भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 458

परिच्छेद ] द्रव्य-लक्षण का खण्डन ४३६ गुणः समवेतो यत्र स गुणसमवायीति विवक्षितमिति चेन्न । यत्रेत्यस्य अधिकरणार्थस्य अद्याप्यनिरूपणेन तेनैव तद्व्याकारानुपपत्तेः । इहेति प्रत्ययहेतुराधार इति चेन्न । 'इह शङ्खे पीतिमे'ति प्रत्ययाच्छङ्खस्य पीतगुणाधिकरणत्वप्रसङ्गात् । भ्रान्तिरसो, यथार्थश्च प्रत्ययोऽत्र विवक्षित इति चेन्न । तदर्थासत्त्वनिरूपणव्यतिरेकेण तदप्रामाण्यस्य बोद्धुमशक्यत्वात् । न चाद्यापी- हेति प्रत्ययस्यार्थः प्रतीतो यत्प्रतियोगिकमसत्त्वं तत्र निरूप्यते । पीतत्वं प्रतियोगी, तच्च क्वचित्सिद्धमेवेति चेन्न । तस्य प्रमितत्वादेवासत्त्वा- नुपपत्तेः । तत्र न तस्य प्रमितत्वमिति चेन्न । तत्रेत्याधारत्वानिरूपणादिति । एतेन 'समवायिकारणं द्रव्यमि'त्यपि लक्षणं निरस्तम् । कथं निर्णेतव्यम् 'इदं समर्थन—'गुण समवाय सम्बन्ध से जहाँ रहता हो, वह गुण-समवायी अर्थात् 'गुणसमवायानुयोगित्व' ही द्रव्य का लक्षण विवक्षित है । खण्डन—'इह' शब्द के अर्थ अधिकरण का अद्यावधि निरूपण न होने से अधिकरण से ही अधिकरण का लक्षण करना युक्त नहीं । समर्थन—" 'इह' इत्याकारक जो ज्ञान, उस ज्ञान का विषय अधिकरण है" ऐसा अधिकरण का लक्षण करेंगे । खंडन—'इह शंखे पीतिमा' ऐसी प्रतीति होने से शंख भी पीतिमा का आश्रय हो जायगा । 'उक्त प्रतीति भ्रम है और लक्षण में यथार्थ प्रतीति विवक्षित है, अतः शंख में पीतिमाधिकरणता की आपत्ति नहीं', यह नहीं कह सकते; कारण जबतक अधिकरणरूप अर्थ की असत्ता का निश्चय न हो, तबतक "शंखे पीतिमा' यह ज्ञान भ्रम है" ऐसा निश्चय नहीं हो सकता । अभीतक 'इह' इस ज्ञान का विषय निर्णीत नहीं है, जिसकी असत्ता का 'शंखे पीतिमा' इस ज्ञान में निश्चय करें । समर्थन—असत्त्व का प्रतियोगी पीतत्व है, वह पुष्पादि में कहीं सिद्ध ही है । खण्डन—पीतत्व के प्रमित होने से ही पीतिमा का असत्त्व नहीं है, तो भी शंखरूप अधिकरण में उसका असत्त्व है ही । खण्डन—जबतक अधिकरण की निरुक्ति न हो, तबतक 'शंखरूप अधिकरण में' आदि विशेष का प्रदर्शन नहीं कर सकते । समर्थन—'समवायिकारण द्रव्य है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन—घटादि सम- वायी कारण हैं और रूपादि नहीं, यह निश्चय कैसे हो ? कारण घटादि और रूपादि में संख्या-समवायिकारणत्व की युक्ति तुल्य है । अर्थात् 'एको घटः' इस प्रतीति की तरह