खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५८ आधार-लक्षण का खण्डन [ चतुर्थ किञ्च—यत्तदाधारत्वं तत् साधारमनाधारं वा ? अन्त्ये क्व स्वविशिष्ट- प्रत्ययं कुर्यात्, विशेषाभावात् । आद्ये तदाधारत्वं वाच्यम् । स्वरूपमेव तादृशं तस्य, येन स्वयं सत्ता स्वात्मनि सत्ताप्रत्ययकारिणी सत्तान्तरमन्तरेण यथा तथेदमपि विनैव आधारान्तरमाधारप्रत्ययकारीति चेन्न । भ्रान्तित्वप्रसङ्गात् । यथा विना रजतत्वं तत्प्रत्ययो भ्रान्तिस्तथैव स्यात् । उपपाद्य- श्चायमर्थो भेदखण्डनप्रस्ताव इत्युपरम्यते । विनाऽप्याधाराधेयभावं स्वभावसम्बन्धेन नियामकत्वं भविष्यति, यथा विषयविषयिभावेनार्थज्ञानयोरिति चेन्न । स्वभावसम्बन्धस्य निरस्तत्वात् । विषय-विषयिभाव-लक्षणखण्डनम् यमुदाहरसि च विषयविषयिभावं सोऽपि वक्तुं न शक्यते । तथाहि—कः पुनर्ज्ञानादेर्घटादिना विषयविषयिभावः ? किञ्च—जो वह आधारत्व है, वह साधार है अथवा आधाररहित ? यदि उसे आधाररहित मान, तो आधारत्व की प्रतीति कहाँ होगी; कारण आधारत्व विशिष्टरूप- विशेष नहीं है । यदि आधारत्व का भी आधार मानें, तो आधारत्वरूप जो आधेय है, उसके आधारत्व का निर्वचन करना चाहिए । अर्थात् आधारत्व का आधारत्व, उसका आधारत्व, इस तरह अनवस्था होने से आधारत्व को साधार भी नहीं मान सकते । समर्थन—आधारत्व का स्वरूप ही ऐसा है कि जैसे सत्ता अन्य सत्ता के बिना ही स्व में सत्ता-प्रतीति का कारण है, वैसे ही आधारत्व भी अन्य आधारत्व के बिना ही स्व में आधारत्व-व्यवहार का कारण होगा । खण्डन—तब तो आधार-प्रतीति भ्रान्ति हो जायगी । अर्थात् जैसे बिना रजतत्व के रजत का ज्ञान भ्रम है, वैसे ही आधारत्व के बिना आधार का ज्ञान भ्रम होगा । इसका उपपादन हम भेद-खण्डन के प्रसंग में करेंगे । समर्थन—आधारत्व के साथ आधाराधेयभाव न होने पर भी स्वरूप पर- सम्बन्ध से वह नियामक होगा, जैसे कि अर्थ ज्ञान का विषय विषयिभाव से नियमन करता है । खण्डन—स्वरूपसम्बन्ध का खण्डन हो ही चुका है । विषय-विषयिभाव-लक्षण का खण्डन फिर, जिस विषय-विषयिभाव का कथन करते हैं, उसका भी उपपादन आप नहीं