खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 454, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] विशिष्ट-लक्षण का खण्डन ४३५ 'गुरुधियमभावस्य स्थाने स्थानेऽभिषिक्तवान् । प्रसिद्ध एव लोकेऽस्मिन् बुद्धबन्धुः प्रभाकरः ॥ २ ॥' अपिच—एकबुद्ध्यारूढोऽनेकश्च सम्बन्धश्च विशिष्ट इति पक्षे योऽप्येवं- रूपवैलक्षण्यभाग्विशिष्ट इति कथ्यते, सोऽप्ययं विशिष्टोऽविशिष्टाद्वैलक्षण्येन बोध्यमानो ज्ञानमन्तर्भाव्यैव स्यादिति तत्र तत्रापि ज्ञानान्तरनिवेशनेऽनवस्था । क्वचिदनिवेशे तदभावादविशिष्टत्वे शेषस्याऽऽमूलमविशिष्टत्वापातः । तद्योग्यस्तथेति चेत् । न; तर्हि योग्यताऽपि तद्विशेषणं वालुकावद्- संलग्नाऽतिप्रसङ्गिकैवेत्युक्तमावर्तते । एवमेकमिति ज्ञानमित्यारूढमित्यादिद्वारैर्द्रष्टव्यम् । तथाहि – 'अविशिष्टाद्विशिष्टस्य वैशिष्ट्ये यदि धीर्विशेत् । तद्बुद्धिधाराविश्रान्तिः स्याद्वा मूलाविशिष्टता ॥ ३ ॥'—इति । 'घटाभाववत् भूतलम्' इत्याकारक ज्ञान ही भूतल में घटाभाव है, उक्त बुद्धि से अन्य घटाभाव बाह्य पदार्थ नहीं है, ऐसा कहते हैं, उनका वह कथन युक्त ही है। कारण इस लोक में वे 'गौतमश्चार्कबन्धुश्च' इस अमरकोष के अनुसार ( अर्कप्रभाकर है बन्धु जिसका ) बुद्ध के बन्धु प्रसिद्ध ही हैं ॥ २ ॥ किञ्च—एकबुद्धि में आरूढ, अनेक तथा सम्बन्ध-विशिष्टत्व विशिष्ट का जो लक्षण है, उस रूप का विशिष्ट भी लक्ष्य ही है । अतः उसकी अविशिष्ट से व्यावृत्ति भी अन्य ज्ञान से घटित उक्त लक्षण से ही होगी । एवञ्च ज्ञानपरम्परा के निवेश से अनवस्था हो जायगी । यदि अन्य ज्ञान का निवेश न करें, तो मूलपर्यन्त अविशिष्ट हो जायगा । समर्थन—लक्षण-विशिष्ट में अन्यज्ञानघटित लक्षण नहीं रहता, किन्तु ज्ञान की योग्यता से घटित ही लक्षण रहता है । अतः ज्ञान-परम्परा का निवेश न होने से अनवस्था नहीं है । खण्डन—योग्यताघटित उक्त लक्षण-विशिष्ट में भी यदि उक्त लक्षण को मानें, तो अनवस्था और यदि न मानें, तो मूलपर्यन्त अवैशिष्ट्य हो जायगा । इसी प्रकार एकत्वविशिष्ट एक, ज्ञानत्वविशिष्ट ज्ञान और आरूढत्वविशिष्ट आरूढ़- रूप विशेषण से विशिष्ट जो लक्षणरूप विशिष्ट, वह भी लक्ष्य होने से उसमें लक्षण का वैशिष्ट्य मानना होगा । इस प्रकार विशेषण-परम्पराविशिष्ट लक्षण-परम्परा स्वीकार करने में अनवस्था जाननी चाहिए । उक्तार्थ का संग्राहक श्लोक कहते हैं— लक्षण-विशिष्ट की अविशिष्ट से व्यावृत्ति यदि अन्य ज्ञान से घटित उक्त लक्षण से मानें, तो ज्ञान-परम्परा मानने में अनवस्था और यदि व्यावृत्ति न करें, तो मूलपर्यन्त अवैशिष्ट्य हो जायगा ॥ ३ ॥