भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 453

४३४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ सम्बन्धं विशिष्टबुद्धी रूपादिस्वभावसामर्थ्यात्समर्थिता तथा विना धर्मिणमप्य- स्त्विति जितं जैनैः । स्यादप्येवं यदि शुक्ल इत्येतावन्मात्राद्येव प्रतीयेत । किन्तु 'शुक्लः शङ्खः' इत्यादिना प्रत्ययेन सामानाधिकरण्यमुल्लिखता धर्म्यप्यानीय दीयत इति चेन्न । शङ्खत्वजातेरुपाधेर्वा रूपादेरविरलतादृगावस्थितस्य वा स्वरूपवैलक्षण्यमेव तत्पदे- ऽभिषिच्यतां येन विनाऽप्यधिकरणं सामानाधिकरण्यव्यवहारः स्यात् । किञ्च—नैतावन्मात्रम्, बुद्धिमादाय तदर्थगतवैचित्र्यान्तरखण्डने बुद्धिरेव स्वकारणसामर्थ्यात्तथोत्थिता तत्तद्व्यवहारप्रसवित्री स्वीक्रियतां कृतमर्थव्यसनेन । तस्मात्— 'प्रत्येतव्यस्य वैचित्र्यं प्रत्ययोल्लेखसाक्षिकम् । धियं निवेश्य लुम्पद्भ्यो भङ्गं साद्येव यच्छति ॥ १ ॥' यत्तु—केनचिदभावस्य स्थाने तन्मात्रधीरभिषिक्ता, तत्तस्य परमुचितम् । जैसे बिना सम्बन्ध के रूपादि के स्वभाव से विशिष्टबुद्धि होगी, वैसे ही बिना धर्मी के भी विशिष्टबुद्धि हो जायगी । अतः धर्मी को भी न माननेवाले बौद्ध जीत ही गये । समर्थन—ऐसा संभव हो सकता, यदि 'शुक्लः' इत्याकारक ही प्रतीति होती । किन्तु सामानाधिकरण्य का उल्लेख करनेवाले 'शुक्लः शंखः' इस ज्ञान से धर्मी भी गृहीत होता है । खण्डन—शंखत्वजाति या उपाधि तथा एकज्ञानविषय रूपादि के स्वरूप के वैलक्षण्य को ही धर्मी के स्थान पर अभिषिक्त कीजिये, जिससे अधिकरण के बिना भी सामानाधिकरण्य-व्यवहार हो जायगा । किञ्च—यही नहीं, किन्तु यदि बुद्धि को ग्रहणकर उसके अर्थ के वैचित्र्य का खण्डन करें, तो स्वकारण की सामर्थ्य द्वारा विचित्र रूप से उत्थित बुद्धि को ही उस-उस व्यवहार का जनक मान लीजिये, बाह्य अर्थ के स्वीकार का व्यसन व्यर्थ है । तस्मात्— ज्ञान का आकार जिसमें प्रमाण है, ऐसे प्रत्येत्तव्य ( विशिष्टरूप विषय ) के वैलक्षण्य का—बुद्धिघटित लक्षण का निवेशकर—अपलाप करनेवाले मनुष्य को इस प्रकार बाह्य पदार्थमात्र के खण्डन द्वारा बुद्धि ही पराजय देगी । अर्थात् अतिरिक्त विशिष्ट का खण्डन कक्षाक्रम से प्रपञ्च के मिथ्यात्व में ही पर्यवसित होता है, अतः उसे सत्य माननेवाले नैयायिक के लिए वह अपसिद्धान्त हो जायगा ॥ १ ॥' जो मीमांसक (प्रभाकर) अभाव के स्थान पर अभाव-बुद्धि को अभिषिक्त करते हैं—