भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 479

परिच्छेद ] विषय विषयिभाव-लक्षण का खण्डन ४५६ प्रकाशस्य सतस्तदीयतामात्ररूपः स्वभावविशेष इति चेन्न । इच्छादिविषया- व्यापनात् । विषयिण इति चेन्न । तत्त्वस्यैव निरूप्यमाणत्वात् । किञ्च स्वभावः स्वधर्मो वा स्वात्मा वा तस्य विवक्षितः ? आद्ये ज्ञानत्वादिकं वा साधारणमसौ, तत्तद्धटज्ञाननियतो वा कश्चित् ? आद्ये साधारणान्न विशेषतस्त- दीयतामात्ररूपत्वसम्भवः । द्वितीये तु प्रतिविषयं व्यावृत्तज्ञानधर्मस्वीकारे वचन- भङ्गिभेदेन साकारवादस्वीकारः । किञ्च¹—नाऽसौ धर्म उपधेयान्तराधीनः, विषयभूतघटाद्यतिरिक्तोपाधिप्रतीत्य- पेक्षाप्रसङ्गात् । कर सकते । कहिये, ज्ञानादि का घटादि के साथ विषय-विषयिभाव क्या वस्तु है ? अर्थात् लक्षण न होने से अनिर्वचनीय है । निर्वचन—'विद्यमान प्रकाश ( ज्ञान ) का केवल तदीयतारूप ( घटादिमात्र- सम्बन्धितारूप ) स्वभाव-विशेष विषय-विषयिभाव है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—इच्छा, कृति तो प्रकाशरूप नहीं हैं, अतः उनके साथ विषय के सम्बन्ध में अव्याप्ति हो जायगी । 'प्रकाश' के स्थान पर 'विषयी' का निवेश भी नहीं कर सकते; कारण विषय-विषयि- भाव का ही यह लक्षण होने से आत्माश्रय हो जायगा । किञ्च—'स्व' शब्द आत्मा और आत्मीय का वाचक होने से यहाँ 'स्वभाव'पद से उसका धर्म विवक्षित है या आत्मा ? प्रथम पक्ष में वह ज्ञानत्व आदि साधारण धर्म है या घटादि-ज्ञानादिमें ही वृत्ति कोई धर्मविशेष ( घट-ज्ञानत्व, पटज्ञानत्व आदि ) है ? प्रथम पक्ष में ज्ञानत्वरूप विषयविषयिभाव सर्वसाधारण होने से 'यह घटविषयक ज्ञान है, यह पट-विषयक ज्ञान है' ऐसा विशेषरूप से नियम नहीं होगा । द्वितीय पक्ष अर्थात् विषय-विषय की प्रतीति से व्यावृत्त भिन्न-भिन्न ज्ञानों में वृत्ति ज्ञानधर्मरूप मानें, तो वचन-रचना के भेद से साकारवाद का स्वीकार हो जायगा । अर्थात् घटादि बाह्य पदार्थ भी ज्ञान के धर्म में प्रविष्ट होने से 'ज्ञेयाकारं ज्ञानम्' इस योगाचार-मत का अंगीकार हो जायगा । फलतः बाह्य पदार्थों का अपलाप हो जायगा । किञ्च—वह धर्म जातिरूप है या उपाधिरूप ? उपाधिरूप में भी उपाधि का निमित्त अन्य है या घटादि ही ? यदि अन्य निमित्त मानें, तो 'अयं घटः' इस ज्ञान को अपने विषयभूत घटादि से इतर की अपेक्षा हो जायगी, किन्तु वह होती नहीं है । १. यदि कहें कि ज्ञानगत असाधारण धर्म को ही बाह्यार्थ का निमित्त मानेंगे । एवञ्च विज्ञानवादमें प्रवेश नहीं होगा, तो दूसरा दोष देते हैं—'किञ्च' से ।