खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ च्छिन्नाप्रमांशप्रमाकत्वमिति चेन्न । तदसिद्धेरैवासिद्धेः । 'इयं प्रतीतिर्येन विना नोपद्यते तत्सामान्यम्'िति चेन्न । कारणान्तराणामपि तथात्वादिति । 'अनुवृत्तं सामान्यम्'ित्यप्यलक्षणम् । किमिदमनुवृत्तत्वं नाम ? अनेकाश्रितत्व- मिति चेन्न । अवयविना संयोगादिभिश्च व्यभिचारात् । नित्यत्वे सतीति चेन्न । समवायेन व्यभिचारात् । अत एव न बहुवृत्तित्वमित्यपि । असम्बन्धत्वे सतीति चेन्न । अणुभिर्व्यभिचारादिति । नित्यत्वे सत्यनेकसमवेतं सामान्यमिति चेन्न । विकल्पासहत्वात् । एतल्ल- क्षणं नित्यमनित्यं वा स्यात् ? नाद्यः ; स्वात्मनि वृत्तिविरोधात्, विशिष्टप्रविष्ट- मपि हि नित्यत्वं नित्यमेव । सामान्य है' ऐसा कहेंगे । व्यक्ति और वैशिष्ट्य का जात्यंश में प्रमाविषयत्व नहीं है, कारण विषय-भेद से ज्ञान में भी अंशभेद होता है । खण्डन—जबतक सामान्य की सिद्धि न हो, तबतक इस लक्षण की सिद्धि नहीं होगी और इस लक्षण से ही सामान्य की सिद्धि है, इस प्रकार अन्योन्याश्रय हो जायगा । समर्थन—अनुवृत्त प्रत्यय जिसके बिना न हो, वह सामान्य है । अर्थात् 'अनुगत- प्रत्ययान्यथानुपपत्तिप्रमापकत्वम्' यह लक्षण करेंगे । खण्डन—आत्ममनःसंयोग आदि अन्य कारणों के बिना भी अनुवृत्त प्रत्यय नहीं होता, अतः उनमें भी लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'जो अनेक में अनुवृत्त हो, वह सामान्य है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन— 'अनुवृत्तत्व' क्या वस्तु है ? यदि अनुवृत्तत्व अनेक में आश्रितत्व कहें, तो संयोग तथा अवयवी में भी अनेकाश्रितत्व होने से अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि 'जो नित्य होकर अनेकाश्रित हो, वह अनुवृत्तत्व है', तो समवाय में अतिव्याप्ति हो जायगी । अतएव 'बहुवृत्तित्व' भी अनुवृत्तत्व नहीं है । यदि 'जो सम्बन्ध से भिन्न हो,' यह भी निवेश करें, तो परमाणु संयोग सम्बन्ध से अनेक दिशाओं में रहते हैं, अतः उनमें अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'नित्य होकर अनेक में जो समवाय सम्बन्ध से रहे, वह सामान्य है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—विकल्पासह होने से यह लक्षण भी युक्त नहीं है । देखिये— यह लक्षण नित्य है या अनित्य ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है; कारण विशिष्टवृत्ति धर्म विशेषण में भी रहता है । अतः लक्षण में नित्यत्व के रहने से लक्षण के विशेषण में भी नित्यत्व रहेगा । अतः अंशतः आत्माश्रय हो जायगा ।