खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६० सानुवादखण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ न च घटादिरेव तथा; असम्बन्धात् । तथापि तथात्वे चातिप्रसङ्गात् । नापि जातिरूपः; कचिद्घटमात्रपटमात्रज्ञानगततया पृथग्व्यवस्थितौ सत्यां घटपटविषयैकज्ञाने सहावस्थित्या जातिसङ्करप्रसङ्गात् । प्रतिविषयं ज्ञानभेदनियमे विशिष्टज्ञानानुपपत्तेः, एवम्भूतविचित्रजात्यभ्यु- पगमे प्रत्येकोचितव्यवहारस्या-प्यभावप्रसङ्गात् । अथ जातिसङ्करोऽपीष्यते; तथापि स एव विशेषो घटज्ञानत्वादिरस्त्विति विषयासिद्धिः । अथ विषयेणापि सम्बन्धप्रतिभासनात् सोऽपीष्यते । न; तस्यैव सम्बन्धस्य विचार्यमाणत्वात् । 'घटज्ञानत्वादिरूप उपाधि में घटादि निमित्त हैं', ऐसा नहीं कह सकते, कारण घटादि से कोई सम्बन्ध नहीं है । यदि सम्बन्ध के बिना भी घटादि को निमित्त मानें, तो पटादि-ज्ञानत्व में भी घट निमित्त हो जायगा । घटादिज्ञानत्वादि जातिरूप भी नहीं हैं। कारण घटविषयक ज्ञान में घटज्ञानत्व और पटविषयक ज्ञान में पटज्ञानत्व और उभयविषयक समूहालम्बन ज्ञान में घटज्ञानत्व, पटज्ञानत्व दोनों के होने से साङ्कर्य हो जायगा । समर्थन—प्रतिविषय ज्ञान-व्यक्ति भिन्न-भिन्न होने से समूहालम्बन ज्ञान होता ही नहीं, तो फिर संकर कहाँ होगा ? खण्डन—यह भी युक्त नहीं, कारण ऐसा मानने पर विशिष्ट ज्ञान भी नहीं होगा। यदि कहें कि जैसे रूपत्वव्याप्य चित्रत्वजाति है, वैसे ही घटपट-समूहालम्बन-ज्ञान में घटपटज्ञानत्व से विलक्षण एक जाति मानेंगे। अतः समूहालम्बन में दोनों का समावेश न होने से सङ्कर नहीं है, तो वह भी ठीक नहीं। कारण कोई भी ज्ञान केवल एकविषयक नहीं होता। निर्विकल्पक भी अनेकविषयक होता है । एवञ्च घटज्ञानत्व, पटज्ञानत्वरूप एक-एक विषयक व्यवहार का लोप हो जायगा । समर्थन—गुण की जाति में सङ्कर-दोष नहीं होता, अतः घटज्ञानत्व पटज्ञानत्व, दोनों जातियाँ समूहालम्बन ज्ञान में रहती ही हैं । खंडन—यदि विषय-भेद से ज्ञान में जातिभेद मान लें, तो उन्हीं जातियों से प्रतीतियों में वैलक्षण्य सिद्ध ही है । फिर घटादि विषयों की असिद्धि हो जायगी । समर्थन—घट-ज्ञानत्वादि को विषय का ही तो सम्बन्ध मानते हैं, अतः सम्बन्ध की अन्यथानुपपत्ति से विषय की सिद्धि होगी ही । खण्डन—विषय तथा ज्ञान के उसी