भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 610 में से

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पृष्ठ 459

४४० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ समवायिकारणमिदं ने'ति, रूपा दौ घटादौ च सङ्ख्यासमवायिकारणत्वयुक्ते- स्तुल्यत्वात् । सङ्ख्यैव रूपा दौ नास्तीति चेत्; घटादौ कथमस्ति ? प्रत्ययस्योभयत्रापि तुल्यत्वादित्युक्तमनुषञ्जनीयम् । द्रव्य एव सङ्ख्यास्वीकारे तत्सम्बन्धात् गुणेऽपि तद्व्यवहारोपपत्तौ कल्पनालाघवात् गुणे सङ्ख्याद्यस्वीकार इति चेत्; विपरीतमैव कुतो न स्यात् ? सत्तासामान्याद्यपि गुणादौ किमर्थमङ्गीक्रियते, द्रव्यद्वारैव तत्र व्यवहारोपपत्तेः । सामान्य-लक्षण-खण्डनम् ननु सामान्यार्थ एव कः ? तथाहि—'अनुवृत्तप्रत्ययकारणं सामान्यमि'ति न लक्षणम् ; सामग्र्याः सर्वकार्योत्पत्तेः, तया तदेकदेशान्तरैश्च व्यभिचारात् । ‘एकं रूपम्’ यह समवायिता की प्रतीति तुल्य ही होती है। दोनों में किसी प्रकार का वैलक्षण्य नहीं है। समर्थन—रूप में संख्या नहीं है, अतः रूप में समवायी कारणत्वरूप लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है। खण्डन—घट में संख्या है, इसमें क्या प्रमाण है ? यदि ‘एको घटः’, ‘द्वौ घटौ’ इस प्रतीति को प्रमाण कहें तो ‘एकं रूपम्, द्वे रूपे’ इत्यादि प्रतीति से रूप में भी संख्या होने से उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—द्रव्य में ही संख्या समवाय से उत्पन्न होती है और गुण में संख्या-व्यवहार सामानाधिकरण्य सम्बन्ध से भी हो सकता है। फिर गौरव होने से रूप में संख्या-समवाय क्यों माना जाय ? खंडन—इसके विपरीत ही क्यों न मानें, अर्थात् गुण में समवाय से संख्या की उत्पत्ति और द्रव्य में उक्त परम्परा-सम्बन्ध से उसका व्यवहार क्यों न मानें ? किञ्च—फिर तो गुण में सत्ता सामान्य (जाति) क्यों मानते हैं ? द्रव्य में सत्ता है, तो उसीसे ही परम्परासम्बन्ध द्वारा गुण में सत्ता की प्रतीति का निर्वाह हो जायगा। सामान्य-लक्षण का खण्डन ‘सामान्य’ शब्द का क्या अर्थ है ? अर्थात् उसका भी निर्वचन नहीं किया जा सकता। देखिये—‘अनुवृत्त जो प्रत्यय अर्थात् अनेक वस्तुओं में एकाकार ज्ञान, उसका कारण सामान्य है’ यह लक्षण युक्त नहीं है, कारण सामग्री से सब कार्य होते हैं। अतः सामग्री में तथा सामग्री के एकदेश में लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। भाव यह है कि अनुगत प्रतीति केवल विषय के ही रहने से नहीं होती, प्रत्युत संपूर्ण प्रत्यय-सामग्री से होती है। अतः उस सामग्री में और उसके एकदेश चक्षु आदि में भी अतिव्याप्ति हो जायगी।

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