खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘समानमित्युत्तरमभ्युपगमात्, अभ्युपगतं तावद्भवता नास्मत्पक्षे दृष्टान्तोऽस्तीति’ ब्रुवन्नुद्द्योतकरो ‘यत्रोभयोस्ति’त्यादि वदतो भङ्गस्य प्रतिभटीकर्तव्यः । अपसिद्धान्त-लक्षण-खण्डनम् तत् किं प्रतिबन्द्यादि दूषणं न भवत्येव ? नन्वेवं भवतोऽपसिद्धान्तः प्रमाविषयत्वरूप प्रमेयत्व परस्पर विरोधी होने से एक में दोनों नहीं रह सकते । इस पर समाधान करते हुए सूत्रकार ने कहा—‘प्रमेयता च तुलाप्रामाण्यवत् ।’ यहाँ ‘च’ शब्द का अर्थ ‘अपि’ ( भी ) है । एवञ्च जैसे तुला या तराजू प्रमेय होती हुई भी प्रमाण ( प्रमापक ) होती है । यहाँ भाष्यकार, वार्तिककार ने और भी उदाहरण देते हुए कहा है कि ‘जैसे एक ही वृक्षरूप पदार्थ में अनेक कारकत्व और अनेक कालयोगित्व का व्यवहार होता है, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिए । एक में अनेक कालसम्बन्धिता में प्रमाण कारण का कार्यानुगतत्व रूप में अनुभव ही है ।’ इस पर बौद्ध कहता है कि ‘यह ठीक नहीं, अननुगत ही कारण और अनन्वित ही कार्य हैं, क्योंकि क्षणिक पदार्थों में ही कार्य-कारणभाव हुआ करता है । एवञ्च कारण से कार्य अनुगत है, इसमें कोई प्रमाण नहीं ।’ इस पर नैयायिक कहता है कि ‘कारण से अननुगत ही कार्य होता है, इसमें कोई दृष्टान्त नहीं है ।’ बौद्ध इसके उत्तर में कहता है—‘कार्य के ‘कारण से अनुगत होने में भी तो कोई दृष्टान्त नहीं है ।’ इस प्रकार प्रतिबन्दीरूप प्रश्न करने पर उसके समाधान में प्रयुक्त ‘समानमिति अनुत्तरमभ्युपगतत्वात्’ इस सूत्र के व्याख्यान में उद्योतकर ने इस बात को मान लिया है कि मेरे पक्ष में दृष्टान्त नहीं है, अतः स्वमत में दृष्टान्ताभाव को मानकर परपक्ष में दृष्टान्ताभावरूप दोष देनेवाले आपके प्रति मतानुज्ञा नामक निग्रहस्थान प्राप्त हुआ । अर्थात् यहाँ उद्योतकर ने स्पष्ट ही प्रतिबन्दी को दूषक मानकर प्रतिपक्षी को मतानुज्ञा नामक निग्रहस्थान से निगृहीत किया है । अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन प्रश्न—तब क्या प्रतिबन्दी आदि दूषण होते ही नहीं ? ऐसा मानने पर तो आपको अपसिद्धान्त दोष हो जायगा । कारण स्थान-स्थान पर शंकराचार्य प्रभृति ने प्रतिबन्दी को माना ही है । उत्तर—यदि ऐसा है, तो प्रकृत से सम्बद्ध होने के कारण ‘अपसिद्धान्त’ का ही लक्षण बतलाइये । लक्षण न कहकर केवल वचनमात्र से