भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 416, कुल 610 में से

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पृष्ठ 416

३६६ सोनुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ द्वितीय एव दुर्निवारा स्यात् । मैवम्; मिथो विरुद्धायाः प्रतिबन्द्यास्तर्काभासत्वात्, मिथो विरुद्धत्वस्य तर्कदूषणत्वात् । सत्प्रतिपक्षानुमानवद् द्वयोरपि परस्परप्रति- क्षेपेणैव उपक्षीणत्वादिति । न्याय-द्वितीयाध्यायप्रथमाह्निकसूत्रे च 'प्रमेयता च तुलाप्रामाण्यवत्' इत्यत्र आपादितदृष्टान्ताभावलक्षणदोषसाम्येन प्रत्यवस्थितं पूर्वपक्षवादिनं निराकर्तुमाचार्यः तो पर के सिषाधयिषित मेरे अनिष्ट की सिद्धि होती है—इस प्रकार उभयतः पाश- प्रतिबन्दी वेदान्ती पर ही होती है । खंडन—असिद्धि आदि दोषों के अभिधान- अनभिधान से मेरे पक्ष में दोष का आपादन आप करते हैं—यह तृतीय प्रतिबन्दी होती । है वह युक्त नहीं, कारण परस्पर विरुद्ध दो धर्मों में एक का आपादन तर्काभास हो जाता है, कारण मिथोविरोध तर्क का दोष है। आपके मत में प्रतिबन्दी को तर्क- विशेष ही माना गया है । सत्प्रतिपक्षानुमान के तुल्य यदि अभिधान पक्ष में दोष हो, तो अनभिधान पक्ष दोषयुक्त नहीं है और यदि अनभिधान पक्ष में दोष हो, तो अभिधान पक्ष में दोष नहीं है—इस प्रकार परस्पर के प्रतिक्षेप से दोनों पक्षों में दोष अनुपपन्न है । समर्थन—यदि इस तरह आप प्रतिबन्दी को दूषक न मानें, तो 'यत्रोभयोः समो दोषः' इत्यादि वचन द्वारा भट्टपाद ने उसे जो दूषक बतलाया है, उससे विरोध हो जायगा । खंडन—भट्टपाद के उक्त वचन के साथ उद्योत- कर के वचन का विरोध होने से उसमें हमारा कोई आदर नहीं है। इसी बात को ग्रन्थकार के शब्दों में कहना हो, तो यों कहा जा सकता है कि 'न्यायदर्शन के द्वितीयाध्याय के प्रथम आह्निक के १६ वें सूत्र ( 'प्रमेयता च तुलाप्रामाण्यवत्' ) के वार्तिक में आपादित दृष्टान्ताभावरूप दोषसाम्य द्वारा प्रत्यवस्थित पूर्वपक्षवादी का निराकरण करते हुए जिन आचार्य उद्योतकर ने 'समानमित्यनुत्तरमभ्युपगमात्' इत्यादि कहा है, उन्हींको भट्ट का प्रतिभट ( प्रतियोद्धा ) बना दीजिये।' अर्थात् उन्होंने भी भट्ट के इस वचन की उपेक्षा की है, अतः वे ही भट्ट से निपट लें । हम तो उद्योतकर का वह वचन प्रमाण मानकर प्रतिबन्दी को अदूषक ही मानेंगे, यह भाव है । उक्त सूत्र, भाष्य और वार्तिक का पूरा प्रसंग इस प्रकार है—शंका हुई कि चक्षु आदि प्रमेय होने से उनमें प्रमाणत्व कैसे रहेगा, क्योंकि प्रमाकरणत्वरूप प्रमाणत्व और

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