खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] सम्बन्ध-लक्षण का खण्डन ४४६ अभूत्वा च करणे व्याघातात् । सम्बन्धिनश्चाऽऽधारत्वात् सम्बन्धस्याऽऽधेयत्वात् तस्यैव तदाधारत्वानुपपत्तेः । नहि सुशिक्षितोऽपि नटबटुः स्वस्कन्धमारुह्य नृत्यति । नाप्यन्यस्यासौ सम्बन्धः ; त्वयैव तथाऽनभ्युपगमात् । स्वभावादेवायमीदृश इति हि स्वभाववादः तत्र परस्य नियमनाभावात् कथं परः सम्बन्धी सङ्गच्छेत । यच्च किञ्चित्सम्बन्धत्वमभिधीयते, तत्समवायेऽपि स्वीकार्यम् । न च समवाया- धारत्वं द्रव्यादिषट्कस्य संभवति । न चोपाधिभावात् स्यात्; संयोगसमवाया- सम्भवात् । स्वभावसम्बन्धस्य च निरस्तत्वात् । न चासावभावोऽपि, प्रतिषेध्यप्रतियोगिभावभेदाभिधानप्रसङ्गात् । सप्तपदार्थी- परिसमाप्तश्च जगत् , परस्परविरोधेन तल्लक्षणव्यवस्थापनादिति । यदि कहें कि असत् कारण नियामक है, तो व्याघात हो जायगा, क्योंकि आप नियम से पूर्व सत् को ही नियामक कहते हैं । किञ्च—सम्बन्धी आधार होता है और सम्बन्ध आधेय । एवञ्च यदि स्वरूप को सम्बन्ध मानें, तो स्व को स्व का आधार मानना पड़ेगा । वह अयुक्त है, कारण सुशिक्षित भी नट का बालक अपने कंधे पर आरूढ़ होकर नृत्य नहीं कर सकता । फिर, अन्य का स्वरूप अन्य का सम्बन्ध नहीं है, कारण आप ऐसा नहीं मानते । स्वरूपतः ही अभावादि नियमित हैं, यह आपका स्वभाववाद है । उस वाद में पर का नियमन न होने से पर सम्बन्धी कैसे होगा ? किञ्च—आप सम्बन्ध का जो भी लक्षण करेंगे, उसका सत्त्व समवाय में भी अवश्य मानना होगा । किन्तु द्रव्यादिकों में से कोई भी समवाय में नहीं रहता । यदि कहें कि प्रमेयत्व के तुल्य उपाधि ही सम्बन्ध का लक्षण है और वह समवाय में रहती है, तो उस लक्षण का भी संयोग या समवायरूप सम्बन्ध समवाय में अवश्य मानना पड़ेगा । किन्तु वह समवाय में नहीं है । इसके अतिरिक्त स्वरूप के सम्बन्धत्व का निरास कर ही चुके हैं । सम्बन्ध का लक्षण अभावरूप भी नहीं है, कारण यदि लक्षण को अभावरूप मानें, तो प्रतिषेध्य भावरूप प्रतियोगी का कथन करना पड़ेगा । अर्थात् भूतल में तादृश ५७