भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] सम्बन्ध-लक्षण का खण्डन ४४५ भवतु स एवोपाधिर्लक्षणमिति चेन्न । तस्यानिरुक्तेः । यतो नित्यद्रव्यव्यक्तिषु विश्वव्यावृत्तधीर्योगिनां स विशेष इति चेन्न । स्वरूपधर्मव्यक्तिभेदेष्वपि प्रसङ्गात् । अन्यथा कार्यद्रव्यगुणादिव्यक्तिषु सा तेषां कुतः स्यात् । तास्विव वैधर्म्यान्तरस्य नित्येष्वपि सम्भवात् , विशेषवत् विशेषासम्भवेन लक्ष्यासिद्धिरिति । सम्बन्ध-लक्षण-खण्डनम् अपिच—विशेषादिभ्यो विशेषलक्षणादेर्भेदात् कथं तत्र तत्रैव तैर्विशेषादि- समर्थन—वह उपाधि ही लक्षण हो । खण्डन—यह भी नहीं कह सकते; कारण अद्यावधि उस उपाधि की निरुक्ति ही नहीं हुई । समर्थन—‘नित्य-द्रव्य व्यक्तियों में योगियों को जिससे विश्व-व्यावृत्तत्व-बुद्धि हो, वह विशेष है,’ ऐसा कहेंगे । खण्डन—अतीन्द्रिय कार्य-द्रव्यों तथा गुणों में योगियों को जिस स्वरूपभेद या धर्मभेद से व्यावृत्तत्व-बुद्धि होती है, वे तो विशेष नहीं हैं, अतः उनमें लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । अन्यथा ( यदि स्वरूप-भेदादि को व्यावृत्तत्व- बुद्धि का हेतु न मानें, तो ) अतीन्द्रिय कार्य-द्रव्यादि में उन योगियों को व्यावृत्तत्व-बुद्धि कैसे होगी ? यदि कहें, कि ‘विशेष के लक्षण में ही ‘नित्य-द्रव्य में व्यावृत्तत्व-बुद्धि जिससे हो’ ऐसा निवेश है, अतः अतीन्द्रिय कार्य-द्रव्यों में व्यावृत्त-बुद्धि के हेतु स्वरूप-भेदादि में अतिव्याप्ति नहीं होगी,’ तो जैसे अतीन्द्रिय कार्य-द्रव्यों में स्वरूपभेदादि से व्यावृत्तत्व- बुद्धि होती है, वैसे ही नित्य-द्रव्यों में भी व्यावृत्तत्व-बुद्धि हो जायगी । एवञ्च नित्य-द्रव्य में भी विशेष का स्वीकार व्यर्थ है । किञ्च---विशेष में भी बिना विशेष के जैसे स्वरूप- भेद से ही व्यावृत्तत्व-बुद्धि होती है, वैसे ही नित्य-द्रव्यों में भी वह हो जायगी । इसलिए भी विशेष का स्वीकार व्यर्थ ही है । सम्बन्ध-लक्षण का खण्डन किञ्च—यदि विशेषादि लक्ष्यों से विशेषादि के लक्षणों का भेद है, तो उन विशेषादि लक्ष्यों में ही उन-उन लक्षणों से व्यवहार क्यों होता है, अन्यत्र क्यों नहीं होता ? यदि कहें कि लक्ष्य में लक्षण का सम्बन्ध व्यवहार का नियामक है, तो उस