् । अथ तत्स्वीकर्तुरेव तदस्वीकर्तुरभिन्नत्वमेकशब्देनाभिमतम्; तदाऽपि यदि स्वीकारविषयाभिन्नत्वं तच्छब्देनोच्यते अस्वीकारविषयस्य, तदा स्वीकर्त्रन्तरस्वीकार- विषयस्य भवता किञ्चित्स्वीकर्त्रभिन्नेनास्वीकारविषयतया स्वीकारकर्तृविषया- भिन्नत्वस्वीकारेण भवतोऽपसिद्धान्तप्रसङ्गस्य दुर्वारत्वात् । एकेन स्वीकर्त्रा, न तु भिन्नेन स्वीकारास्वीकारौ विवक्षिताविति चेन्न । एकेन स्वीकर्त्रेत्येतदेव विवेचयन् भूयस्तदेवाऽऽकर्षन्नभिहितदूषणगणाव्यावृत्त्यापत्त्या जिसका अङ्गीकार किया है, कुछ स्वीकार करने वाले आप द्वारा उसका अस्वीकार है ही । समर्थन—'एक वस्तु का एक पुरुष द्वारा स्वीकार-अस्वीकार दोनों मिलकर अप- सिद्धान्त है।' खण्डन—मिलित हम दोनों के प्रति अपसिद्धान्त हो जायगा । अर्थात् दोनों एक संख्यायोगी होने से एक हैं । अतः मेरे द्वारा स्वीकृत का तुम्हारे द्वारा अस्वीकार करने पर भी स्वीकारों के एकनिष्ठ होने से दोनों को अपसिद्धान्त हो जायगा । समर्थन—तत्स्वीकर्ता से तदस्वीकर्ता का अभेद एक शब्द का अर्थ है। खंडन— 'तत्' शब्द से यदि अस्वीकार के विषय से स्वीकार के विषय का अभिन्नत्व अभिप्रेत है, तो स्वीकर्ता के अन्य स्वीकार का विषय ( अनिर्वचनीयत्व आदि ) भी कुछ स्वीकार करनेवाले से अभिन्न आपके अस्वीकार का विषय होने से स्वीकर्ता के स्वीकार के विषय में अभिन्नत्व है, अतः आपके प्रति अपसिद्धान्त दुर्वार है। समर्थन—'एक स्वीकर्त्ता द्वारा ( भिन्न से नहीं ) जो स्वीकार-अस्वीकार है, वह अपसिद्धान्त है।' खण्डन—'एकेन स्वीकर्त्रा' इसका विचार करते हुए आप फिर भी उसी एक 'अभिन्न' शब्द का आकर्षण करते हैं, अर्थात् निरस्त विशेषण का पुनः उपादान करते हैं । एवञ्च कथित दूषण-समूहों की व्यावृत्ति न होने से कहिये, आप सान्द्र वर्षाकाल के आगमन से प्रादुर्भूत चञ्चलतर तरंगोंवाली नदी की धारा की जलवृद्धि से उत्पन्न भँवरों ( भ्रमि-समूहों ) से बुरी तरह फेके जानेवाले तृणसमूह की विडम्बना का अनुभव क्यों न करेंगे ? सारांश यह कि 'एकेन स्वीकर्त्रा' यहाँ 'एकत्वसंख्यायोगित्व क्या है ?' इसके विवेचन के लिए प्रवृत्त आप उसका निर्वचन किये बिना ही पुनः 'एकेन' यह विशेषण देते हैं, तो वह उचित नहीं है । कारण
परिच्छेद ] अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ४०३ कथय कथं न घनघनाघनसमय-समागमोदीयमान-तरलतरतरङ्गिणीवेणिजलविवर्त- निर्वर्तितावर्तचक्रचङ्क्रम्यमाण-तृणकदम्वविडम्बनामनुभविष्यसि । स्वीकृत्यास्वीकारः स इति चेन्न । क्त्वार्थविवेचनेन उक्तबाधापातात् , अस्वीकृत्य स्वीकारे च तदभावापत्तेः । किञ्च—सिद्धान्तपरित्यक्तरि यदपसिद्धान्तोद्भावनं तत् किं स्वीकृतदर्शनानु- मतापसिद्धान्तदूषणाभावे वादिनि, उतानेवम्भूते । आद्ये पूर्वसिद्धान्तवदपसिद्धान्ते- ऽप्यनेन व्युत्थातुं शक्यते तत्र किं वक्तव्यम् ? न तावन्न वक्तव्यमेव किञ्चित् पूर्वसिद्धान्तत्यागादेवापसिद्धान्तेन निगृहीतत्वा- दिति युक्तम्; अपसिद्धान्ते तत्परिहारस्य तद्दूषणत्वान्यतरासिद्धेस्तेनाभिहितत्वात् । एक-शब्द का निर्वचन सिद्ध होने पर ही विशिष्ट लक्षण सिद्ध होगा । उसके सिद्ध होने पर उक्त अतिप्रसंग का परिहार सिद्ध होगा और वह सिद्ध होने पर एकवचन का निर्वचन सिद्ध हो सकेगा, इस तरह चक्रक हो जायगा । समर्थन—'स्वीकृत्य ( स्वीकार करके ) अस्वीकार अपसिद्धान्त है ।' खण्डन— यह भी अयुक्त है, कारण 'क्त्वा' का अर्थ एककर्तृकत्व भी है । अतः एक शब्द के अर्थ का विवेचन करने पर पुनः उक्त दोष आ ही जायेंगे । सिवा इसके शब्द नित्यत्ववादी पहले उसे अनित्य न मानता हुआ भी बाद में मान लें, तो उस अपसिद्धान्त में अव्याप्ति हो जायगी । कारण 'स्वीकृत्य' यहाँ 'क्त्वा' प्रत्यय का अर्थ स्वीकारपूर्वक अस्वीकार ही अर्थ होता है और वैसा अस्वीकार वहाँ नहीं है । किञ्च—सिद्धान्त को त्यागनेवाले वादी के प्रति आप जो अपसिद्धान्त देते हैं, वह किस वादी के प्रति, क्या जिसके दर्शन (शास्त्र) में अपसिद्धान्त दूषण मान्य है, उसके प्रति या जिसके दर्शन में अपसिद्धान्त दूषण अनुमंत नहीं है, उसके प्रति ? प्रथम पक्ष में वह वादी पूर्व-सिद्धान्त के तुल्य अपसिद्धान्त का भी अस्वीकार कर सकता है, वहाँ आप क्या कहेंगे ? समर्थन—वहाँ कुछ नहीं कहेंगे, कारण पूर्वसिद्धान्त के त्यागने से अपसिद्धान्त- रूप निग्रहस्थान से ही वह निगृहीत ( पराजित ) है । मृत का मारण अयुक्त ही है । खंडन—यदि वह अपसिद्धान्त दूषण को स्वीकार करता, तो अपसिद्धान्त से निगृहीत अवश्य होता । किन्तु वह अपसिद्धांत को निग्रहस्थान मानता ही नहीं, अतः उसने अप- सिद्धांत-दूषण का अस्वीकाररूप परिहार या अपसिद्धांत का परिहार इन दोनों में से
४०४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय अन्यथा स्वाभिप्रायेणासिद्धिमुद्भाव्यैव कथं विच्छिन्दानो विजयेत परासिद्धिपरिहारं नापेक्षेतेति अनसिद्धावप्यसिद्धिमुद्भाव्य परं पराजित्याप्रत्यूहं गृहान् प्रतिष्ठेत । निगृहीतस्य तस्यापरमभिधानमनादरणीयमेवेति चेन्न । अन्यतरासिद्ध्या निग्रहपरिहारस्यैव तेनाभिधीयमानत्वात् । तथाऽप्यनादरगोऽनसिद्धावसिद्धिमुद्भाव्य पराभिधीयमानमसिद्धिपरिहारमनादृत्य विजयेतैवेत्युक्तम् । अथ मन्यसे—मध्यस्थेनैतद्विचारणीयं किमनसिद्धावनेनासिद्धिरुक्ता, अनप- सिद्धान्ते वाऽपसिद्धान्तः । एतद्विचार्य तेनैव जयपराजयोवधारणीयौ । तदर्थमेव मध्यस्थोपस्थापनमिति । न; तर्हि वादिना साधनेऽभिहिते दुष्टमेतदित्यभिधायैव प्रतिवादिना निवर्तनीयम् । मध्यस्थस्तु परमार्थतो दुष्टत्वमदुष्टत्वं वा तस्य साधनस्य विचार्य जयपराजयोवधारयिष्यति । सोऽयं प्रसूय निर्वृत्तीभूतपिकदाम्पत्यापत्य- अपसिद्धान्त-दूषण का अस्वीकाररूप अपसिद्धान्त का परिहार कर ही दिया, फिर वह निगृहीत कैसे होगा ? अन्यथा ( यदि अपसिद्धांत को स्वीकार न करके भी अपसिद्धांत से निगृहीत हो तो ) अपने अभिप्राय से रचित असिद्ध का उद्भावन कर कथा का विच्छेद करनेवाला भी विजय प्राप्त कर सकता है । वह वादी-कृत असिद्ध-परिहार की अपेक्षा भी नहीं करेगा । अतः वह जहाँ असिद्ध नहीं है, वहाँ भी असिद्ध का उद्भावन कर वादी को पराजित मानकर निर्विघ्न अपने घर प्रस्थान करेगा। समर्थन—वह हार गया है, अतः उसका बाद में कुछ कहना आदरणीय ही न होगा । खण्डन—उसने अपसिद्धान्त का अस्वीकार कर उसीका परिहार किया है, वह हारा नहीं है । फिर भी यदि उसके वचन का आदर न करे, तो जहाँ असिद्धि नहीं है, वहाँ भी असिद्धि का उद्भावन कर प्रतिवादी द्वारा किये गये असिद्धि- परिहार का आदर न करते हुए विजय का लाभ कर लें । समर्थन—मध्यस्थ को यह विचारना चाहिए कि जहाँ असिद्धि नहीं है, वहाँ यह असिद्धि उद्भावित हुई है; जहाँ अपसिद्धान्त नहीं है, वहाँ यह अपसिद्धान्त उद्भावित हुआ है और इस प्रकार विचारकर उसीको जय-पराजय की व्यवस्था करनी चाहिए । इसीलिए तो वाद में मध्यस्थ होता है । खंडन—यदि ऐसा मानें, तो वादी द्वारा साधन (हेतु) कहने पर प्रतिवादी को 'यह दुष्ट है' इतना ही कहकर निवृत्त हो जाना चाहिए, कारण मध्यस्थ ही उस साधन के परमार्थतः दुष्टत्व या अदुष्टत्व का विचारकर जय-पराजय की व्यवस्था कर लेगा । तुम्हारी ऐसी कुत्सित मन्त्रणा से बेचारा
परिच्छेद ] अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ४०५ पोषणकृतमहायासवायसव्यसनं समासादयिष्यति मध्यस्थो वराकस्तावकदुष्परा- मर्शप्रकर्षेण । अथोच्यते—सम्प्रति विप्रतिपद्यतां नामापसिद्धान्तेऽप्यसौ किमेतावता, पूर्वं स्वीकृतापसिद्धान्तदूषणभावस्य दर्शनस्य तावत्तेन स्वीकरणमकारि। तदेवाऽऽदा- यापसिद्धान्तोपन्यासो युक्त इति । मैवम्; यदीदानीन्तन्त्यननुमतिरस्य नाद्रियते, अस्यामुपजातायामपि प्राक्तनानुमतिमादायैव च दूषणप्रवृत्तिस्तदाऽपसिद्धान्तस्यापि कुतोऽवकाशः। स हि पूर्वानुमतस्येदानीमननुमतिमाश्रित्यैव प्रवर्तते, नान्यथा । तस्मात् स्वीकृता- प्रसिद्धान्तदूषणभावमपि वादिनं प्रति विप्रतिपत्तिकाल साधनीयमपसिद्धान्तस्य दोषत्वमिति द्वितीयानवकाशः। यस्य तु सौगतादेर्मतेऽपसिद्धान्तो न दूषणं तं प्रत्यवश्यं साधनीयमेवास्य दूषणत्वम् । न च वाच्यं योऽपसिद्धान्ते विप्रतिपत्तिं करोति तं प्रति व्याघात एवाभि- मध्यस्थ स्वयं उत्पन्न कर निवृत्त हुए कोकिल के अपत्य के पालन में महान् परिश्रम करनेवाले काक के दुःख को पायेगा। समर्थन—सम्प्रति वह अपसिद्धान्त को न मानता हो, तो उससे हानि क्या हुई, जिस दर्शन में अपसिद्धान्त दूषण स्वीकृत है, उस दर्शन का तो वह स्वीकार करता ही है। इसीसे उस पर अपसिद्धान्तरूप निग्रह का उपन्यास हो सकता है। खण्डन—यदि प्रतिवादी की वर्तमानकालिक अनुमति के अभाव का आदर न करें, अर्थात् वर्तमान काल में अस्वीकार होने पर भी भूतकालिक स्वीकार का ग्रहण करके ही दूषण की प्रवृत्ति हो, तो अपसिद्धान्त ही कैसे होगा, कारण वह पूर्वानुमत का ही वर्तमान काल में अस्वीकार करता है, अन्यथा नहीं करता और वर्तमान अस्वीकार का आप आदर ही करते नहीं। तस्मात् जो वादी अपसिद्धान्त-दूषण को स्वीकार न करता हो, उसके प्रति विप्रतिपत्ति-काल में अपसिद्धान्त-दूषण का साधन अवश्य करना होगा। अतः इस विषय में मध्यस्थ का अवकाश ही नहीं। अर्थात् अपसिद्धान्त है या नहीं, इसका निर्णय मध्यस्थ करेगा, इत्यादि आपका कथन युक्त नहीं है। साथ ही सौगत आदि अपसिद्धान्त को दूषण न मानें, तो उनके प्रति भी अपसिद्धान्त दूषण का साधन करना होगा। समर्थन—जो अपसिद्धान्त में विप्रतिपत्ति करते हों, उनके प्रति व्याघात का ही