खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ विशेष-लक्षण-खण्डनम् के चानेन लक्षणेन व्यवच्छिद्यन्ते । विशेषादय इति चेत्; विशेषा एव केऽभिधीयन्ते ? तत्र ‘नित्येष्वेव द्रव्येष्वेव वर्तन्त एव ये ते विशेषाः’ इत्यलक्षणम्; आत्मत्वा- दिना व्यभिचारात् । नित्यान्तरेऽसत्त्वात् न तत्सर्वत्र नित्ये वर्तते; विशेषास्तु नैवम्, वर्तन्त एवेति नियमादिति चेन्न । प्रतिविशेषमव्याप्त्याऽलक्षणत्वात् । यज्जातीय एवमिति लक्षणार्थ इति चेन्न । जातेरनङ्गीकारात् । जातीयेत्यस्या- पदत्वात् उपाधिरेव तथा विवक्षित इति चेन्न । तस्येतरव्यावृत्तस्यावगतौ व्यर्थ- मिदं तदुपजीवि लक्षणम्, अत एव विजातीयव्यावृत्तिप्रतीतेः । इतरव्यावृत्तस्य वा अनधिगतौ लक्षणस्य दुरवधारणत्वापत्तेः, इतरव्यावृत्ततया तज्जातीयत्वस्याप्रतीतेः । विशेष-लक्षण का खंडन सामान्य के इस लक्षण में प्रविष्ट 'अनेक' विशेषण का व्यवच्छेद्य क्या है ? यदि कहें विशेष ही, तो वे विशेष क्या हैं ? लक्षण न होने से वे अनिर्वचनीय हैं। समर्थन— जो नित्य में ही और द्रव्य में ही रहें, वे विशेष हैं। खंडन— आत्मत्व भी नित्य में ही और द्रव्य में ही रहता है। अतः आत्मत्व में अतिव्याप्ति होने से यह लक्षण असङ्गत है । समर्थन— आत्मत्व सब नित्यद्रव्यों में नहीं रहता । 'सभी नित्यद्रव्यों में जो रहे वह विशेष है,' ऐसा लक्षण करेंगे । एवञ्च आत्मत्व में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन— विशेष भी तत्तद्-व्यक्ति-विश्रान्त होने से सब नित्यों में नहीं रहते, अतः असंभव हो जायगा । समर्थन— जिससे समान जातिवाला सब नित्यों में रहता हो, वह विशेष है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन— विशेष में जाति न होने से जातिघटित उक्त लक्षण अयुक्त है। यदि जाति से उपाधि का ग्रहण करें, तो भी युक्त नहीं। कारण यदि विशेष में वृत्ति इतर- व्यावृत्तत्व उपाधि प्रथम से ज्ञात है, तो उसीसे इतरव्यावृत्तत्वरूप से विशेष का ज्ञान हो जाने से उस उपाधि का उपजीवी यह लक्षण व्यर्थ है। यदि इतरव्यावृत्तत्व रूप से उपाधि का ज्ञान नहीं है, तो इस लक्षण का ज्ञान अशक्य है । कारण इतरव्यावृत्तत्व रूप तज्जातीयत्व की प्रतीति ही नहीं है ।