खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 497, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४७७ अन्यथा अनुभवमानयोरन्योन्याभावाप्रतीतिप्रसङ्गात् । अत्रान्तराले स्मृतिकल्पनया 'नान्योन्यात्मानाविमौ' इत्यनुभवबाधितया प्रयोजकत्वेऽपि वा स्मृतित्वस्य 'योऽसौ तत्र नासीत् सोऽयमि'ति स्मर्यमाणाभावप्रतियोगिकत्वेऽपि वस्तुगत्या भिन्नस्याभिन्नतया भ्रमेणोल्लिख्यमानस्यान्योन्याभावप्रतीत्यनुदयात् । दोषाभावोऽपि हेतुः, स भ्रमोदाहरणे नास्तीति चेन्न । पूर्वदृष्टे स्मृतिमतो वस्तुगत्याऽन्यस्यैवानन्तरदृष्टस्य पूर्वदृष्टात् भिन्नमभिन्नं वेति अनिरूपितस्यापि सम्भवेन तत्रेतरेतराभावबुद्ध्यापत्तेः । बुद्ध्यत एवेति चेन्न । पश्चात्संशयदर्शनात् । विशेषधीरपि तत्र हेतुरिति चेन्न । विशेषत्वस्यान्योन्याभावनिरूपणं विना दुर्निरूपत्वात् । भूति है, स्मृति नहीं, अतः भेद-ग्रह नहीं होगा । खण्डन—'इमौ न अन्योन्यात्मानौ' इस स्थल में जहाँ प्रतियोगी का अनुभव है, स्मृति नहीं, वहाँ भी भेद-ग्रह होता है, पर उसमें प्रतियोगी का स्मृतित्व प्रयोजक ही नहीं है । किंच 'इमौ न अन्योन्यात्मानौ' यहां अनुभव से बाधित होने से भेद-ग्रह में प्रतियोगी-स्मृति के प्रयोजकत्व की कल्पना व्यर्थ है । किंच—'योऽसौ तत्र नासीत् सोऽयम्' इस स्थल में जहाँ स्मृतिविषय अभाव प्रतियोगी है, वहां वस्तुतः भिन्न में अभिन्न का भ्रम होता है । यदि प्रतियोगी-स्मृति को प्रयोजक मानें, तो उक्त स्थल में भेद-ग्रह हो जायगा । समर्थन—भेदज्ञान में दोषाभाव भी हेतु है और वह अभेद-भ्रमस्थल में है नहीं, अतः वहां भेद-ग्रह नहीं होता । खण्डन—जहाँ पूर्वदृष्ट की स्मृति हो और अनन्तर उससे वस्तुतः भिन्न का ही प्रत्यक्ष हुआ हो, किन्तु 'वह पूर्वदृष्ट से भिन्न है या अभिन्न है' ऐसा निश्चय न हो, वहाँ दोषाभाव भी होने से भेद-ग्रह हो जायगा । 'वहाँ भेद-ग्रह होता ही है' यह नहीं कह सकते, कारण पीछे संदेह देखा जाता है । यदि भेद का ग्रह होता तो संदेह कैसे होता ? समर्थन—भेद-ग्रह में विशेष का दर्शन भी कारण है । अभेद-भ्रमस्थल में विशेष का दर्शन है नहीं, अतः भेद-ग्रह नहीं होता । खण्डन—जबतक भेद का ज्ञान न हो तबतक विशेष का ज्ञान हो नहीं सकता, कारण व्यावृत्ति ( इतर से भेद )- ज्ञान के जनक धर्म को ही 'विशेष' कहते हैं । एवञ्च अन्योन्याभाव के निरूपण के बिना विशेष का निरूपण हो नहीं सकता ।