भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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४७६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ प्रतीत्या विशेषणस्यावश्योल्लेख्यत्वात्, विशिष्टस्य च विशेषणघटितमूर्तित्वात् । नापि यस्य कस्यचिदधिकरणतया प्रतीतिस्तत्कारणम्, यत्र भिन्नेऽभेद- भ्रमस्तत्र धर्मिणः सत्त्वाद्याधारतया प्रतीतावपि तदनुत्पत्तेः । न तन्मात्रात्तदुत्पत्तिः ; अपितु प्रतियोगिस्मृतिसहितात् । सा च तदा नास्तीति तदनुत्पत्तिरिति चेन्न । प्रतियोगिस्मृतिरपि किं प्रतियोगितया स्मृतिः, उत वस्तुगत्या प्रतियोगिनः स्वरूपेणेति विकल्प्यत्वात् । आद्ये किमन्योन्याभावप्रतियोगितया, यस्य कस्यचित् प्रतियोगितया वा ? नाद्यः ; अन्योन्याभावाप्रतीतौ तदनुपपत्तेः पूर्ववत् । नापि द्वितीयः ; तस्य वस्तुगत्या भिन्नस्याभिन्नतया भ्रमविषयीकृतस्य स्वदेशेतरदेशादावसत्त्वेन प्रतीयमानत्वे स्वाभावप्रतियोगितया प्रतीतावप्यन्योन्याभावप्रतीत्यनुपपत्तेः । प्रतियोग्यनुभूतिः सा, न स्मृतिरिति चेन्न । स्मृतित्वस्याप्रयोजकत्वात् । काल में भी अन्योन्याभाव की अधिकरणता की प्रतीति संभव है । विशिष्ट विशेषणघटित होने से उसकी प्रतीति में विशेषण का उल्लेख आवश्यक है । जिस किसीकी अधिकरण- तारूप से अधिकरण-प्रतीति भेदग्रह का कारण नहीं है, क्योंकि जहाँ भिन्न में अभेद-भ्रम होता है, वहाँ भी धर्मी की सत्त्व के आधारत्वरूप से प्रतीति होती है । अतः भेद-प्रत्यय हो जायगा । समर्थन — केवल अधिकरणस्वरूप से अधिकरण की प्रतीतिमात्र कारण नहीं है, किन्तु प्रतियोगी की स्मृति से युक्त तादृश प्रतीति ही कारण है । भ्रमस्थल में प्रतियोगी की स्मृति न होने से भेदग्रह नहीं होता । खण्डन — प्रतियोगी की स्मृति भी जो कारण है, क्या वह प्रतियोगित्वरूप से विवक्षित है या वस्तुतः जो प्रतियोगी हो, उसकी स्वरूप से स्मृति कारण है ? प्रतियोगित्वरूप से कहें, तो क्या अन्योन्याभाव के प्रति- योगित्वरूप से प्रतीति कारण है या जिस किसीके प्रतियोगित्वरूप से ? आद्य पक्ष में अन्योन्याभाव की अप्रतीति-काल में अन्योन्याभाव की प्रतियोगितारूप से प्रतीति पूर्वोक्त प्रकार से हो नहीं सकती, फिर वह कारण कैसे हो सकती है ? द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण जिस काल में अन्य देश- ( आपण ) निष्ठ अभाव का प्रतियोगित्व-ग्रह है, उस काल में वस्तुतः भिन्न में जो अभेद-भ्रम होता है, वहाँ भेद-ग्रह हो जायगा । समर्थन — प्रतियोगी की स्मृति भेद-ग्रह का कारण है । यहाँ तो प्रतियोगी की अनु-