भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

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४७४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ

नापि द्वितीयः ; प्रतीतावन्योन्याश्रयप्रसङ्गात् । प्रतियोगिरूपत्वेन अप्रतीतावधिकरणप्रतीतिः, अधिकरणस्वभावत्वेनास्मृतौ प्रतियोगिस्मृतिश्च तद्ग्रहणकारणम् । अतः केतरेतराश्रय इति चेत् । मैवम् ; एवं हि सति 'कुम्भः पटो न भवती'त्यत्र यथैव तस्याभावस्य प्रतियोगितया पटो निषिद्ध्यते तथा कुम्भोऽपीति सोऽपि कुम्भात्मतया निषिद्धः प्रसज्येत । वस्तुतोऽन्योन्याभावस्य कुम्भप्रतियोगित्वेऽपि कुम्भस्यापटत्वनिरूपणकाले कुम्भस्य प्रतियोगिता नापेक्ष्यते, किन्त्वाश्रयतैवेति कुम्भाप्रतिक्षेपः । पटस्य तु प्रतियोगितैवापेक्ष्यते, न त्वाश्रयतेति कुम्भवत् पटस्यापि न सङ्ग्रहापत्तिः । यद्यप्यन्योन्याभावस्य उभयप्रतियोगिता ; तथाप्यन्या कुम्भाश्रयता, अन्या च पटाश्रयता, अन्या कुम्भप्रतियोगिता, अन्या च पटप्रतियोगिता । तेनान्यो- इतरेतराभाव या अन्योन्याभाव भेद है, यह द्वितीय पक्ष मानें तो अन्योन्याश्रय हो जायगा । कारण प्रतियोगित्वरूप से प्रतियोगी का ज्ञान अन्योन्याभाव के ज्ञान में कारण है और अभावरूपत्व ही प्रतियोगित्व है। अतः जबतक अभाव-ज्ञान न हो, तबतक अभावाभावस्वरूप प्रतियोगित्व का ज्ञान नहीं होगा । समर्थन—प्रतियोगित्वरूप से अप्रतीति के काल में अधिकरण की प्रतीति तथा अधिकरणत्वरूप से अस्मृति के काल में प्रतियोगी की स्मृति अन्योन्याभाव के ग्रह में कारण है, अतः अन्योन्याश्रय नहीं है। खण्डन—ऐसा मानने पर 'कुम्भः पटो न भवति' यहाँ जैसे उस अभाव के प्रतियोगित्वरूप से पट निषिद्ध होता है, वैसे ही कुम्भ भी निषिद्ध होता है। अतः उस काल में कुम्भत्वरूप से कुम्भ का निषेध हो जायगा । वस्तुतः अन्योन्याभाव कुम्भप्रतियोगिक होने पर भी कुम्भ में पट के निषेध- काल में कुम्भ की प्रतियोगिता अपेक्षित नहीं, किन्तु आश्रयता ही अपेक्षित है। अतः उस काल में कुम्भ का निषेध नहीं होता । इसी तरह पट की प्रतियोगिता ही अपेक्षित है, आश्रयता नहीं । अतः कुम्भ के तुल्य पट का अधिकरणरूप से संग्रह नहीं होता । समर्थन—यद्यपि अन्योन्याभाव के दोनों प्रतियोगी और दोनों अधिकरण हैं, तथापि कुम्भनिष्ठ आश्रयता अन्य है और पटनिष्ठ आश्रयता अन्य । वैसे ही कुम्भनिष्ठ प्रति- योगिता अन्य है और पटनिष्ठ प्रतियोगिता अन्य । अतः अन्योन्याभाव के उभय- प्रतियोगिक और उभयाश्रित होने पर भी सर्वत्र दोनों का निषेध या संग्रह नहीं होता ।