भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 418, कुल 610 में से

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पृष्ठ 418

स्यादिति चेत्; तर्हि दर्शय अपसिद्धान्तस्य लक्षणं प्रकृतसम्बद्धतया । वाङ्मात्रे- णापसिद्धान्ते भवतः किमिति नापसिद्धान्तः स्यात् । सिद्धान्तविपरीताभ्युपगमोऽपसिद्धान्तः । प्रतिबन्द्यादि च भवता सिद्धान्तत्वे- नाभ्युपेतम्, ' मयेदं दर्शनमाश्रित्याभिधेयमि' ति भवता दर्शनविशेषस्याभ्युपेतत्वात् । दर्शनस्य च तत्तत्पदार्थस्वीकारात्मकत्वात्, तेषु च पदार्थेषु प्रतिबन्दीदूषणादेः प्रविष्टत्वादिति चेन्न । लक्षणमेव तावदपसिद्धान्तस्य नोपपद्यते, मत्सिद्धान्तविप- रीतमभ्युपगच्छतो भवतोऽपसिद्धान्तप्रसङ्गात् । स्वसिद्धान्तस्तथाऽपेक्षित इति चेन्न । विशेषणपूरणमन्तरेण तदलाभात् । अन्यथा सर्वत्र विशेषणोपादानप्रयासवैयर्थ्यं स्यात् । एवमेवाभ्युपगमे भवत एवाप- सिद्धान्तकृत्या निवृत्त्याऽऽपतेत् , त्वत्सिद्धान्ते शतशो हेत्वादौ विशेषणोपादान- यदि अपसिद्धान्त हो जाता हो, तो आपको ही अपसिद्धान्त क्यों नहीं है ? अर्थात् लक्षणाधीन ही लक्ष्य का ज्ञान होता है, अतः प्रथम अपसिद्धान्त का लक्षण ही कहिये । निर्वचन—'सिद्धान्त से विपरीत का अभ्युपगम ( स्वीकार ) अपसिद्धान्त है।' आप प्रतिबन्दी आदि को सिद्धान्तरूप से मानते हैं, कारण 'हम अमुक दर्शन का आश्रयण कर कहेंगे' इस प्रकार कहकर आपने दर्शन ( शास्त्र )-विशेष को मान ही लिया है । दर्शन तत्तत् पदार्थों का स्वीकारात्मक है और उन पदार्थों में प्रतिबन्दी दूषण भी प्रविष्ट है । खण्डन—अपसिद्धान्त का यह लक्षण ही युक्त नहीं, कारण मेरे सिद्धान्त से विपरीत सिद्धान्त का अभ्युपगम तो आप भी करते हैं, अतः आपके इस अभ्युपगम में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'स्वसिद्धान्त से विपरीत का अभ्युपगम अपसिद्धान्त है।' दूसरे के सिद्धान्त से विपरीत सिद्धान्त मानने में तो कहीं भी अपसिद्धान्त नहीं होता । खंडन—जबतक 'स्व' का विशेषण रूप से निवेश न हो, तबतक उक्त अर्थ का लाभ ही नहीं होगा । अन्यथा [ यदि विशेषण-प्रवेश के बिना ही विशेषण का लाभ हो जाता हो तो ] सर्वत्र विशेषण के उपादान का प्रयास ही व्यर्थ हो जायगा । क्षण- भर यह मान लें कि विशेषण देने में श्रम व्यर्थ ही है अर्थात् बिना विशेषण दिये ही सर्वत्र विशेषण का लाभ हो जाता है, तो अपसिद्धान्तरूप कृत्या लौटकर आप पर ही आ गिरेगी, कारण आपके शास्त्र में शतशः हेतु आदि में विशेषणों का उपादान

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