खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] द्रव्य-लक्षण का खण्डन ४३७ इति गुणलक्षणांशस्यासिद्धेः सङ्ख्यावत्तया प्रतीतेर्विद्यमानत्वात् । भ्रान्तिरिति चेन्न । परस्पराश्रयप्रसङ्गात् । सङ्ख्यावत्तया प्रतीतेर्भ्रान्तित्वे गुणलक्षणसिद्धिः, तत्सिद्धौ च बाधेन भ्रान्तित्वस्थापनम् । न च हेत्वन्तराद्रूपादेर्गुणत्वसिद्धौ बाधकसिद्धिः ; दृष्टान्तस्यापि सङ्ख्या- योगिप्रत्ययाक्रान्तत्वेन प्रसक्तद्रव्यकोटिप्रवेशतया गुणत्वेनासिद्धेः । सङ्ख्यायाः सङ्ख्यावत्त्वेनानवस्थाप्रसङ्गात्, निःसङ्ख्यत्वव्यवस्थितौ दृष्टान्तत्वं सम्भविष्यतीति चेन्न । पृथक्त्वेनापि तस्याः सम्भावितद्रव्यकोटिप्रवेशत्वात् । एवं पृथक्त्वस्यापि सङ्ख्यावत्त्वेनेति । ‘जातीतरानाश्रयोऽकर्मरूपो गुणः' इत्यपि न ; जातिव्यापकत्वात् । जाति- इस लक्षण से निश्चय करेंगे कि रूपादि गुण हैं । खंडन—रूप में संख्यारूप गुणवत्त्व की प्रतीति होने से प्रस्तुत गुणलक्षणघटक 'अगुण' यह अंश ही असिद्ध है । समर्थन—रूप-रस आदि में संख्या की प्रतीति भ्रम है । खण्डन—अन्योन्याश्रय हो जायगा । देखिये—'रूप में संख्या की प्रतीति भ्रम है' ऐसा निश्चय होने पर रूप में गुणलक्षण की सिद्धि होगी और लक्षण की सिद्धि होने पर बाध होने से उक्त प्रतीति भ्रम सिद्ध होगी । समर्थन—'रूपादयो गुणाः सामान्यवत्त्वे सति अचलनत्मकत्वात् शब्दवत्' इस अनुमान से रूप में गुणत्व की सिद्धि होने पर उसमें संख्या का बाध सिद्ध हो जायगा । खंडन—शब्दरूप दृष्टान्त में संख्या के होने से उसका द्रव्य-कोटि में प्रवेश हो जाने के कारण दृष्टान्त का अभाव हो जायगा, जिससे अनुमिति नहीं होगी । यह भी नहीं कह सकते कि 'अनवस्था-भय से संख्या में संख्या न होने के कारण संख्या ही दृष्टान्त हो जायगी', कारण संख्या में भी पृथक्त्वरूप गुण रहता है । अतः उसका द्रव्य में ही अन्तर्भाव होने से वह दृष्टान्त नहीं हो सकता । इसी प्रकार पृथक्त्व में संख्या होने से वह भी दृष्टान्त नहीं हो सकता । समर्थन—'जो जाति से इतर का आश्रय न हो और कर्म से भिन्न हो, वह गुण है,' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—यह लक्षण भी जाति में अतिव्यास होने से अयुक्त है । समर्थन—'जो केवल जाति का ही आश्रय हो और कर्म से भिन्न हो, वह गुण है' ऐसा कहेंगे । खंडन—अभाव के सब गुणों में रहने से असम्भव हो जायगा । समर्थन— 'केवल जातिरूप भाव का जो आश्रय हो तथा कर्म से भिन्न हो, वह गुण है' ऐसा