भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 468

५५० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ आधार-लक्षण-खण्डनम् यदपि नियम्यात् भिन्नं नियामकं तदपि कथं तदेव नियमयति, नान्य- दिति। तदाधारत्वादिति चेत्, कः पुनराधारार्थः ? यत्र स्थीयते तदिति चेन्न । यत्रेति सप्तम्यर्थस्यापि विवेचनीयत्वात् । इहेति प्रत्ययविषय इति चेन्न । तत्रेति प्रत्ययविषयस्यानाधारत्वप्रसङ्गात् । किञ्च प्रत्ययविशेषावगमो विषयविशेषावगमात् । विषयविशेषावगमश्च प्रत्ययविशेषावगमादिति व्यक्तमन्योन्याश्रयः । समवायीति चेत् ; 'शशे शृङ्गाभावः', 'कुण्डे बदरम्' इत्याद्यव्याप्तेः। गौणस्तत्र प्रतियोगी का अभाव रहते हुए भी सम्बन्धत्व-व्यवहार नहीं होता, वह होने लगेगा। यदि कहें कि उस सम्बन्ध को सप्त पदार्थ से अन्य ही मानें, तो वह भी ठीक नहीं। कारण सारा जगत् सात पदार्थों में ही अन्तर्भूत है, क्योंकि तुम्हारे मत से परस्पर विरुद्ध धर्मों के बीच एक का निषेध होने पर अपर का विधान नियत मानकर ही सप्त- पदार्थों के लक्षण किये गये हैं। आधार-लक्षण का खण्डन नियम्य से भिन्न जो नियामक सम्बन्ध है, वह भी उसीका कैसे नियमन करता है, अन्य का नियमन क्यों नहीं करता ? यदि कहें कि उसका आधार होने से उसी- का नियमन करता है, तो आधार क्या वस्तु है ? अर्थात् लक्षण न होने से आधार अनिर्वचनीय है, फिर उससे अन्य का नियम कैसे होगा ? समर्थन—'जिसमें वस्तु स्थित होती है, वह आधार है' यह आधार का लक्षण हो ही सकता है । खंडन—'यत्र' इस सप्तमी का क्या अर्थ है, इसका विवेचन करना होगा। समर्थन—'इह' इत्याकारक ज्ञान का विषय सप्तम्यर्थ है । खण्डन—तब तो 'तत्र' इस ज्ञान का विषय सप्तम्यर्थ ( आधार ) नहीं कहलायेगा । किञ्च—ज्ञान-विशेष का ज्ञान अर्थात् 'यह ज्ञान भ्रम है, यह प्रमा है' ऐसा निश्चय विषय-विशेष के निश्चय से होता है और आपके मत में विषय-विशेष ( आधार ) का निश्चय होगा ज्ञान विशेष ( प्रमा ) से, अतः अन्योन्याश्रय स्पष्ट ही है। समर्थन—'समवायी ( समवाययुक्त ) आधार है' ऐसा कहेंगे । खंडन—'शशे शृङ्गाभावः, कुण्डे बदरम्' इत्यादि स्थलों में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें