भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४७५ न्याभावस्योभयप्रतियोगिकत्वे चोभयाश्रितत्वे च नोभयोरपि सङ्ग्रहप्रतिक्षेप- विरोधापत्तिः । नापि च प्रतियोगित्वस्यानुयोगिनो भेदोपजीवनेऽन्योन्याश्रयः, अनुपजीवने च स्वस्मादपि भेदग्रहापत्तिः प्रसज्येत । यतः स्मर्यमाणस्य प्रतियोगिता, अनुभूय- मानस्य चाऽऽश्रयतेत्येतावन्मात्र एवोक्ते स्वस्मादपि भेदग्रहानापत्तिः । न चैवं ' स एवायमि'त्यत्रापि भेदग्रहप्रसङ्गः; वास्तवतत्सत्त्वासत्त्वाभ्यां विशेषात् । मैवम्; तथाहि—किमधिकरणप्रतीतिरधिकरणतया प्रतीतिः, उत वस्तुगत्या अधिकरणस्य स्वरूपेण विवक्षिता ? आद्ये किमीयाऽधिकरणतया घटादेः प्रतीति- स्तस्य कारणं स्यात् । न तावदन्योन्याभावाधिकरणतया; दण्डाद्यप्रतीतौ दण्डा- धिकरणताया इव तदप्रतीतौ तदधिकरणतायाः प्रत्येतुं पूर्वमशक्यत्वात् , विशिष्ट- किन्तु जिस काल में जिसमें प्रतियोगित्व की विविक्षा होती है, उसका निषेध और अन्य का संग्रह होता है । यदि अनुयोगिनिष्ठ भेद प्रतियोगित्वज्ञान की अपेक्षा करता है, तो प्रतियोगित्व के अभावाभावरूप होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा । 'यदि अपेक्षा नहीं करता, तो स्व से स्व में भेदग्रह हो जायगा' यह शङ्का भी युक्त नहीं है । कारण स्मृति का विषय प्रतियोगी होता है और अनुभव का विषय अधिकरण, इतना ही कहने पर स्व में स्व के भेदग्रह की आपत्ति नहीं होगी । समर्थन—'स एवायम्' यहाँ इदमंश गृह्यमाणधर्मिक और तदंश स्मर्यमाणप्रतियोगिक होने से 'भेदग्रह क्यों न हो' यह शङ्का भी युक्त नहीं । कारण प्रतियोगी के स्मृत होने पर भी वास्तव भेद न होने से भेदप्रतीति नहीं होती । अर्थात् भेदसत्तासहित प्रतियोगी-स्मरणादि ही भेदग्रह के कारण हैं । यहाँ वैसा न होने से भेदप्रतीति नहीं होती । खण्डन—अधिकरण-प्रतीति से क्या अधिकरणत्वरूप से अधिकरण की प्रतीति विवक्षित है या वस्तुतः जो अधिकरण है, उसकी स्वरूपतः प्रतीति विवक्षित है ? प्रथम पक्ष मानें, तो कहिये किसकी अधिकरणता से घटादि की प्रतीति भेद-प्रत्यय का कारण है ? अन्योन्याभाव की अधिकरणतारूप से अधिकरणता-प्रतीति तो कारण हो नहीं सकतीं; क्योंकि दण्ड के अप्रतीतिकाल में दण्डाधिकरणता की तरह अभाव के अप्रतीति-