भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 465

४४६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ व्यवहारः क्रियताम् , नान्यत्र ? सम्बन्धो नियामक इति चेन्न । सम्बन्धस्यापि सम्बन्धान्तरेण नियामकत्वेऽनवस्थापातात् । अन्यथा त्वनियमात् । तदनिरुक्तेश्च । तथाहि—कः सम्बन्धशब्दार्थः ? समवायादय इति चेत् , सत्यम्; किन्तु केन निमित्तेनेति हि प्रश्नवाक्यतात्पर्यम् —प्रतिस्वं व्यावृत्तेन संयोगत्वादिना, अन्येन वा ? आद्ये अनुगतव्यवहारानुपपत्तिप्रसङ्गः । अस्ति चासौ इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नादि प्रत्यक्षम्, नित्या प्राप्तिः समवाय' इत्यादि । न द्वितीयः ; तस्यैकस्यासम्भवात् । नियामकत्वं तदिति चेन्न । स्वभावस्यापि भवता नियामकत्वाङ्गीकारात् । तथाविधः सोऽपि सम्बन्ध एवेति चेन्न । त्वया सर्वस्वभावनियन्तृताया अवश्यमभ्युपगन्तव्यत्वेन नियामकनिरुक्तिलभ्यसत्त्वादधिकांशासामर्थ्यापत्तेः । सम्बन्ध का भी नियामक यदि अन्य सम्बन्ध मानें, तो अनवस्था हो जायगी । यदि अन्य सम्बन्ध को सम्बन्ध का नियामक न मानें, तो सम्बन्ध का नियम ही नहीं रहेगा । किञ्च—सम्बन्ध की निरुक्ति भी नहीं हो सकती । कहिये—सम्बन्ध शब्द का क्या अर्थ है ? अर्थात् निरुक्ति न होने से वह अनिर्वचनीय है । यदि कहें कि समवाय आदि सम्बन्ध हैं, तो ठीक है; किन्तु 'किस रूप से' यह प्रश्न-वाक्य का तात्पर्य है—क्या प्रतिसम्बन्ध में व्यावृत्त संयोगत्वादि रूप से या सम्बन्धमात्र में विद्यमान किसी अन्य रूप से ? इनमें प्रथम पक्ष मानें, तो सम्बन्धमात्र में अनुगत सम्बन्ध-व्यवहार की उपपत्ति नहीं होगी; ‘इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानं प्रत्यक्षम्’ इस सूत्र में सम्बन्धवाचक सन्निकर्ष शब्द से संयोग और समवाय दोनों का ग्रहण होता है तथा ‘नित्या प्राप्तिः समवायः’ यहाँ भी सम्बन्धार्थक प्राप्ति-पद से सम्बन्धमात्र का अभिधान होने से अनुगत-व्यवहार देखा जाता है । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण सम्बन्धमात्र में अनुगत एकरूपत्व सम्भव नहीं है । समर्थन—नियम का जनक अर्थात् ‘अतिप्रसङ्ग की निवृत्ति का जनक सम्बन्ध है’ ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—अभाव, समवाय आदि की विशिष्ट-बुद्धि में आप स्वरूप को भी नियामक मानते ही हैं । किन्तु वह सम्बन्ध है नहीं, अतः वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—स्वरूप नियम का जनक भी है, अतः वहाँ सम्बन्ध का लक्षण जाना