भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] आधार-लक्षण का खण्डन ४५१ प्रयोग इति चेत् ; नैतावन्मात्रम्, 'प्रत्ययश्च भ्रान्तः' इत्यपि वक्तव्यमवशिष्यते भवतः। ओमिति चेत् ; अथ विपरीतमेव कुतो न स्यात् । 'शशे विषाणं नास्ती'ति च यदि विशेषणाभावाधिकरणत्वप्रतीतिर्भ्रान्ता, शृङ्गस्य तर्हि शशोऽधिकरणं स्यात् । भावाभावयोरन्यतरनिषेधस्य अन्यतरविधिपर्यवसायित्वेनाभ्युपगमात् । पतनप्रतिबन्धकमधिकरणमिति चेन्न। अवयविनं गुणादिकञ्च प्रति तदभावात् । अव्यवहिताधःस्थितमिति चेन्न । गुणाद्यपेक्षया गुणवदादेरधःस्थितत्वे प्रमाणाभावात् । अविशेषेण वाऽवयविगुणादीनामवयवाधारत्वप्रसङ्गात् । ऊर्ध्व- स्थितस्य संयोगिनः संयोगं प्रति च तदभावात् । सूत्रावलम्बितद्रव्यादौ बहुलं व्यभिचारात् । यद्येकोऽधिकरणार्थो नोपपद्यते, तर्हि अक्षशब्दार्थवद्भिन्न एवास्त्विति चेत्; कि यह प्रयोग गौण है, तो इतना ही नहीं, यह भी कहिये कि 'यह ज्ञान भी भ्रम है। यदि ऐसा भी (उक्त प्रतीति को भ्रम) मान लें, तो हम पूछते हैं कि विपरीत ही क्यों न मानें ? अर्थात् 'घटे घटत्वम्' इस प्रतीति को भ्रम तथा 'शशे शृङ्गाभावः' इस प्रतीति को प्रमा क्यों न मानें ? किञ्च—यदि 'शशे शृङ्गाभावः' इस प्रतीति को भ्रम मानें, तो 'शशे शृङ्गम्' यह प्रमा हो जायगी । कारण भाव-अभाव दोनों के बीच एक का निषेध अन्य की विधि में पर्यवसित होता है ! समर्थन—'पतन का प्रतिबन्धक अधिकरण है' ऐसा लक्षण करेंगे। खंडन —अव- यवी के पतन का प्रतिबन्धक अवयव तथा गुण के पतन का प्रतिबन्धक गुणी नहीं होता । अतः उनके वे अधिकरण नहीं होंगे, अर्थात् उनमें अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'अव्यवहित ( व्यवधान से रहित ) जो अधःस्थित हो, वह आधार है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—गुण तथा अवयवी की अपेक्षां गुणी तथा अवयव अधःस्थित हैं, इसमें कोई प्रमाण नहीं । किञ्च—विशेष न होने से अवयवी के गुणों के आधार अवयव हो जायेंगे । किञ्च—ऊर्ध्वस्थित घटादि भूतल-घटसंयोग के आधार न कह- लायेंगे । किञ्च—सूत्र आदि में अवलम्बित कन्दुक ( गेंद ) आदि के सूत्रादि आधार नहीं कहलायेंगे । समर्थन—यदि 'अधिकरण' शब्द का एक अर्थ उपपन्न नहीं होता, तो 'अक्ष'-