भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 498

४७८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ एतेन वस्तुगत्या प्रतियोगिनः स्वरूपेण स्मृतिः सहकारिणीत्येतदपि व्युदस्तम् । वस्तुगत्याऽधिकरणस्य स्वरूपेण प्रतीतिः सहकारिणीत्यपि, भिन्नस्या- भिन्नतया वृक्षादेः प्रतीयमानस्यान्योन्याभाववत्तया ग्रहणप्रसङ्गात् । नापि तृतीयः ; अभावस्य निर्धर्मकतापक्षे तस्य विश्वाभिन्नत्वप्रसक्तौ विश्वस्याप्यभावरूपत्वेन निर्धर्मकतया धर्मलक्षणान्योन्याभावविरहिण एकरूप्या- पत्तेः, अभावे धर्माभावात् । स्वरूपमेव भेद इति चेत् ; योऽसौ भेदस्तस्य स्वात्मा स किं कस्मादपि भेदः, उत निष्प्रतियोगिक एव ? न तावन्निष्प्रतियोगिक एव; प्रमाणाभावे- नासत्त्वप्रसङ्गात् । योऽसौ भेदव्यवहारोऽस्ति स कस्मादपि, न तु नीलव्यवहारवत् निष्प्रतियोगिकः । स च निष्प्रतियोगिको नोपपद्यते । निष्प्रतियोगिकोऽपि वा समर्थन — वस्तुस्वरूप से जो प्रतियोगी हो, उसका स्वरूप से स्मरण भेदज्ञान का कारण है तथा वस्तुतः जो अधिकरण हो, उसका स्वरूप से ज्ञान भेद-ग्रह का सहकारी है । अतः अन्योन्याश्रय नहीं है । खण्डन — भिन्न-भिन्न वृक्षों में जहाँ अभेद-भ्रम होता है, वहाँ भी भेद-ग्रह हो जायगा; पर होता नहीं । अतः प्रतियोगित्वरूप से प्रतियोगी के ज्ञान को कारण मानना चाहिए । प्रतियोगित्वरूप से प्रतियोगी के ज्ञान को कारण मानें तो अन्योन्याश्रय हो जायगा । 'भेद वैधर्म्य है' यह तृतीय कल्प भी युक्त नहीं है, कारण जो पण्डित अभाव में धर्म को नहीं मानते, उनके मत में अभाव ( संसर्गाभाव अथवा भेद ) विश्व से भिन्न नहीं होगा, किन्तु अभिन्न हो जायगा । फिर विश्व भी अभावरूप होने से धर्मरहित होने के कारण धर्मरूप भेद से रहित है, अतः एकरूप हो जायगा । समर्थन — 'वैधर्म्यं भेदः' यह भावस्थल के लिए ही है । अभाव-स्थल में तो स्वरूप को ही भेद कहेंगे, तो उपर्युक्त दोष न होगा । खंडन — जो अभाव का स्वरूप ही भेद है, तो वह किसी प्रतियोगी से निरूपित है या निष्प्रतियोगिक याने प्रतियोगी के निरूपण से रहित ? प्रतियोगी के निरूपण से रहित भेद हो नहीं सकता । यदि भेद को निष्प्रतियोगिक मानें; तो प्रमाण न होने से उसकी सिद्धि ही नहीं होगी, कारण जो भेद-व्यवहार होता है वह किसी प्रतियोगी से ( प्रतियोगी की अपेक्षा ) ही होता है । वह नीलपीतादिव्यवहार की तरह प्रतियोगी से रहित नहीं होता । अतः बिना प्रतियोगी के भेद की उपपत्ति नहीं हो सकती ।