खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] सामान्य-लक्षण का खण्डन ४४१ असाधारणविशेषादनन्यजातीयप्रयोजकत्वञ्च तदिति चेन्न । स्वसामग्र्या- मपि प्रसङ्गात्तादवस्थ्यात्, भेदप्रतिपत्त्यादावपि प्रयोजकत्वाच्च । एतत्प्रतिपत्तिप्रमाणकत्वमिति चेन्न । स्वसामग्र्यामप्यस्याः प्रमाणत्वात् । एतदेकप्रमाणकत्वमिति चेन्न । अर्थक्रियाभेदादेरपि तत्र प्रमाणात्वात् । एतत्प्रतिपत्तिप्रमाकत्वमिति चेन्न । तद्विशिष्टस्यापि तत्त्वप्रसङ्गात् । तद्व- समर्थन—'अनुवृत्त प्रत्यय का असाधारण कारण सामान्य है' यहाँ अनन्यजातीय कार्य का अप्रयोजकत्व 'असाधारण' शब्द का अर्थ है । उक्त सामग्री या तदेकदेश कार्यान्तर का भी प्रयोजक होने से उसमें अतिव्याप्ति नहीं है। खण्डन—स्वसामग्री भी अन्यजातीय कार्य की अप्रयोजक होती है, अतः उसमें अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है । किञ्च—सामान्य तो 'अयं न महिषः गोत्वात्' इस भेदानुमिति का भी कारण होता है । अतः वह भी अनुवृत्त प्रत्यय का असाधारण कारण नहीं है । फलतः असंभव हो जायगा । समर्थन—'अनुवृत्त प्रत्यय है प्रमाण जिसमें, वह सामान्य है' ऐसा लक्षण करेंगे । अर्थात् 'असाधारण कारण' यहाँ 'कारण' शब्द का अर्थ 'प्रमाण' करेंगे । एवञ्च सामग्री के कारण होने पर भी उसमें अनुवृत्त प्रत्यय प्रमाण न होने से अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन—कार्य से कारण की अनुमिति होने से स्वसामग्री में भी अनुवृत्त प्रत्यय प्रमाण है, अतः पुनः स्वसामग्री में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'अनुवृत्त प्रत्यय ही है एकमात्र प्रमाण जिसमें, वह सामान्य है' ऐसा कहेंगे । सामग्री में तो अन्य भी प्रमाण हैं, जैसे सामग्री का एकदेश चक्षु रूपज्ञान से अनुमेय है और आलोक प्रत्यक्ष है । अतः स्वसामग्री में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—अर्थक्रिया ( कार्यभेद ) आकस्मिक न हो, इसलिए कारणतावच्छेदकत्वरूप से सामान्य की सिद्धि होती है, जैसे कि कार्य के समवायि-कारणतावच्छेदकत्व रूप से द्रव्यत्वजाति की सिद्धि होती है । एवञ्च एकमात्र अनुवृत्त प्रत्यय ही सामान्य में प्रमाण न होने से असम्भव हो जायगा । समर्थन—'अनुवृत्त प्रत्यय ही प्रमा जिसमें हो, वह सामान्य है' ऐसा लक्षण करेंगे। खण्डन—सामान्य से विशिष्ट व्यक्ति में भी अनुवृत्त प्रत्यय ही प्रमा है, अतः व्यक्ति में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'विषयरूप से सामान्य से अवच्छिन्न प्रमा जिसमें प्रमाण है, वह ५६