भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

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पृष्ठ 457

४३८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ मात्राश्रय इत्येवार्थ इति चेन्न । अभावाश्रयतया सर्वाव्यापनात् । जातिमात्र- भावाश्रय इति चेन्न । उपाधीनामपि तदाश्रितत्वात् । नोपाधीनामाश्रयो रूपादिः, किन्तु कथमपि सम्बन्धी । तावतैवानुमानादि- प्रवृत्तिरिति चेन्न । उपाधिसम्बन्धं प्रत्यप्याश्रयत्वस्य मन्तव्यत्वात् । अन्यथा यदि किञ्चिद्रूपमत्र नेष्यते, तदा सामान्यविशेषानुमानं तत्र न स्यात्, व्यधिकरणयो- र्गम्यगमकभावानभ्युपगमात् । तस्माद्यदेतदेव लक्षणं तत्तावन्न जातिरूपम्, तदिदं रूपं यदि रूपादौ नास्ति तदानीमस्ति, यद्यस्ति तदा नास्तीति विचित्रेण लगेत्युक्ते न लगति, मा लगेत्युक्ते च लगतीति प्रवहिकामनुकरोति । अपिच—गुणाश्रय इत्यत्र कश्चाऽऽश्रयार्थः ? समवायीति चेन्न । गुणत्वादे- रपि द्रव्यत्वप्रसङ्गात्, गुणावच्छिन्नस्य समवायस्य गुणत्वेऽपि विश्रान्तत्वात् । लक्षण करेंगे। खण्डन -- गुण में प्रमेयत्व आदि उपाधियों के होने से पुनः असम्भव हो जायगा । समर्थन — यहाँ रूपादि प्रमेयत्व आदि उपाधियों के आश्रय नहीं, किन्तु किसी प्रकार सम्बन्धी हैं। अतएव 'रूपादि अभिधेयं प्रमेयत्वात्' इस अनुमिति की प्रवृत्ति होती है। खण्डन — रूपादि को प्रमेयत्व के सम्बन्ध का आश्रय अवश्य मानना होगा। यदि ऐसा न मानें, तो रूपादि में विशेषगुणत्व तथा संख्यादि में सामान्यगुणत्व का अनुमान नहीं होगा। कारण एक अधिकरण में न रहनेवालों में गम्यगमकभाव नहीं होता। वहाँ आपके मत में कोई उपाधि नहीं है। तस्मात् यह लक्षण जातिरूप तो है नहीं, किन्तु उपाधिरूप है। अतः यदि वह रूपादि में नहीं, तब तो लक्षण का समन्वय होने से है, और यदि है तो लक्षण का समन्वय न होने से नहीं है। एवञ्च आपका लक्षण 'लग' कहने पर तो नहीं लगता और 'मा लग' कहने पर लगता है—इस विचित्र पहेली का अनुकरण करता है¹। किञ्च—'गुण का आश्रय द्रव्य है' यहाँ सम्बन्ध द्वयाश्रय होने से 'आश्रय' शब्द का अर्थ क्या है ? 'समवायी' ( समवाय का सम्बन्धी ) यह अर्थ नहीं हो सकता, कारण गुण-समवाय गुणत्व में भी होने से वह भी द्रव्य हो जायगा । १ प्रश्न—ऐसी कौन वस्तु है, जो 'मा लग' कहने पर लगती हो और 'लग' कहने पर न लगती हो ? उत्तर—ओष्ठ ।