भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 499, कुल 610 में से

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पृष्ठ 499

परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४७६ यद्ययं सप्रतियोगिकव्यवहारं करोति, प्रतियोगिनियमो न स्यादिति स्वस्मादपि भेदव्यवहारं कुर्यात् । स्वस्माद्भेदः कथं सम्भवतीति चेत्; तत्किं भिन्नाद्भेदः, नन्वेवमनवस्था स्यात् । नापि प्रथमः ; वक्तव्यं हि तद्यस्मादसौ भेदः, न तावत् सर्वस्मात्, स्वात्म- नोऽपि भेदप्रसङ्गात् । नापि घटादेः; घटादिना सह तस्यावध्यवधिमद्भावो योऽसौ स अर्थान्तरं वा स्यात् स्वरूपमेव वा ? आद्ये तस्यापि भेदावधित्वेन तत्राप्येवमनुयोगे यद्येतदेवोत्तरम्, अनवस्था स्यात् । अथ तत्र स्वरूपमेव; तर्हि 'प्रथमस्य तथाभावे प्रद्वेषः किन्निबन्धनः' इति प्रथमत एव स्वरूपं वाच्यम् । तदपि न ; तथाहि—यदि घटाभिः सार्धमवध्यवधि- यदि निष्प्रतियोगिक भेद से भी प्रतियोगी का व्यवहार करें, तो प्रतियोगी का नियम ही नहीं रहेगा । एवञ्च स्व से स्व में भेद की प्रतीति होने लगेगी । समर्थन—स्व में स्व के भेद का सम्भव कैसे होगा ? अर्थात् धर्मित्व और प्रतियोगित्व भेदैकार्थसमवायी होने से एकत्र रह नहीं सकते, क्योकि एकत्व और अनेकत्व परस्पर विरुद्ध हैं । अतः स्व में स्व का भेद नहीं रह सकता । खण्डन— तो क्या भिन्न में भेद होता है ? यदि भिन्न में भेद मानें, तो अनवस्था हो जायगी । देखिये—जिस भेद से भिन्न है, वह भेद भी अन्य भेद से भिन्न में ही रहेगा । इस तरह एक भेद से भिन्न में अन्य भेद के रहने से अनवस्था हो जायगी । 'वह भेद किसी प्रतियोगी की अपेक्षा से है' यह प्रथम पक्ष भी युक्त नहीं है, कारण कहना होगा कि किसकी अपेक्षा वह भेद है ? सबकी अपेक्षा तो वह भेद है नहीं, कारण यदि सबकी अपेक्षा भेद मानें, तो सर्व में स्व का भी अन्तर्भाव होने से स्व से भी स्व का भेद हो जायगा । घटादि की अपेक्षा सभी भेद अभाव नहीं हैं, कारण घटादि के साथ जो अभाव का अवधि-अवधिमद्भाव सम्बन्ध है, वह अन्य पदार्थ है या स्वरूप है ? यदि उसे अन्य पदार्थ मानें, तो वह भी अभावनिष्ठ भेद की अवधि है, अतः उसके साथ अवध्यवधिमद्भाव को भी अर्थान्तर कहेंगे, तो इस प्रकार उत्तरोत्तर अवध्यव- धिमद्भाव के स्वीकार से अनवस्था हो जायगी । यदि वहाँ स्वरूप को ही सम्बन्ध मानें, तो प्रथम सम्बन्ध को स्वरूप मानने में क्या द्वेष है, जो उसे अर्थान्तर मानते हैं, अतः प्रथम सम्बन्ध को ही स्वरूप मान लेना चाहिए । किन्तु ऐसा मान नहीं सकते ।

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