भारतकोश
संग्रह पर लौटें

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

परिच्छेद ] विशिष्ट-लक्षण का खण्डन ४३५ 'गुरुधियमभावस्य स्थाने स्थानेऽभिषिक्तवान् । प्रसिद्ध एव लोकेऽस्मिन् बुद्धबन्धुः प्रभाकरः ॥ २ ॥' अपिच—एकबुद्ध्यारूढोऽनेकश्च सम्बन्धश्च विशिष्ट इति पक्षे योऽप्येवं- रूपवैलक्षण्यभाग्विशिष्ट इति कथ्यते, सोऽप्ययं विशिष्टोऽविशिष्टाद्वैलक्षण्येन बोध्यमानो ज्ञानमन्तर्भाव्यैव स्यादिति तत्र तत्रापि ज्ञानान्तरनिवेशनेऽनवस्था । क्वचिदनिवेशे तदभावादविशिष्टत्वे शेषस्याऽऽमूलमविशिष्टत्वापातः । तद्योग्यस्तथेति चेत् । न; तर्हि योग्यताऽपि तद्विशेषणं वालुकावद्- संलग्नाऽतिप्रसङ्गिकैवेत्युक्तमावर्तते । एवमेकमिति ज्ञानमित्यारूढमित्यादिद्वारैर्द्रष्टव्यम् । तथाहि – 'अविशिष्टाद्विशिष्टस्य वैशिष्ट्ये यदि धीर्विशेत् । तद्बुद्धिधाराविश्रान्तिः स्याद्वा मूलाविशिष्टता ॥ ३ ॥'—इति । 'घटाभाववत् भूतलम्' इत्याकारक ज्ञान ही भूतल में घटाभाव है, उक्त बुद्धि से अन्य घटाभाव बाह्य पदार्थ नहीं है, ऐसा कहते हैं, उनका वह कथन युक्त ही है। कारण इस लोक में वे 'गौतमश्चार्कबन्धुश्च' इस अमरकोष के अनुसार ( अर्कप्रभाकर है बन्धु जिसका ) बुद्ध के बन्धु प्रसिद्ध ही हैं ॥ २ ॥ किञ्च—एकबुद्धि में आरूढ, अनेक तथा सम्बन्ध-विशिष्टत्व विशिष्ट का जो लक्षण है, उस रूप का विशिष्ट भी लक्ष्य ही है । अतः उसकी अविशिष्ट से व्यावृत्ति भी अन्य ज्ञान से घटित उक्त लक्षण से ही होगी । एवञ्च ज्ञानपरम्परा के निवेश से अनवस्था हो जायगी । यदि अन्य ज्ञान का निवेश न करें, तो मूलपर्यन्त अविशिष्ट हो जायगा । समर्थन—लक्षण-विशिष्ट में अन्यज्ञानघटित लक्षण नहीं रहता, किन्तु ज्ञान की योग्यता से घटित ही लक्षण रहता है । अतः ज्ञान-परम्परा का निवेश न होने से अनवस्था नहीं है । खण्डन—योग्यताघटित उक्त लक्षण-विशिष्ट में भी यदि उक्त लक्षण को मानें, तो अनवस्था और यदि न मानें, तो मूलपर्यन्त अवैशिष्ट्य हो जायगा । इसी प्रकार एकत्वविशिष्ट एक, ज्ञानत्वविशिष्ट ज्ञान और आरूढत्वविशिष्ट आरूढ़- रूप विशेषण से विशिष्ट जो लक्षणरूप विशिष्ट, वह भी लक्ष्य होने से उसमें लक्षण का वैशिष्ट्य मानना होगा । इस प्रकार विशेषण-परम्पराविशिष्ट लक्षण-परम्परा स्वीकार करने में अनवस्था जाननी चाहिए । उक्तार्थ का संग्राहक श्लोक कहते हैं— लक्षण-विशिष्ट की अविशिष्ट से व्यावृत्ति यदि अन्य ज्ञान से घटित उक्त लक्षण से मानें, तो ज्ञान-परम्परा मानने में अनवस्था और यदि व्यावृत्ति न करें, तो मूलपर्यन्त अवैशिष्ट्य हो जायगा ॥ ३ ॥

४३६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ चतुर्थे विशिष्टनिरासेन च सर्वाणि लक्षणानि निरस्तानीति मन्तव्यम् । यथा— 'गुणाश्रयो द्रव्यमि'त्यादि । द्रव्य-लक्षण-खण्डनम् इतोऽपि गुणाश्रयो द्रव्यमित्यसङ्गतम् । तथाहि—कथमेतल्लक्षणमवधारणीयम्, सङ्ख्यारूपगुणवत्तया रूपादेरपि प्रतीतेः । भ्रान्तिर साविति चेत्; पृथिव्यादौ कथमभ्रान्तिरिति वक्तव्यम् । तत्र बाधकाभावादिति चेत्; तुल्यम् । गुणस्य गुणवत्तायां बाधकमस्माभिरवश्यं वक्तव्यम्, 'निर्गुणा गुणाः' इति सिद्धान्तादिति चेन्न । रूपादेर्गुणत्वस्यैव निश्चेतुमशक्यत्वात् । 'सामान्यवान्गुणः' इत्यादिगुणलक्षणयोगात्तन्निश्चय इति चेन्न । 'अगुणः' विशिष्ट के खण्डन से सम्पूर्ण लक्षण खण्डित जानने चाहिए। कारण विशिष्ट के प्रवेश के बिना कोई भी लक्षण नहीं हो सकता। जैसे—'गुण-विशिष्ट द्रव्य है' यह द्रव्य-लक्षण । द्रव्य-लक्षण का खण्डन वक्ष्यमाण दोषों से 'गुणविशिष्ट द्रव्य है' यह लक्षण भी असङ्गत है । देखिये—संख्यारूप गुण रूप, रस आदि में भी रहते हैं । फिर यह कैसे जाना जाय कि गुणविशिष्ट द्रव्य ही होता है ? यह भी नहीं कह सकते कि 'रूप-रस में सङ्ख्या की प्रतीति भ्रम है', कारण भ्रान्ति अभ्रान्तिपूर्वक होने से पृथिवी आदि द्रव्यों में संख्यावत्त्व की प्रतीति को पहले अभ्रान्ति सिद्ध करना पड़ेगा । वह हो नहीं सकता, क्योंकि पृथ्वी आदि में संख्या की प्रतीति भ्रम नहीं है, इसमें कुछ प्रमाण नहीं है । यह भी नहीं कह सकते कि 'इयं प्रतीतिः, न भ्रान्तिः, अबाध्यप्रतीतित्वात्' यह अनुमान ही पृथिव्यादि में संख्यावत्त्वप्रतीति की अबाध्यता में प्रमाण है । कारण रूपादि में संख्या की प्रतीति में भी उक्त बाधकाभाव तुल्य ही है । समर्थन—रूपादि गुणों में संख्यादि गुण नहीं रहते, इसमें हम बाधक अवश्य कह सकते हैं, कारण 'निर्गुणा गुणाः' यह सिद्धान्त है । खण्डन—प्रमाण न होने से 'रूपादि गुण हैं' यह भी निश्चित नहीं कर सकते । समर्थन—'जिसमें जाति रहती हो और गुण न रहता हो, वह गुण है'

परिच्छेद ] द्रव्य-लक्षण का खण्डन ४३७ इति गुणलक्षणांशस्यासिद्धेः सङ्ख्यावत्तया प्रतीतेर्विद्यमानत्वात् । भ्रान्तिरिति चेन्न । परस्पराश्रयप्रसङ्गात् । सङ्ख्यावत्तया प्रतीतेर्भ्रान्तित्वे गुणलक्षणसिद्धिः, तत्सिद्धौ च बाधेन भ्रान्तित्वस्थापनम् । न च हेत्वन्तराद्रूपादेर्गुणत्वसिद्धौ बाधकसिद्धिः ; दृष्टान्तस्यापि सङ्ख्या- योगिप्रत्ययाक्रान्तत्वेन प्रसक्तद्रव्यकोटिप्रवेशतया गुणत्वेनासिद्धेः । सङ्ख्यायाः सङ्ख्यावत्त्वेनानवस्थाप्रसङ्गात्, निःसङ्ख्यत्वव्यवस्थितौ दृष्टान्तत्वं सम्भविष्यतीति चेन्न । पृथक्त्वेनापि तस्याः सम्भावितद्रव्यकोटिप्रवेशत्वात् । एवं पृथक्त्वस्यापि सङ्ख्यावत्त्वेनेति । ‘जातीतरानाश्रयोऽकर्मरूपो गुणः' इत्यपि न ; जातिव्यापकत्वात् । जाति- इस लक्षण से निश्चय करेंगे कि रूपादि गुण हैं । खंडन—रूप में संख्यारूप गुणवत्त्व की प्रतीति होने से प्रस्तुत गुणलक्षणघटक 'अगुण' यह अंश ही असिद्ध है । समर्थन—रूप-रस आदि में संख्या की प्रतीति भ्रम है । खण्डन—अन्योन्याश्रय हो जायगा । देखिये—'रूप में संख्या की प्रतीति भ्रम है' ऐसा निश्चय होने पर रूप में गुणलक्षण की सिद्धि होगी और लक्षण की सिद्धि होने पर बाध होने से उक्त प्रतीति भ्रम सिद्ध होगी । समर्थन—'रूपादयो गुणाः सामान्यवत्त्वे सति अचलनत्मकत्वात् शब्दवत्' इस अनुमान से रूप में गुणत्व की सिद्धि होने पर उसमें संख्या का बाध सिद्ध हो जायगा । खंडन—शब्दरूप दृष्टान्त में संख्या के होने से उसका द्रव्य-कोटि में प्रवेश हो जाने के कारण दृष्टान्त का अभाव हो जायगा, जिससे अनुमिति नहीं होगी । यह भी नहीं कह सकते कि 'अनवस्था-भय से संख्या में संख्या न होने के कारण संख्या ही दृष्टान्त हो जायगी', कारण संख्या में भी पृथक्त्वरूप गुण रहता है । अतः उसका द्रव्य में ही अन्तर्भाव होने से वह दृष्टान्त नहीं हो सकता । इसी प्रकार पृथक्त्व में संख्या होने से वह भी दृष्टान्त नहीं हो सकता । समर्थन—'जो जाति से इतर का आश्रय न हो और कर्म से भिन्न हो, वह गुण है,' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—यह लक्षण भी जाति में अतिव्यास होने से अयुक्त है । समर्थन—'जो केवल जाति का ही आश्रय हो और कर्म से भिन्न हो, वह गुण है' ऐसा कहेंगे । खंडन—अभाव के सब गुणों में रहने से असम्भव हो जायगा । समर्थन— 'केवल जातिरूप भाव का जो आश्रय हो तथा कर्म से भिन्न हो, वह गुण है' ऐसा

४३८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ मात्राश्रय इत्येवार्थ इति चेन्न । अभावाश्रयतया सर्वाव्यापनात् । जातिमात्र- भावाश्रय इति चेन्न । उपाधीनामपि तदाश्रितत्वात् । नोपाधीनामाश्रयो रूपादिः, किन्तु कथमपि सम्बन्धी । तावतैवानुमानादि- प्रवृत्तिरिति चेन्न । उपाधिसम्बन्धं प्रत्यप्याश्रयत्वस्य मन्तव्यत्वात् । अन्यथा यदि किञ्चिद्रूपमत्र नेष्यते, तदा सामान्यविशेषानुमानं तत्र न स्यात्, व्यधिकरणयो- र्गम्यगमकभावानभ्युपगमात् । तस्माद्यदेतदेव लक्षणं तत्तावन्न जातिरूपम्, तदिदं रूपं यदि रूपादौ नास्ति तदानीमस्ति, यद्यस्ति तदा नास्तीति विचित्रेण लगेत्युक्ते न लगति, मा लगेत्युक्ते च लगतीति प्रवहिकामनुकरोति । अपिच—गुणाश्रय इत्यत्र कश्चाऽऽश्रयार्थः ? समवायीति चेन्न । गुणत्वादे- रपि द्रव्यत्वप्रसङ्गात्, गुणावच्छिन्नस्य समवायस्य गुणत्वेऽपि विश्रान्तत्वात् । लक्षण करेंगे। खण्डन -- गुण में प्रमेयत्व आदि उपाधियों के होने से पुनः असम्भव हो जायगा । समर्थन — यहाँ रूपादि प्रमेयत्व आदि उपाधियों के आश्रय नहीं, किन्तु किसी प्रकार सम्बन्धी हैं। अतएव 'रूपादि अभिधेयं प्रमेयत्वात्' इस अनुमिति की प्रवृत्ति होती है। खण्डन — रूपादि को प्रमेयत्व के सम्बन्ध का आश्रय अवश्य मानना होगा। यदि ऐसा न मानें, तो रूपादि में विशेषगुणत्व तथा संख्यादि में सामान्यगुणत्व का अनुमान नहीं होगा। कारण एक अधिकरण में न रहनेवालों में गम्यगमकभाव नहीं होता। वहाँ आपके मत में कोई उपाधि नहीं है। तस्मात् यह लक्षण जातिरूप तो है नहीं, किन्तु उपाधिरूप है। अतः यदि वह रूपादि में नहीं, तब तो लक्षण का समन्वय होने से है, और यदि है तो लक्षण का समन्वय न होने से नहीं है। एवञ्च आपका लक्षण 'लग' कहने पर तो नहीं लगता और 'मा लग' कहने पर लगता है—इस विचित्र पहेली का अनुकरण करता है¹। किञ्च—'गुण का आश्रय द्रव्य है' यहाँ सम्बन्ध द्वयाश्रय होने से 'आश्रय' शब्द का अर्थ क्या है ? 'समवायी' ( समवाय का सम्बन्धी ) यह अर्थ नहीं हो सकता, कारण गुण-समवाय गुणत्व में भी होने से वह भी द्रव्य हो जायगा । १ प्रश्न—ऐसी कौन वस्तु है, जो 'मा लग' कहने पर लगती हो और 'लग' कहने पर न लगती हो ? उत्तर—ओष्ठ ।

परिच्छेद ] द्रव्य-लक्षण का खण्डन ४३६ गुणः समवेतो यत्र स गुणसमवायीति विवक्षितमिति चेन्न । यत्रेत्यस्य अधिकरणार्थस्य अद्याप्यनिरूपणेन तेनैव तद्व्याकारानुपपत्तेः । इहेति प्रत्ययहेतुराधार इति चेन्न । 'इह शङ्खे पीतिमे'ति प्रत्ययाच्छङ्खस्य पीतगुणाधिकरणत्वप्रसङ्गात् । भ्रान्तिरसो, यथार्थश्च प्रत्ययोऽत्र विवक्षित इति चेन्न । तदर्थासत्त्वनिरूपणव्यतिरेकेण तदप्रामाण्यस्य बोद्धुमशक्यत्वात् । न चाद्यापी- हेति प्रत्ययस्यार्थः प्रतीतो यत्प्रतियोगिकमसत्त्वं तत्र निरूप्यते । पीतत्वं प्रतियोगी, तच्च क्वचित्सिद्धमेवेति चेन्न । तस्य प्रमितत्वादेवासत्त्वा- नुपपत्तेः । तत्र न तस्य प्रमितत्वमिति चेन्न । तत्रेत्याधारत्वानिरूपणादिति । एतेन 'समवायिकारणं द्रव्यमि'त्यपि लक्षणं निरस्तम् । कथं निर्णेतव्यम् 'इदं समर्थन—'गुण समवाय सम्बन्ध से जहाँ रहता हो, वह गुण-समवायी अर्थात् 'गुणसमवायानुयोगित्व' ही द्रव्य का लक्षण विवक्षित है । खण्डन—'इह' शब्द के अर्थ अधिकरण का अद्यावधि निरूपण न होने से अधिकरण से ही अधिकरण का लक्षण करना युक्त नहीं । समर्थन—" 'इह' इत्याकारक जो ज्ञान, उस ज्ञान का विषय अधिकरण है" ऐसा अधिकरण का लक्षण करेंगे । खंडन—'इह शंखे पीतिमा' ऐसी प्रतीति होने से शंख भी पीतिमा का आश्रय हो जायगा । 'उक्त प्रतीति भ्रम है और लक्षण में यथार्थ प्रतीति विवक्षित है, अतः शंख में पीतिमाधिकरणता की आपत्ति नहीं', यह नहीं कह सकते; कारण जबतक अधिकरणरूप अर्थ की असत्ता का निश्चय न हो, तबतक "शंखे पीतिमा' यह ज्ञान भ्रम है" ऐसा निश्चय नहीं हो सकता । अभीतक 'इह' इस ज्ञान का विषय निर्णीत नहीं है, जिसकी असत्ता का 'शंखे पीतिमा' इस ज्ञान में निश्चय करें । समर्थन—असत्त्व का प्रतियोगी पीतत्व है, वह पुष्पादि में कहीं सिद्ध ही है । खण्डन—पीतत्व के प्रमित होने से ही पीतिमा का असत्त्व नहीं है, तो भी शंखरूप अधिकरण में उसका असत्त्व है ही । खण्डन—जबतक अधिकरण की निरुक्ति न हो, तबतक 'शंखरूप अधिकरण में' आदि विशेष का प्रदर्शन नहीं कर सकते । समर्थन—'समवायिकारण द्रव्य है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन—घटादि सम- वायी कारण हैं और रूपादि नहीं, यह निश्चय कैसे हो ? कारण घटादि और रूपादि में संख्या-समवायिकारणत्व की युक्ति तुल्य है । अर्थात् 'एको घटः' इस प्रतीति की तरह

४४० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ समवायिकारणमिदं ने'ति, रूपा दौ घटादौ च सङ्ख्यासमवायिकारणत्वयुक्ते- स्तुल्यत्वात् । सङ्ख्यैव रूपा दौ नास्तीति चेत्; घटादौ कथमस्ति ? प्रत्ययस्योभयत्रापि तुल्यत्वादित्युक्तमनुषञ्जनीयम् । द्रव्य एव सङ्ख्यास्वीकारे तत्सम्बन्धात् गुणेऽपि तद्व्यवहारोपपत्तौ कल्पनालाघवात् गुणे सङ्ख्याद्यस्वीकार इति चेत्; विपरीतमैव कुतो न स्यात् ? सत्तासामान्याद्यपि गुणादौ किमर्थमङ्गीक्रियते, द्रव्यद्वारैव तत्र व्यवहारोपपत्तेः । सामान्य-लक्षण-खण्डनम् ननु सामान्यार्थ एव कः ? तथाहि—'अनुवृत्तप्रत्ययकारणं सामान्यमि'ति न लक्षणम् ; सामग्र्याः सर्वकार्योत्पत्तेः, तया तदेकदेशान्तरैश्च व्यभिचारात् । ‘एकं रूपम्’ यह समवायिता की प्रतीति तुल्य ही होती है। दोनों में किसी प्रकार का वैलक्षण्य नहीं है। समर्थन—रूप में संख्या नहीं है, अतः रूप में समवायी कारणत्वरूप लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है। खण्डन—घट में संख्या है, इसमें क्या प्रमाण है ? यदि ‘एको घटः’, ‘द्वौ घटौ’ इस प्रतीति को प्रमाण कहें तो ‘एकं रूपम्, द्वे रूपे’ इत्यादि प्रतीति से रूप में भी संख्या होने से उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—द्रव्य में ही संख्या समवाय से उत्पन्न होती है और गुण में संख्या-व्यवहार सामानाधिकरण्य सम्बन्ध से भी हो सकता है। फिर गौरव होने से रूप में संख्या-समवाय क्यों माना जाय ? खंडन—इसके विपरीत ही क्यों न मानें, अर्थात् गुण में समवाय से संख्या की उत्पत्ति और द्रव्य में उक्त परम्परा-सम्बन्ध से उसका व्यवहार क्यों न मानें ? किञ्च—फिर तो गुण में सत्ता सामान्य (जाति) क्यों मानते हैं ? द्रव्य में सत्ता है, तो उसीसे ही परम्परासम्बन्ध द्वारा गुण में सत्ता की प्रतीति का निर्वाह हो जायगा। सामान्य-लक्षण का खण्डन ‘सामान्य’ शब्द का क्या अर्थ है ? अर्थात् उसका भी निर्वचन नहीं किया जा सकता। देखिये—‘अनुवृत्त जो प्रत्यय अर्थात् अनेक वस्तुओं में एकाकार ज्ञान, उसका कारण सामान्य है’ यह लक्षण युक्त नहीं है, कारण सामग्री से सब कार्य होते हैं। अतः सामग्री में तथा सामग्री के एकदेश में लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। भाव यह है कि अनुगत प्रतीति केवल विषय के ही रहने से नहीं होती, प्रत्युत संपूर्ण प्रत्यय-सामग्री से होती है। अतः उस सामग्री में और उसके एकदेश चक्षु आदि में भी अतिव्याप्ति हो जायगी।

परिच्छेद ] सामान्य-लक्षण का खण्डन ४४१ असाधारणविशेषादनन्यजातीयप्रयोजकत्वञ्च तदिति चेन्न । स्वसामग्र्या- मपि प्रसङ्गात्तादवस्थ्यात्, भेदप्रतिपत्त्यादावपि प्रयोजकत्वाच्च । एतत्प्रतिपत्तिप्रमाणकत्वमिति चेन्न । स्वसामग्र्यामप्यस्याः प्रमाणत्वात् । एतदेकप्रमाणकत्वमिति चेन्न । अर्थक्रियाभेदादेरपि तत्र प्रमाणात्वात् । एतत्प्रतिपत्तिप्रमाकत्वमिति चेन्न । तद्विशिष्टस्यापि तत्त्वप्रसङ्गात् । तद्व- समर्थन—'अनुवृत्त प्रत्यय का असाधारण कारण सामान्य है' यहाँ अनन्यजातीय कार्य का अप्रयोजकत्व 'असाधारण' शब्द का अर्थ है । उक्त सामग्री या तदेकदेश कार्यान्तर का भी प्रयोजक होने से उसमें अतिव्याप्ति नहीं है। खण्डन—स्वसामग्री भी अन्यजातीय कार्य की अप्रयोजक होती है, अतः उसमें अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है । किञ्च—सामान्य तो 'अयं न महिषः गोत्वात्' इस भेदानुमिति का भी कारण होता है । अतः वह भी अनुवृत्त प्रत्यय का असाधारण कारण नहीं है । फलतः असंभव हो जायगा । समर्थन—'अनुवृत्त प्रत्यय है प्रमाण जिसमें, वह सामान्य है' ऐसा लक्षण करेंगे । अर्थात् 'असाधारण कारण' यहाँ 'कारण' शब्द का अर्थ 'प्रमाण' करेंगे । एवञ्च सामग्री के कारण होने पर भी उसमें अनुवृत्त प्रत्यय प्रमाण न होने से अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन—कार्य से कारण की अनुमिति होने से स्वसामग्री में भी अनुवृत्त प्रत्यय प्रमाण है, अतः पुनः स्वसामग्री में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'अनुवृत्त प्रत्यय ही है एकमात्र प्रमाण जिसमें, वह सामान्य है' ऐसा कहेंगे । सामग्री में तो अन्य भी प्रमाण हैं, जैसे सामग्री का एकदेश चक्षु रूपज्ञान से अनुमेय है और आलोक प्रत्यक्ष है । अतः स्वसामग्री में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—अर्थक्रिया ( कार्यभेद ) आकस्मिक न हो, इसलिए कारणतावच्छेदकत्वरूप से सामान्य की सिद्धि होती है, जैसे कि कार्य के समवायि-कारणतावच्छेदकत्व रूप से द्रव्यत्वजाति की सिद्धि होती है । एवञ्च एकमात्र अनुवृत्त प्रत्यय ही सामान्य में प्रमाण न होने से असम्भव हो जायगा । समर्थन—'अनुवृत्त प्रत्यय ही प्रमा जिसमें हो, वह सामान्य है' ऐसा लक्षण करेंगे। खण्डन—सामान्य से विशिष्ट व्यक्ति में भी अनुवृत्त प्रत्यय ही प्रमा है, अतः व्यक्ति में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'विषयरूप से सामान्य से अवच्छिन्न प्रमा जिसमें प्रमाण है, वह ५६

४४२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ च्छिन्नाप्रमांशप्रमाकत्वमिति चेन्न । तदसिद्धेरैवासिद्धेः । 'इयं प्रतीतिर्येन विना नोपद्यते तत्सामान्यम्'िति चेन्न । कारणान्तराणामपि तथात्वादिति । 'अनुवृत्तं सामान्यम्'ित्यप्यलक्षणम् । किमिदमनुवृत्तत्वं नाम ? अनेकाश्रितत्व- मिति चेन्न । अवयविना संयोगादिभिश्च व्यभिचारात् । नित्यत्वे सतीति चेन्न । समवायेन व्यभिचारात् । अत एव न बहुवृत्तित्वमित्यपि । असम्बन्धत्वे सतीति चेन्न । अणुभिर्व्यभिचारादिति । नित्यत्वे सत्यनेकसमवेतं सामान्यमिति चेन्न । विकल्पासहत्वात् । एतल्ल- क्षणं नित्यमनित्यं वा स्यात् ? नाद्यः ; स्वात्मनि वृत्तिविरोधात्, विशिष्टप्रविष्ट- मपि हि नित्यत्वं नित्यमेव । सामान्य है' ऐसा कहेंगे । व्यक्ति और वैशिष्ट्य का जात्यंश में प्रमाविषयत्व नहीं है, कारण विषय-भेद से ज्ञान में भी अंशभेद होता है । खण्डन—जबतक सामान्य की सिद्धि न हो, तबतक इस लक्षण की सिद्धि नहीं होगी और इस लक्षण से ही सामान्य की सिद्धि है, इस प्रकार अन्योन्याश्रय हो जायगा । समर्थन—अनुवृत्त प्रत्यय जिसके बिना न हो, वह सामान्य है । अर्थात् 'अनुगत- प्रत्ययान्यथानुपपत्तिप्रमापकत्वम्' यह लक्षण करेंगे । खण्डन—आत्ममनःसंयोग आदि अन्य कारणों के बिना भी अनुवृत्त प्रत्यय नहीं होता, अतः उनमें भी लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'जो अनेक में अनुवृत्त हो, वह सामान्य है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन— 'अनुवृत्तत्व' क्या वस्तु है ? यदि अनुवृत्तत्व अनेक में आश्रितत्व कहें, तो संयोग तथा अवयवी में भी अनेकाश्रितत्व होने से अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि 'जो नित्य होकर अनेकाश्रित हो, वह अनुवृत्तत्व है', तो समवाय में अतिव्याप्ति हो जायगी । अतएव 'बहुवृत्तित्व' भी अनुवृत्तत्व नहीं है । यदि 'जो सम्बन्ध से भिन्न हो,' यह भी निवेश करें, तो परमाणु संयोग सम्बन्ध से अनेक दिशाओं में रहते हैं, अतः उनमें अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'नित्य होकर अनेक में जो समवाय सम्बन्ध से रहे, वह सामान्य है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—विकल्पासह होने से यह लक्षण भी युक्त नहीं है । देखिये— यह लक्षण नित्य है या अनित्य ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है; कारण विशिष्टवृत्ति धर्म विशेषण में भी रहता है । अतः लक्षण में नित्यत्व के रहने से लक्षण के विशेषण में भी नित्यत्व रहेगा । अतः अंशतः आत्माश्रय हो जायगा ।

परिच्छेद ] सामान्य-लक्षण का खण्डन ४४३ नापि द्वितीयः; सामान्यस्य समवायस्य च नित्यत्वाभावप्रसङ्गात् । आत्म- त्वादौ व्यक्त्यभावायत्तस्यापि विशिष्टाभावस्यासम्भवात् । तस्य च कदाचिदसत्त्वानङ्गीकारे तदनित्यत्वस्यैव वक्तुमशक्यत्वात् । तद्ग्राहिणश्च प्रत्ययस्यैककालिकस्य च मिथ्यात्वेऽविशेषात् सार्वकालिकस्य च मिथ्यात्वप्रसङ्गेन सर्वथा तदसत्त्वापत्तेः । एकस्य च सत्यत्वेऽविशेषात् सर्वसत्य- तायां कदाचिदपि तदसत्त्वं नास्तीति । एकदा तत्सम्बन्धेनोपलक्षितस्य अन्यदाऽपि विद्यमानत्वात् तथात्व- मिति चेन्न । तादृशोपलक्ष्यासम्भवात्, व्यक्तीनां भेदादनित्यत्वानुपपत्तिरेवेति । एतेन नित्यत्वमन्यत्रापि प्रतिवचनीयमिति । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण लक्षण में प्रविष्ट समवाय तथा लक्ष्य सामान्य भी अनित्य मानने पड़ेंगे, तभी लक्षण अनित्य होगा । यदि कहें कि लक्षणघटक व्यक्ति के अनित्य होने से लक्षण भी अनित्य है, तो जहाँ आत्मत्वादि-स्थल में आत्मारूप व्यक्ति भी नित्य है, वहाँ लक्षण अनित्य कैसे होगा ? किञ्च—लक्ष्य में कदाचित् भी लक्षण का असत्त्व न हो, तो लक्षण को अनित्य नहीं कह सकते । फिर यदि लक्षण का कदाचित् असत्त्व मान लें और उस समय लक्षण- विशिष्ट लक्ष्यग्रह भी मानें, तो उसके भ्रम होने से सर्वत्र भ्रम ही होगा । फलतः लक्षण का सर्वदा असत्त्व ही पर्यवसित हो जायगा । यदि कहें कि 'जिस समय लक्षण वस्तुसत् रहेगा, उस समय लक्षणविशिष्ट लक्ष्य-प्रतीति सत्य ही है। एवञ्च उसके सार्वकालिक असत्त्व की आपत्ति नहीं आ सकती', तो वह भी ठीक नहीं । कारण एक को सत्य मानें, तो अविशेषात् (विषय का बाध न होने से) सभी ज्ञान यथार्थ होंगे । फलतः कभी भी लक्षण का असत्त्व बन नहीं पायेगा । यदि कहें कि लक्षण अपने असत्त्व-काल में भी लक्ष्य-सामान्य का उपलक्षण करता है, अतः असत्त्वकाल में भी लक्षण से उपलक्षित लक्ष्य का ज्ञान भ्रम नहीं है, तो सामान्य- रूप व्यक्ति भिन्न-भिन्न होने और सबमें वृत्ति एक कोई उपलक्ष्यतावच्छेदक धर्म न होने से लक्षण उपलक्षण नहीं हो सकता । अतः इससे लक्षण में अनित्यत्व अनुपपन्न है ! इसी प्रकार अन्यत्र भी नित्यत्व का खण्डन जानना चाहिए । जैसे—आकाशादि का नित्यत्व यदि नित्य है, तो आत्माश्रय होगा और यदि अनित्य है, तो आकाशादि भी अनित्य हो जायेंगे । इसी प्रकार नित्यत्वघटित लक्षणान्तरों का भी खण्डन करना चाहिए ।

४४४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ विशेष-लक्षण-खण्डनम् के चानेन लक्षणेन व्यवच्छिद्यन्ते । विशेषादय इति चेत्; विशेषा एव केऽभिधीयन्ते ? तत्र ‘नित्येष्वेव द्रव्येष्वेव वर्तन्त एव ये ते विशेषाः’ इत्यलक्षणम्; आत्मत्वा- दिना व्यभिचारात् । नित्यान्तरेऽसत्त्वात् न तत्सर्वत्र नित्ये वर्तते; विशेषास्तु नैवम्, वर्तन्त एवेति नियमादिति चेन्न । प्रतिविशेषमव्याप्त्याऽलक्षणत्वात् । यज्जातीय एवमिति लक्षणार्थ इति चेन्न । जातेरनङ्गीकारात् । जातीयेत्यस्या- पदत्वात् उपाधिरेव तथा विवक्षित इति चेन्न । तस्येतरव्यावृत्तस्यावगतौ व्यर्थ- मिदं तदुपजीवि लक्षणम्, अत एव विजातीयव्यावृत्तिप्रतीतेः । इतरव्यावृत्तस्य वा अनधिगतौ लक्षणस्य दुरवधारणत्वापत्तेः, इतरव्यावृत्ततया तज्जातीयत्वस्याप्रतीतेः । विशेष-लक्षण का खंडन सामान्य के इस लक्षण में प्रविष्ट 'अनेक' विशेषण का व्यवच्छेद्य क्या है ? यदि कहें विशेष ही, तो वे विशेष क्या हैं ? लक्षण न होने से वे अनिर्वचनीय हैं। समर्थन— जो नित्य में ही और द्रव्य में ही रहें, वे विशेष हैं। खंडन— आत्मत्व भी नित्य में ही और द्रव्य में ही रहता है। अतः आत्मत्व में अतिव्याप्ति होने से यह लक्षण असङ्गत है । समर्थन— आत्मत्व सब नित्यद्रव्यों में नहीं रहता । 'सभी नित्यद्रव्यों में जो रहे वह विशेष है,' ऐसा लक्षण करेंगे । एवञ्च आत्मत्व में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन— विशेष भी तत्तद्-व्यक्ति-विश्रान्त होने से सब नित्यों में नहीं रहते, अतः असंभव हो जायगा । समर्थन— जिससे समान जातिवाला सब नित्यों में रहता हो, वह विशेष है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन— विशेष में जाति न होने से जातिघटित उक्त लक्षण अयुक्त है। यदि जाति से उपाधि का ग्रहण करें, तो भी युक्त नहीं। कारण यदि विशेष में वृत्ति इतर- व्यावृत्तत्व उपाधि प्रथम से ज्ञात है, तो उसीसे इतरव्यावृत्तत्वरूप से विशेष का ज्ञान हो जाने से उस उपाधि का उपजीवी यह लक्षण व्यर्थ है। यदि इतरव्यावृत्तत्व रूप से उपाधि का ज्ञान नहीं है, तो इस लक्षण का ज्ञान अशक्य है । कारण इतरव्यावृत्तत्व रूप तज्जातीयत्व की प्रतीति ही नहीं है ।

परिच्छेद ] सम्बन्ध-लक्षण का खण्डन ४४५ भवतु स एवोपाधिर्लक्षणमिति चेन्न । तस्यानिरुक्तेः । यतो नित्यद्रव्यव्यक्तिषु विश्वव्यावृत्तधीर्योगिनां स विशेष इति चेन्न । स्वरूपधर्मव्यक्तिभेदेष्वपि प्रसङ्गात् । अन्यथा कार्यद्रव्यगुणादिव्यक्तिषु सा तेषां कुतः स्यात् । तास्विव वैधर्म्यान्तरस्य नित्येष्वपि सम्भवात् , विशेषवत् विशेषासम्भवेन लक्ष्यासिद्धिरिति । सम्बन्ध-लक्षण-खण्डनम् अपिच—विशेषादिभ्यो विशेषलक्षणादेर्भेदात् कथं तत्र तत्रैव तैर्विशेषादि- समर्थन—वह उपाधि ही लक्षण हो । खण्डन—यह भी नहीं कह सकते; कारण अद्यावधि उस उपाधि की निरुक्ति ही नहीं हुई । समर्थन—‘नित्य-द्रव्य व्यक्तियों में योगियों को जिससे विश्व-व्यावृत्तत्व-बुद्धि हो, वह विशेष है,’ ऐसा कहेंगे । खण्डन—अतीन्द्रिय कार्य-द्रव्यों तथा गुणों में योगियों को जिस स्वरूपभेद या धर्मभेद से व्यावृत्तत्व-बुद्धि होती है, वे तो विशेष नहीं हैं, अतः उनमें लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । अन्यथा ( यदि स्वरूप-भेदादि को व्यावृत्तत्व- बुद्धि का हेतु न मानें, तो ) अतीन्द्रिय कार्य-द्रव्यादि में उन योगियों को व्यावृत्तत्व-बुद्धि कैसे होगी ? यदि कहें, कि ‘विशेष के लक्षण में ही ‘नित्य-द्रव्य में व्यावृत्तत्व-बुद्धि जिससे हो’ ऐसा निवेश है, अतः अतीन्द्रिय कार्य-द्रव्यों में व्यावृत्त-बुद्धि के हेतु स्वरूप-भेदादि में अतिव्याप्ति नहीं होगी,’ तो जैसे अतीन्द्रिय कार्य-द्रव्यों में स्वरूपभेदादि से व्यावृत्तत्व- बुद्धि होती है, वैसे ही नित्य-द्रव्यों में भी व्यावृत्तत्व-बुद्धि हो जायगी । एवञ्च नित्य-द्रव्य में भी विशेष का स्वीकार व्यर्थ है । किञ्च---विशेष में भी बिना विशेष के जैसे स्वरूप- भेद से ही व्यावृत्तत्व-बुद्धि होती है, वैसे ही नित्य-द्रव्यों में भी वह हो जायगी । इसलिए भी विशेष का स्वीकार व्यर्थ ही है । सम्बन्ध-लक्षण का खण्डन किञ्च—यदि विशेषादि लक्ष्यों से विशेषादि के लक्षणों का भेद है, तो उन विशेषादि लक्ष्यों में ही उन-उन लक्षणों से व्यवहार क्यों होता है, अन्यत्र क्यों नहीं होता ? यदि कहें कि लक्ष्य में लक्षण का सम्बन्ध व्यवहार का नियामक है, तो उस

४४६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ व्यवहारः क्रियताम् , नान्यत्र ? सम्बन्धो नियामक इति चेन्न । सम्बन्धस्यापि सम्बन्धान्तरेण नियामकत्वेऽनवस्थापातात् । अन्यथा त्वनियमात् । तदनिरुक्तेश्च । तथाहि—कः सम्बन्धशब्दार्थः ? समवायादय इति चेत् , सत्यम्; किन्तु केन निमित्तेनेति हि प्रश्नवाक्यतात्पर्यम् —प्रतिस्वं व्यावृत्तेन संयोगत्वादिना, अन्येन वा ? आद्ये अनुगतव्यवहारानुपपत्तिप्रसङ्गः । अस्ति चासौ इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नादि प्रत्यक्षम्, नित्या प्राप्तिः समवाय' इत्यादि । न द्वितीयः ; तस्यैकस्यासम्भवात् । नियामकत्वं तदिति चेन्न । स्वभावस्यापि भवता नियामकत्वाङ्गीकारात् । तथाविधः सोऽपि सम्बन्ध एवेति चेन्न । त्वया सर्वस्वभावनियन्तृताया अवश्यमभ्युपगन्तव्यत्वेन नियामकनिरुक्तिलभ्यसत्त्वादधिकांशासामर्थ्यापत्तेः । सम्बन्ध का भी नियामक यदि अन्य सम्बन्ध मानें, तो अनवस्था हो जायगी । यदि अन्य सम्बन्ध को सम्बन्ध का नियामक न मानें, तो सम्बन्ध का नियम ही नहीं रहेगा । किञ्च—सम्बन्ध की निरुक्ति भी नहीं हो सकती । कहिये—सम्बन्ध शब्द का क्या अर्थ है ? अर्थात् निरुक्ति न होने से वह अनिर्वचनीय है । यदि कहें कि समवाय आदि सम्बन्ध हैं, तो ठीक है; किन्तु 'किस रूप से' यह प्रश्न-वाक्य का तात्पर्य है—क्या प्रतिसम्बन्ध में व्यावृत्त संयोगत्वादि रूप से या सम्बन्धमात्र में विद्यमान किसी अन्य रूप से ? इनमें प्रथम पक्ष मानें, तो सम्बन्धमात्र में अनुगत सम्बन्ध-व्यवहार की उपपत्ति नहीं होगी; ‘इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानं प्रत्यक्षम्’ इस सूत्र में सम्बन्धवाचक सन्निकर्ष शब्द से संयोग और समवाय दोनों का ग्रहण होता है तथा ‘नित्या प्राप्तिः समवायः’ यहाँ भी सम्बन्धार्थक प्राप्ति-पद से सम्बन्धमात्र का अभिधान होने से अनुगत-व्यवहार देखा जाता है । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण सम्बन्धमात्र में अनुगत एकरूपत्व सम्भव नहीं है । समर्थन—नियम का जनक अर्थात् ‘अतिप्रसङ्ग की निवृत्ति का जनक सम्बन्ध है’ ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—अभाव, समवाय आदि की विशिष्ट-बुद्धि में आप स्वरूप को भी नियामक मानते ही हैं । किन्तु वह सम्बन्ध है नहीं, अतः वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—स्वरूप नियम का जनक भी है, अतः वहाँ सम्बन्ध का लक्षण जाना

परिच्छेद ] सम्बन्ध-लक्षण का खण्डन ४५७ नियम्यस्य च स्वस्यानतिप्रसङ्गेन नियामकत्ववाचोयुक्त्यनुपपत्तेः । अति- प्रसक्तत्वे च तस्यैव नियामकत्वादतिप्रसक्तेन नियमायोगात् । भूत्वा नियमकरणे च प्रागनियतत्वापत्तेः । एवमन्येनापि जन्यनियम्ये । अन्यदपि हि यदि पूर्वं घटादिरूपेणानियतमेव घटादि करोति, तदा पटाद्यपि तथा कुर्यात् । न घटादित्वे नियन्तृत्वमन्यस्य, किन्तु घटादेः कालविशेषयोग इति चेन्न । भूषण ही है, दूषण नहीं । खण्डन—आप स्वरूपमात्र को सम्बन्ध अवश्य मानेंगे; अतः नियामक पदार्थ की नियतपूर्वसत्त्वरूप निरुक्ति का घटक 'सत्त्व' ही सम्बन्ध का लक्षण मानिये, सत्त्व से अधिक अंश व्यर्थ है । किञ्च--स्वरूप अनतिप्रसक्त नियम्य का नियामक नहीं हो सकता, कारण वह स्वतः ही अनतिप्रसक्त है । उसको अतिप्रसक्ति-निवारकरूप नियामक कहना अनुपपन्न है । यदि नियम्य अतिप्रसक्त है तो नियामक भी वही है । अतः अतिप्रसक्त स्वरूप नियमन नहीं कर सकता, कारण अतिप्रसङ्ग का निवारण ही नियमन है । किञ्च—नियम्याकार कार्य है, इसलिए यदि नियामक को उससे अभिन्न मानते हैं तो वह भी कार्य हो गया । एवञ्च यह भी प्रश्न होगा कि वह नियामक उत्पन्न होकर नियमन करता है या अनुत्पन्न ही ? यदि उत्पन्न होकर नियामक है, तो वह आप ही नियम्य है और नियामक भी । अतः वह उत्पत्ति से पूर्व अनियत हो जायगा । यदि उसे उत्पत्ति से पूर्व अनियत मानें, तो उत्पत्ति से उत्तर भी वह अनियत हो जायगा । इसी प्रकार अन्य कारणादि से अन्य कार्यों के नियमन में भी दोष जानने चाहिए । देखिये—यदि अन्य दण्डादि कारण घटादिरूप कार्य से पूर्वकाल में असत् घटादि का नियमन करते हैं, तो वे पटादि का भी नियमन क्यों न करें ? समर्थन—दण्डादि कारण घटादि कार्यों के नियामक नहीं हैं, क्योंकि वे तो सदा नियत ही हैं । किन्तु कालविशेष के सम्बन्ध के नियामक हैं, कारण वह अनियत है । खण्डन—यदि दण्डादि घटादिसम्बन्धी काल के सम्बन्ध का नियमन करते हों, तो घटादि का ही नियमन अर्थात् लब्ध हुआ । अतः पूर्वोक्त दोष हो जायगा ।

परिच्छेद ] सम्बन्ध-लक्षण का खण्डन ४४६ अभूत्वा च करणे व्याघातात् । सम्बन्धिनश्चाऽऽधारत्वात् सम्बन्धस्याऽऽधेयत्वात् तस्यैव तदाधारत्वानुपपत्तेः । नहि सुशिक्षितोऽपि नटबटुः स्वस्कन्धमारुह्य नृत्यति । नाप्यन्यस्यासौ सम्बन्धः ; त्वयैव तथाऽनभ्युपगमात् । स्वभावादेवायमीदृश इति हि स्वभाववादः तत्र परस्य नियमनाभावात् कथं परः सम्बन्धी सङ्गच्छेत । यच्च किञ्चित्सम्बन्धत्वमभिधीयते, तत्समवायेऽपि स्वीकार्यम् । न च समवाया- धारत्वं द्रव्यादिषट्कस्य संभवति । न चोपाधिभावात् स्यात्; संयोगसमवाया- सम्भवात् । स्वभावसम्बन्धस्य च निरस्तत्वात् । न चासावभावोऽपि, प्रतिषेध्यप्रतियोगिभावभेदाभिधानप्रसङ्गात् । सप्तपदार्थी- परिसमाप्तश्च जगत् , परस्परविरोधेन तल्लक्षणव्यवस्थापनादिति । यदि कहें कि असत् कारण नियामक है, तो व्याघात हो जायगा, क्योंकि आप नियम से पूर्व सत् को ही नियामक कहते हैं । किञ्च—सम्बन्धी आधार होता है और सम्बन्ध आधेय । एवञ्च यदि स्वरूप को सम्बन्ध मानें, तो स्व को स्व का आधार मानना पड़ेगा । वह अयुक्त है, कारण सुशिक्षित भी नट का बालक अपने कंधे पर आरूढ़ होकर नृत्य नहीं कर सकता । फिर, अन्य का स्वरूप अन्य का सम्बन्ध नहीं है, कारण आप ऐसा नहीं मानते । स्वरूपतः ही अभावादि नियमित हैं, यह आपका स्वभाववाद है । उस वाद में पर का नियमन न होने से पर सम्बन्धी कैसे होगा ? किञ्च—आप सम्बन्ध का जो भी लक्षण करेंगे, उसका सत्त्व समवाय में भी अवश्य मानना होगा । किन्तु द्रव्यादिकों में से कोई भी समवाय में नहीं रहता । यदि कहें कि प्रमेयत्व के तुल्य उपाधि ही सम्बन्ध का लक्षण है और वह समवाय में रहती है, तो उस लक्षण का भी संयोग या समवायरूप सम्बन्ध समवाय में अवश्य मानना पड़ेगा । किन्तु वह समवाय में नहीं है । इसके अतिरिक्त स्वरूप के सम्बन्धत्व का निरास कर ही चुके हैं । सम्बन्ध का लक्षण अभावरूप भी नहीं है, कारण यदि लक्षण को अभावरूप मानें, तो प्रतिषेध्य भावरूप प्रतियोगी का कथन करना पड़ेगा । अर्थात् भूतल में तादृश ५७

५५० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ आधार-लक्षण-खण्डनम् यदपि नियम्यात् भिन्नं नियामकं तदपि कथं तदेव नियमयति, नान्य- दिति। तदाधारत्वादिति चेत्, कः पुनराधारार्थः ? यत्र स्थीयते तदिति चेन्न । यत्रेति सप्तम्यर्थस्यापि विवेचनीयत्वात् । इहेति प्रत्ययविषय इति चेन्न । तत्रेति प्रत्ययविषयस्यानाधारत्वप्रसङ्गात् । किञ्च प्रत्ययविशेषावगमो विषयविशेषावगमात् । विषयविशेषावगमश्च प्रत्ययविशेषावगमादिति व्यक्तमन्योन्याश्रयः । समवायीति चेत् ; 'शशे शृङ्गाभावः', 'कुण्डे बदरम्' इत्याद्यव्याप्तेः। गौणस्तत्र प्रतियोगी का अभाव रहते हुए भी सम्बन्धत्व-व्यवहार नहीं होता, वह होने लगेगा। यदि कहें कि उस सम्बन्ध को सप्त पदार्थ से अन्य ही मानें, तो वह भी ठीक नहीं। कारण सारा जगत् सात पदार्थों में ही अन्तर्भूत है, क्योंकि तुम्हारे मत से परस्पर विरुद्ध धर्मों के बीच एक का निषेध होने पर अपर का विधान नियत मानकर ही सप्त- पदार्थों के लक्षण किये गये हैं। आधार-लक्षण का खण्डन नियम्य से भिन्न जो नियामक सम्बन्ध है, वह भी उसीका कैसे नियमन करता है, अन्य का नियमन क्यों नहीं करता ? यदि कहें कि उसका आधार होने से उसी- का नियमन करता है, तो आधार क्या वस्तु है ? अर्थात् लक्षण न होने से आधार अनिर्वचनीय है, फिर उससे अन्य का नियम कैसे होगा ? समर्थन—'जिसमें वस्तु स्थित होती है, वह आधार है' यह आधार का लक्षण हो ही सकता है । खंडन—'यत्र' इस सप्तमी का क्या अर्थ है, इसका विवेचन करना होगा। समर्थन—'इह' इत्याकारक ज्ञान का विषय सप्तम्यर्थ है । खण्डन—तब तो 'तत्र' इस ज्ञान का विषय सप्तम्यर्थ ( आधार ) नहीं कहलायेगा । किञ्च—ज्ञान-विशेष का ज्ञान अर्थात् 'यह ज्ञान भ्रम है, यह प्रमा है' ऐसा निश्चय विषय-विशेष के निश्चय से होता है और आपके मत में विषय-विशेष ( आधार ) का निश्चय होगा ज्ञान विशेष ( प्रमा ) से, अतः अन्योन्याश्रय स्पष्ट ही है। समर्थन—'समवायी ( समवाययुक्त ) आधार है' ऐसा कहेंगे । खंडन—'शशे शृङ्गाभावः, कुण्डे बदरम्' इत्यादि स्थलों में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें

परिच्छेद ] आधार-लक्षण का खण्डन ४५१ प्रयोग इति चेत् ; नैतावन्मात्रम्, 'प्रत्ययश्च भ्रान्तः' इत्यपि वक्तव्यमवशिष्यते भवतः। ओमिति चेत् ; अथ विपरीतमेव कुतो न स्यात् । 'शशे विषाणं नास्ती'ति च यदि विशेषणाभावाधिकरणत्वप्रतीतिर्भ्रान्ता, शृङ्गस्य तर्हि शशोऽधिकरणं स्यात् । भावाभावयोरन्यतरनिषेधस्य अन्यतरविधिपर्यवसायित्वेनाभ्युपगमात् । पतनप्रतिबन्धकमधिकरणमिति चेन्न। अवयविनं गुणादिकञ्च प्रति तदभावात् । अव्यवहिताधःस्थितमिति चेन्न । गुणाद्यपेक्षया गुणवदादेरधःस्थितत्वे प्रमाणाभावात् । अविशेषेण वाऽवयविगुणादीनामवयवाधारत्वप्रसङ्गात् । ऊर्ध्व- स्थितस्य संयोगिनः संयोगं प्रति च तदभावात् । सूत्रावलम्बितद्रव्यादौ बहुलं व्यभिचारात् । यद्येकोऽधिकरणार्थो नोपपद्यते, तर्हि अक्षशब्दार्थवद्भिन्न एवास्त्विति चेत्; कि यह प्रयोग गौण है, तो इतना ही नहीं, यह भी कहिये कि 'यह ज्ञान भी भ्रम है। यदि ऐसा भी (उक्त प्रतीति को भ्रम) मान लें, तो हम पूछते हैं कि विपरीत ही क्यों न मानें ? अर्थात् 'घटे घटत्वम्' इस प्रतीति को भ्रम तथा 'शशे शृङ्गाभावः' इस प्रतीति को प्रमा क्यों न मानें ? किञ्च—यदि 'शशे शृङ्गाभावः' इस प्रतीति को भ्रम मानें, तो 'शशे शृङ्गम्' यह प्रमा हो जायगी । कारण भाव-अभाव दोनों के बीच एक का निषेध अन्य की विधि में पर्यवसित होता है ! समर्थन—'पतन का प्रतिबन्धक अधिकरण है' ऐसा लक्षण करेंगे। खंडन —अव- यवी के पतन का प्रतिबन्धक अवयव तथा गुण के पतन का प्रतिबन्धक गुणी नहीं होता । अतः उनके वे अधिकरण नहीं होंगे, अर्थात् उनमें अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'अव्यवहित ( व्यवधान से रहित ) जो अधःस्थित हो, वह आधार है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—गुण तथा अवयवी की अपेक्षां गुणी तथा अवयव अधःस्थित हैं, इसमें कोई प्रमाण नहीं । किञ्च—विशेष न होने से अवयवी के गुणों के आधार अवयव हो जायेंगे । किञ्च—ऊर्ध्वस्थित घटादि भूतल-घटसंयोग के आधार न कह- लायेंगे । किञ्च—सूत्र आदि में अवलम्बित कन्दुक ( गेंद ) आदि के सूत्रादि आधार नहीं कहलायेंगे । समर्थन—यदि 'अधिकरण' शब्द का एक अर्थ उपपन्न नहीं होता, तो 'अक्ष'-

आश्रयासिद्ध्यादिभेदप्रसङ्गात् । सोऽपि स्वीकार्य इति चेन्न । असिद्ध्यादिविधा- परिगणनस्य व्यवहारतोऽन्यथाभावप्रसङ्गात् । क्वचिदाश्रयस्य समवायित्वात् क्वचिच्चाभावं समवायञ्च हेतुं प्रति तदसम्भवात् । एकस्य च तेषामुपसङ्ग्राहकस्य वक्तुमशक्यत्वात् । बहव एवाऽऽश्रयशब्दार्थाः, आश्रयासिद्ध्यादयोऽपि पृथक् पृथगेव बहवः । असिद्धभेदपरिगणनग्रन्थोऽप्यन्यथाकारं बोद्धव्यो बाधदर्शनादिति चेन्न । तथापि 'इह कुण्डे बदरम्'त्यत्र क आधारार्थ इति वक्तव्यम् । न तावत्पतनप्रतिबन्धकत्वम् , सहैव कुण्डेन पतति बदरे तदसम्भवात् । नापि संयोगित्वम् ; वैपरीत्यस्यापि प्रसङ्गात् । शब्द की तरह उसे अनेकार्थ१ ही मानें तो क्या हानि है ? खण्डन—आश्रयासिद्धि, व्यभिचार आदि के परिगणित भेदों का व्यवहारतः अन्यथाभाव हो जायगा । अर्थात् उनके लक्षणों में आधार या अधिकरण शब्द प्रविष्ट होने से उसे नानार्थ मानने पर आश्रयासिद्धि, व्यभिचार आदि भी अनेक हो जायेंगे । यदि आश्रयासिद्धि आदि के अनेक भेद मानलें, तो न्यायशास्त्र में असिद्ध्यादि के तीन प्रकार से परिगणन का जो व्यवहार है, उससे विरोध हो जायगा । कारण 'इदं द्रव्यं कर्मणः' यहाँ आश्रय समवायीरूप है । 'शब्दो नित्यः अकृतकत्वात्' तथा 'पृथिवी इतरभिन्ना गुणसमवायात्' यहाँ आश्रय के ही अनेकरूप होने से एकरूप आश्रय न रहा—सब आधारों का उपसंग्राहक एकरूप नहीं रहा । समर्थन—'आश्रय शब्द के बहुत-से अर्थ हैं । आश्रयासिद्धि भी पृथक्-पृथक् अनेक ही हैं। असिद्धिभेदों की गणनापरक ग्रन्थ का भी रूपान्तर से व्याख्यान कर कर लेना चाहिए । अर्थात् आधार की निरुक्ति में उक्त बाध होने से लक्षणा द्वारा 'स्वरूपासिद्धि और व्याप्यत्वासिद्धि से अन्य असिद्धि आश्रयासिद्धि है' यही कहना चाहिए । खण्डन—तब भी 'इह कुण्डे बदरम्' यहाँ आधार शब्द का क्या अर्थ है, यह कहना होगा । किञ्च—जहाँ कुण्ड के साथ ही बदर गिरते हैं, वहाँ कुण्ड बदर का अधिकरण न कहलायेगा । संयोगित्व भी आधार नहीं है, कारण कुण्ड का संयोग बदर में भी है । अतः बदर भी कुण्ड का आधार हो जायगा । १. अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति या ज्ञप्ति ( ज्ञान ) के लिए जिसके द्वारा जो अपेक्षित होता है, वह आधार है, इस प्रकार नानार्थक ही 'आधार' शब्द मानेंगे ।

४. चतुर्थ परिच्छेद: उपमान, शब्द, अभाव, समवाय, भेद-खण्डन एवं अद्वैत उपसंहार

परिच्छेद ] आधार-लक्षण का खण्डन ४५३ संयोगित्वे सत्यधःस्थितत्वं तत्राधिकरणार्थ इति चेन्न। तस्मिन् सत्यप्यन्यत्र चरणतलमिलितधूलीपटलादौ अधिकरणप्रतीत्यनुपपत्त्या, प्रत्युत चरणतले धूलीत्येव प्रतीत्या आधारत्वप्रतीतौ व्यभिचारित्वेन प्रकृतेऽपि तथास्वीकारानुपपत्तेः । न सार्वत्रिकोऽयमाधारार्थः, किन्तु क्वाचित्को नानारूपाधारत्ववादिपक्ष इति चेन्न। भवत्वन्यत्र अन्यस्याऽऽधारार्थत्वम्; तस्य त्वाधारार्थत्वं नोपपद्यते, अनाधारप्रतीतिविषयेऽपि सत्त्वादित्युक्तेः। आधेयापेक्षया महत्परिमाणत्वे सतीति चेन्न । करतलस्थिततूलराश्यादौ तद- सम्भवात् , अन्यस्य च तत्राऽऽधारार्थस्य वक्तुमशक्यत्वात् । अधःशब्दार्थस्य च वक्तुमशक्यत्वात् । पतनाभिमुखदिगवस्थितत्वमिति चेन्न। पतनार्थस्य गमनाधिकस्याधःशब्दार्थ- समर्थन—'संयोगी होकर जो अधःस्थित हो, वह आधार है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—ऐसा लक्षण करने पर 'कुण्डे बदरम्' यहाँ निर्वाह होने पर भी चरणतल में मिलित धूलीपटल में अव्याप्ति हो जायगी । 'धूलीपटले चरणतलम्' ऐसा व्यवहार नहीं होता, इससे विपरीत 'चरणतले धूलिः' यही व्यवहार होता है। अतः यह लक्षण युक्त नहीं है । खण्डन—आधार को नानारूप माननेवालों के पक्ष में यह आधार का लक्षण सार्वत्रिक नहीं, किन्तु कादाचित्क ही है। प्रकृत में यही आधार पदार्थ हो । खंडन—भले ही अन्यत्र आधार का अन्य अर्थ हो, किन्तु वह आधार पद का शक्यतावच्छेदक नहीं हो सकता । कारण वह अनाधारप्रतीति-विषय धूलीपटल आदि में होने से अतिप्रसक्त है, यह हम कह ही चुके हैं। समर्थन—'आधेय की अपेक्षा जो महत्परिमाण होकर अधःस्थित संयोगी हो, वह आधार है' ऐसा कहेंगे । चरणतल-मिलित धूलि में महत्परिमाण न होने से अति- व्याप्ति नहीं है । खण्डन—करतलस्थित तूल-राशि में अव्याप्ति हो जायगी; कारण तूल- राशि की अपेक्षा करतल में महत्परिमाण नहीं है । फिर, तूल-राशि का करतल में अन्य प्रकार का आधारत्व भी हो नहीं सकता । किञ्च—'अधःस्थितत्व'घटक अधःशब्दार्थ का भी आप निर्वचन नहीं कर सकते । समर्थन—'पतन की अभिमुख दिशा में जो अवस्थित हो, वही अधःस्थित है ।'

आश्रयासिद्ध्यादेर्भेदप्रसङ्गात् । सोऽपि स्वीकार्य इति चेन्न । असिद्ध्यादिविधा- परिगणनस्य व्यवहारतोऽन्यथाभावप्रसङ्गात् । क्वचिदाश्रयस्य समवायित्वात् क्वचिच्चाभावं समवायञ्च हेतुं प्रति तदसम्भवात् । एकस्य च तेषामुपसङ्ग्राहकस्य वक्तुमशक्यत्वात् । बहव एवाऽऽश्रयशब्दार्थाः, आश्रयासिद्ध्यादयोऽपि पृथक् पृथगेव बहवः । असिद्धभेदपरिगणनग्रन्थोऽप्यन्यथाकारं बोद्धव्यो बाधदर्शनादिति चेन्न । तथापि 'इह कुण्डे बदरमि'त्यत्र क आधारार्थ इति वक्तव्यम् । न तावत्पतनप्रतिबन्धकत्वम् , सहैव कुण्डेन पतति बदरे तदसम्भवात् । नापि संयोगित्वम् ; वैपरीत्यस्यापि प्रसङ्गात् । शब्द की तरह उसे अनेकार्थ १ ही मानें तो क्या हानि है ? खण्डन—आश्रयासिद्धि, व्यभिचार आदि के परिगणित भेदों का व्यवहारतः अन्यथाभाव हो जायगा । अर्थात् उनके लक्षणों में आधार या अधिकरण शब्द प्रविष्ट होने से उसे नानार्थ मानने पर आश्रयासिद्धि, व्यभिचार आदि भी अनेक हो जायँगे । यदि आश्रयासिद्धि आदि के अनेक भेद मानलें, तो न्यायशास्त्र में असिद्ध्यादि के तीन प्रकार से परिगणन का जो व्यवहार है, उससे विरोध हो जायगा । कारण 'इदं द्रव्यं कर्मणः' यहाँ आश्रय समवायीरूप है । 'शब्दो नित्यः अकृतकत्वात्' तथा 'पृथिवी इतरभिन्ना गुणसमवायात्' यहाँ आश्रय के ही अनेकरूप होने से एकरूप आश्रय न रहा—सब आधारों का उपसंग्राहक एकरूप नहीं रहा । समर्थन—'आश्रय शब्द के बहुत-से अर्थ हैं । आश्रयासिद्धि भी पृथक्-पृथक् अनेक ही हैं। असिद्धिभेदों की गणनापरक ग्रन्थ का भी रूपान्तर से व्याख्यान कर कर लेना चाहिए । अर्थात् आधार की निरुक्ति में उक्त बाध होने से लक्षणा द्वारा 'स्वरूपासिद्धि और व्याप्यत्वासिद्धि से अन्य असिद्धि आश्रयासिद्धि है' यही कहना चाहिए । खण्डन—तब भी 'इह कुण्डे बदरम्' यहाँ आधार शब्द का क्या अर्थ है, यह कहना होगा । किञ्च—जहाँ कुण्ड के साथ ही बदर गिरते हैं, वहाँ कुण्ड बदर का अधिकरण न कहलायेगा । संयोगित्व भी आधार नहीं है, कारण कुण्ड का संयोग बदर में भी है । अतः बदर भी कुण्ड का आधार हो जायगा । १. अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति या ज्ञप्ति (ज्ञान) के लिए जिसके द्वारा जो अपेक्षित होत है, वह आधार है, इस प्रकार नानार्थक ही 'आधार' शब्द मानेंगे ।

परिच्छेद ] आधार-लक्षण का खण्डन ४५३ संयोगित्वे सत्यधःस्थितत्वं तत्राधिकरणार्थ इति चेन्न । तस्मिन् सत्यप्यन्यत्र चरणतलमिलितधूलीपटलादौ अधिकरणप्रतीत्यनुपपत्त्या, प्रत्युत चरणतले धूलीत्येव प्रतीत्या आधारत्वप्रतीतौ व्यभिचारित्वेन प्रकृतेऽपि तथास्वीकारानुपपत्तेः । न सार्वत्रिकोऽयमाधारार्थः, किन्तु क्वाचित्को नानारूपाधारत्ववादिपक्ष इति चेन्न । भवत्वन्यत्र अन्यस्याऽऽधारार्थत्वम्; तस्य त्वाधारार्थत्वं नोपपद्यते, अनाधारप्रतीतिविषयेऽपि सत्त्वादित्युक्तेः । आधेयापेक्षया महत्परिमाणत्वे सतीति चेन्न । करतलस्थिततूलराश्यादौ तद्- सम्भवात् , अन्यस्य च तत्राऽऽधारार्थस्य वक्तुमशक्यत्वात् । अधःशब्दार्थस्य च वक्तुमशक्यत्वात् । पतनाभिमुखदिगवस्थितत्वमिति चेन्न । पतनार्थस्य गमनाधिकस्याधःशब्दार्थ- समर्थन—‘संयोगी होकर जो अधःस्थित हो, वह आधार है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—ऐसा लक्षण करने पर 'कुण्डे बदरम्' यहाँ निर्वाह होने पर भी चरणतल में मिलित धूलीपटल में अव्याप्ति हो जायगी । 'धूलीपटले चरणतलम्' ऐसा व्यवहार नहीं होता, इससे विपरीत 'चरणतले धूलिः' यही व्यवहार होता है । अतः यह लक्षण युक्त नहीं है । खण्डन—आधार को नानारूप माननेवालों के पक्ष में यह आधार का लक्षण सार्वत्रिक नहीं, किन्तु कादाचित्क ही है । प्रकृत में यही आधार पदार्थ हो । खंडन—भले ही अन्यत्र आधार का अन्य अर्थ हो, किन्तु वह आधार पद का शक्यतावच्छेदक नहीं हो सकता । कारण वह अनाधारप्रतीति-विषय धूलीपटल आदि में होने से अतिप्रसक्त है, यह हम कह ही चुके हैं । समर्थन—‘आधेय की अपेक्षा जो महत्परिणाम होकर अधःस्थित संयोगी हो, वह आधार है' ऐसा कहेंगे । चरणतल-मिलित धूलि में महत्परिणाम न होने से अति- व्याप्ति नहीं है । खण्डन—करतलस्थित तूल-राशि में अव्याप्ति हो जायगी; कारण तूल- राशि की अपेक्षा करतल में महत्परिमाण नहीं है । फिर, तूल-राशि का करतल में अन्य प्रकार का आधारत्व भी हो नहीं सकता । किञ्च—'अधःस्थितत्व'घटक अधःशब्दार्थ का भी आप निर्वचन नहीं कर सकते । समर्थन—'पतन की अभिमुख दिशा में जो अवस्थित हो, वही अधःस्थित है ।'