खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ चतुर्थे विशिष्टनिरासेन च सर्वाणि लक्षणानि निरस्तानीति मन्तव्यम् । यथा— 'गुणाश्रयो द्रव्यमि'त्यादि । द्रव्य-लक्षण-खण्डनम् इतोऽपि गुणाश्रयो द्रव्यमित्यसङ्गतम् । तथाहि—कथमेतल्लक्षणमवधारणीयम्, सङ्ख्यारूपगुणवत्तया रूपादेरपि प्रतीतेः । भ्रान्तिर साविति चेत्; पृथिव्यादौ कथमभ्रान्तिरिति वक्तव्यम् । तत्र बाधकाभावादिति चेत्; तुल्यम् । गुणस्य गुणवत्तायां बाधकमस्माभिरवश्यं वक्तव्यम्, 'निर्गुणा गुणाः' इति सिद्धान्तादिति चेन्न । रूपादेर्गुणत्वस्यैव निश्चेतुमशक्यत्वात् । 'सामान्यवान्गुणः' इत्यादिगुणलक्षणयोगात्तन्निश्चय इति चेन्न । 'अगुणः' विशिष्ट के खण्डन से सम्पूर्ण लक्षण खण्डित जानने चाहिए। कारण विशिष्ट के प्रवेश के बिना कोई भी लक्षण नहीं हो सकता। जैसे—'गुण-विशिष्ट द्रव्य है' यह द्रव्य-लक्षण । द्रव्य-लक्षण का खण्डन वक्ष्यमाण दोषों से 'गुणविशिष्ट द्रव्य है' यह लक्षण भी असङ्गत है । देखिये—संख्यारूप गुण रूप, रस आदि में भी रहते हैं । फिर यह कैसे जाना जाय कि गुणविशिष्ट द्रव्य ही होता है ? यह भी नहीं कह सकते कि 'रूप-रस में सङ्ख्या की प्रतीति भ्रम है', कारण भ्रान्ति अभ्रान्तिपूर्वक होने से पृथिवी आदि द्रव्यों में संख्यावत्त्व की प्रतीति को पहले अभ्रान्ति सिद्ध करना पड़ेगा । वह हो नहीं सकता, क्योंकि पृथ्वी आदि में संख्या की प्रतीति भ्रम नहीं है, इसमें कुछ प्रमाण नहीं है । यह भी नहीं कह सकते कि 'इयं प्रतीतिः, न भ्रान्तिः, अबाध्यप्रतीतित्वात्' यह अनुमान ही पृथिव्यादि में संख्यावत्त्वप्रतीति की अबाध्यता में प्रमाण है । कारण रूपादि में संख्या की प्रतीति में भी उक्त बाधकाभाव तुल्य ही है । समर्थन—रूपादि गुणों में संख्यादि गुण नहीं रहते, इसमें हम बाधक अवश्य कह सकते हैं, कारण 'निर्गुणा गुणाः' यह सिद्धान्त है । खण्डन—प्रमाण न होने से 'रूपादि गुण हैं' यह भी निश्चित नहीं कर सकते । समर्थन—'जिसमें जाति रहती हो और गुण न रहता हो, वह गुण है'