खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४७६ यद्ययं सप्रतियोगिकव्यवहारं करोति, प्रतियोगिनियमो न स्यादिति स्वस्मादपि भेदव्यवहारं कुर्यात् । स्वस्माद्भेदः कथं सम्भवतीति चेत्; तत्किं भिन्नाद्भेदः, नन्वेवमनवस्था स्यात् । नापि प्रथमः ; वक्तव्यं हि तद्यस्मादसौ भेदः, न तावत् सर्वस्मात्, स्वात्म- नोऽपि भेदप्रसङ्गात् । नापि घटादेः; घटादिना सह तस्यावध्यवधिमद्भावो योऽसौ स अर्थान्तरं वा स्यात् स्वरूपमेव वा ? आद्ये तस्यापि भेदावधित्वेन तत्राप्येवमनुयोगे यद्येतदेवोत्तरम्, अनवस्था स्यात् । अथ तत्र स्वरूपमेव; तर्हि 'प्रथमस्य तथाभावे प्रद्वेषः किन्निबन्धनः' इति प्रथमत एव स्वरूपं वाच्यम् । तदपि न ; तथाहि—यदि घटाभिः सार्धमवध्यवधि- यदि निष्प्रतियोगिक भेद से भी प्रतियोगी का व्यवहार करें, तो प्रतियोगी का नियम ही नहीं रहेगा । एवञ्च स्व से स्व में भेद की प्रतीति होने लगेगी । समर्थन—स्व में स्व के भेद का सम्भव कैसे होगा ? अर्थात् धर्मित्व और प्रतियोगित्व भेदैकार्थसमवायी होने से एकत्र रह नहीं सकते, क्योकि एकत्व और अनेकत्व परस्पर विरुद्ध हैं । अतः स्व में स्व का भेद नहीं रह सकता । खण्डन— तो क्या भिन्न में भेद होता है ? यदि भिन्न में भेद मानें, तो अनवस्था हो जायगी । देखिये—जिस भेद से भिन्न है, वह भेद भी अन्य भेद से भिन्न में ही रहेगा । इस तरह एक भेद से भिन्न में अन्य भेद के रहने से अनवस्था हो जायगी । 'वह भेद किसी प्रतियोगी की अपेक्षा से है' यह प्रथम पक्ष भी युक्त नहीं है, कारण कहना होगा कि किसकी अपेक्षा वह भेद है ? सबकी अपेक्षा तो वह भेद है नहीं, कारण यदि सबकी अपेक्षा भेद मानें, तो सर्व में स्व का भी अन्तर्भाव होने से स्व से भी स्व का भेद हो जायगा । घटादि की अपेक्षा सभी भेद अभाव नहीं हैं, कारण घटादि के साथ जो अभाव का अवधि-अवधिमद्भाव सम्बन्ध है, वह अन्य पदार्थ है या स्वरूप है ? यदि उसे अन्य पदार्थ मानें, तो वह भी अभावनिष्ठ भेद की अवधि है, अतः उसके साथ अवध्यवधिमद्भाव को भी अर्थान्तर कहेंगे, तो इस प्रकार उत्तरोत्तर अवध्यव- धिमद्भाव के स्वीकार से अनवस्था हो जायगी । यदि वहाँ स्वरूप को ही सम्बन्ध मानें, तो प्रथम सम्बन्ध को स्वरूप मानने में क्या द्वेष है, जो उसे अर्थान्तर मानते हैं, अतः प्रथम सम्बन्ध को ही स्वरूप मान लेना चाहिए । किन्तु ऐसा मान नहीं सकते ।
मद्भावसम्बन्धोऽस्य स्वरूपं प्रतियोगिना सार्धं तद्भावस्वरूपस्यास्य निषेध्य- निषेधभावलक्षणः सम्बन्धः स्वरूपं न स्यात्, स्वरूपस्यैकत्वात् । अनयोश्च सम्बन्धयोर्भिन्नत्वात् । न हि यदेव प्रतियोगिनः सकाशाद्भिन्नत्वं तदेव तन्निषेधत्वमिति सम्भवति, ततो व्यतिरिक्तस्यानिषेध्यसाधारणत्वात् , निषेध्यनिषेधभावस्य नियतवस्त्वपेक्ष- त्वादिति । एवं कार्यकारणभावादौ स्वभावसम्बन्धान्तरेऽपि वाच्यम् । ऊहनी- यश्चाऽन्यत्रापि स्वरूपभेदे दोष एषः । किञ्च धर्मान्तरं भेद इति ब्रुवतः कोऽभिसन्धिः - किं घटत्वादय एव भेदः, उत भेदो नामान्य एवैकः कश्चिद्धर्मः ? आद्ये घटत्वादीनां सप्रतियोगिकत्वप्रसङ्गः, भेदस्य सप्रतियोगिकत्वात् । न च घटत्वादयस्तथा, पटाद्यनपेक्षतयैव प्रतीतेः । यदा पटाद्यपेक्षया प्रतीयन्ते तदा भेदव्यवहारं कुर्वन्तीति चेन्न । प्रतीतौ कस्य पराद्यपेक्षेति वाच्यम्-किं घटत्वादेरुत धर्मस्य कस्यचित् ? आद्ये पटा- देखिये—यदि घटादि के साथ अभाव के अवधि-अवधिमद्भावरूप संबन्ध को स्वरूप मानें, तो प्रतियोगी के साथ अभाव का निषेध्यनिषेधकभावरूप संबन्ध स्वरूप न कहलायेगा, कारण स्वरूप एक है और ये दोनों सम्बन्ध भिन्न-भिन्न हैं । अर्थात् अभाव एकरूप होने से वह इन भिन्न-भिन्न सम्बन्धस्वरूप ( द्विरूप ) नहीं हो सकता । जो प्रतियोगी से भिन्न है, वही प्रतियोगी का निषेधक है—ऐसा भी सम्भव नहीं, कारण उस घटादि से भिन्नत्व अनिषेध्य पटादि-साधारण भी है और घटादि से निषेध्य-निषेधकभाव नियत वस्तु है । इसी प्रकार मृद्घट के कार्य-कारणभाव को स्वरूप माने तो मृद्घट का विशेष्यविशेषणभावरूप सम्बन्ध स्वरूप न कहलायेगा । कारण स्वरूप एक है और एक कार्यकारणभाव से अन्यत्र भी विशेष्यविशेषणभाव होने से दोनों सम्बन्ध भिन्न हैं । अन्यत्र भी स्वरूपभेद में इस दोष की ऊहा (अनुवृत्ति) करनी चाहिए । किञ्च—'धर्मान्तर भेद है' यह कहनेवाले का क्या अभिप्राय है, क्या घटत्वादि ही भेद हैं या अन्य ही कोई एक धर्म भेद है ? प्रथम पक्ष कहें, तो भेद सप्रतियोगिक होने से घटत्वादि भी सप्रतियोगिक हो जायँगे । किन्तु घटत्वादिक सप्रतियोगिक नहीं हैं, कारण पटादि की अनपेक्षा से उनकी प्रतीति होती है । समर्थन—जिस काल में घटत्वादि की पटादि की अपेक्षा प्रतीति होती है, उस काल में वे घटत्वादि भेद-व्यवहार कराते हैं। और जिस काल में पटादि की अपेक्षा के
परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४८१ पेक्षामन्तरेण घटत्वप्रतीत्यनुपपत्तिप्रसङ्गः । नहि यदन्तरेण यदुत्पद्यते तत्तत्कारणं नाम ? वह्नाविवावान्तरजातिभेदे कारणभेदस्य चरितार्थयितुमशक्यत्वात् । साक्षा- त्कारित्वादिना सह परापरभावानुपपत्तेः । जात्योः परापरत्वसङ्करमिच्छतामपि मते पञ्चम्यर्थावधिभावः प्रतिपाद्यमानः केन सममन्वियात् । घटत्वस्यावधिघटितत्वे तथैव परं प्रतीत्यापत्तेः । बिना घटत्वादि की प्रतीति होती है, उस काल में घटत्वादि-व्यवहार होता है । खण्डन—प्रतीति में किसे पटादि की अपेक्षा है, यह कहना होगा, क्या घटत्वादि को या घटत्वादिनिष्ठ किसी धर्म को ? आद्यपक्ष में पटादि की अपेक्षा के बिना घटत्वादि की कदाचित् भी प्रतीति नहीं होगी, पर वह होती है। फिर पटादि की अपेक्षा के बिना भी यदि घटत्वादि की प्रतीति को आप मानें, तो घटत्वादि में पटादि की अपेक्षा कारण ही नहीं रही, क्योंकि जिसकी अपेक्षा के बिना जो उत्पन्न होता है, उसमें वह कारण नहीं होता । समर्थन—वह घटत्वज्ञान विलक्षण है, जिसमें पटादि की अपेक्षा है । अतः जैसे वह्नि में विलक्षण जाति मानकर तृण, अरणि और मणि की कारणता व्यभिचरित नहीं होती, वैसे ही घटत्वज्ञान में भी दो जातियाँ मानने पर पटादि की अपेक्षा का व्यभिचार नहीं होगा । खण्डन --वह्नि में तृणादि-कारणता प्रत्यक्ष है, अतः वहाँ विलक्षण जाति को मानकर व्यभिचार का निवारण उचित ही है । किन्तु यहाँ घटत्वज्ञान में पटादिकी अपेक्षा प्रत्यक्ष नहीं है, अतः उससे ज्ञानगत विलक्षण जाति की कल्पना युक्त नहीं है । किञ्च—प्रत्यक्षत्व जाति पटादि-ज्ञान में भी है और वहाँ घटत्व-ज्ञानत्व नहीं है, घटत्व-ज्ञानत्व अनुमित्यात्मक घटत्व-ज्ञान में भी है, वहाँ प्रत्यक्षत्व नहीं है और दोनों प्रत्यक्षात्मक घटत्व-ज्ञान में है, अतः सङ्कर दोष होने से घटत्व-ज्ञानत्व जाति नहीं हो सकती । किञ्च—सङ्कर होने पर भी घटत्व-ज्ञानत्व को जाति मान लें, तो भी 'पटात्' इस पंचमी से उक्त अवधित्व का कहाँ अन्वय होगा ? घटत्व तो अवधि में साकांक्ष है नहीं । यदि उसे अवधि में साकांक्ष मानें, तो सर्वदा अवधि की अपेक्षा से घटित ही घटत्वादि की प्रतीति होने लगेगी । ६१
तद्धर्मस्य तथात्वमिति चेन्न । तथाहि—न द्वितीयः, स एव सापेक्षप्रति- पत्तिर्भेदो न तु घटत्वादिः; घटत्वादेश्च स भेदः स्यात् , तद्धर्मकत्वात् । घटादेस्तु भेदपर्य्यनुयोगे तदभिधानमसङ्गतम् । कथञ्च भिन्नैरनुगतव्यवहारः स्यात् । तथापि तथा सति वा किन्न तैरेव तदादिव्यवहारोऽपि स्यात् । नापि द्वितीयः ; अनभ्युपगमात् । सप्तपदार्थानामनन्तर्भावप्रसङ्गात् , स्वात्मनि वृत्त्यवृत्तिभ्यामनुपपत्तेश्च । समर्थन—घटत्वादि का धर्म भेद है, और वही अवधि में सापेक्ष है। खंडन— यही द्वितीय कल्प है, पर वह भी युक्त नहीं। कारण वही, जिसकी सापेक्ष प्रतिपत्ति (प्रतीति) है, भेद मानिये, घटत्वादि को भेद क्यों मानते हैं? वह भेद घटत्वादि का धर्म होने से घटत्वादि का हुआ। अतः घटनिष्ठ भेद के प्रश्न पर उसका कथन असङ्गत है। किञ्च—यदि घटत्व-पटत्वादि प्रत्येकवृत्ति धर्म का भेद कहें, तो उस धर्म के एक-एक- निष्ठा होने से अनुगत भेदबुद्धि या भेद-व्यवहार कैसे होगा ? यदि च सर्वत्र अनुगत भेद न होने पर भी अनुगत भेदव्यवहार मान लें, तो वैसे ही अनुगत गोत्वादि के बिना भी अनुगत गवादि-व्यवहार हो जायगा। फिर गोत्वादि जातियों की कल्पना भी व्यर्थ हो जायगी। ‘भेद अन्य कोई धर्म है’ यह द्वितीय कल्प भी अयुक्त है, कारण वैसा धर्म अन्योन्याभाव ही हो सकता है। किन्तु अन्योन्याभाव खण्डित होने से उसका स्वीकार संभव ही नहीं है। अन्योन्याभाव से भिन्न ऐसा कोई धर्म भी नहीं है, जो सप्त पदार्थों में रहे और भेद-व्यवहार के योग्य हो। यदि ऐसे किसी विलक्षण धर्म को मान लें, तो उसका सप्तपदार्थों में अन्तर्भाव न होने से ‘सात ही पदार्थ हैं’ यह वैशेषिकों का विभाग असङ्गत हो जायगा। किंच—वह विलक्षणधर्मरूप भेद स्व (भेद) में रहता है या नहीं? यदि नहीं रहता, तो भेदरहित भेद सर्वात्मक होनेके कारण उसका सप्त पदार्थों में ही अन्तर्भाव हो जाने से भेद को अतिरिक्त मानना व्यर्थ है। यदि रहता है, तो वही भेद रहता है या अन्य? यदि वही रहता है, तो आत्माश्रय हो जायगा। यदि अन्य भेद रहता है, तो उस भेद में अन्य भेद, फिर उसमें भी अन्य भेद, इस तरह अनवस्था हो जायगी।
परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४८३ ईदृशाञ्च उपाध्यालीढवैचित्र्याणां जात्या समर्थने सर्वोपाध्युपधानानां जात्यैव समर्थनं स्यात् । ननु घटत्वादय एव भेदाः, घटत्वादिज्ञानाविशेषेऽपि च प्रतियोगिज्ञान- सहकारिवशाद्विचित्रव्यवहारोपपत्तिरिति चेन्न । व्यवहारसत्यत्वार्थं वास्तवानुगत- विशेषस्यावश्यं स्वीकर्तव्यत्वे तथैव पर्यनुयोगानुवृत्तेः । अनन्तभेदपरम्पराभ्युपगमे च तत्क्रमज्ञेयतायां प्रतीत्यपर्यवसानात् । तद्युग- पज्ज्ञेयतायामत्यन्तसदृशतया कस्यचिदन्यभेदस्यान्यदीयत्याऽपि ग्रहणसम्भवा- दिना सर्वत्र प्रामाण्यानाश्वासप्रसङ्गात् । सर्वप्रतीतिनियमानङ्गीकारे चाप्रतीतसत्त्वे प्रमाणाभावात् । समर्थन—सप्तपदार्थों में वृत्ति भेद को जाति ही क्यों न मानें ? खण्डन—प्रति- योगित्व, अधिकरणत्व आदिरूप उपाधियों से जिसमें वैचित्र्य है, ऐसे भेद को भी यदि जाति मानें, तो प्रमेयत्वादि को भी जाति ही मान लीजिये । फिर उपाधिमात्र का उच्छेद ही हो जायगा । समर्थन—घटत्व आदि ही भेद हैं । घटत्व आदि के ज्ञान में विशेष न होने पर भी प्रतियोगिज्ञानरूप सहकारी की अपेक्षा से विचित्र व्यवहार की उपपत्ति होती है । खण्डन—‘घटः’ इत्याकारक तथा ‘पटाद् भिन्नः घटः’ इत्याकारक दो प्रकार के व्यवहार होते हैं । उन व्यवहारों की सत्यता के लिए वास्तविक अर्थगत विशेष अवश्य मानना होगा । यदि उसे न मानें, तो दोनों में से एक व्यवहार असत्य हो जायगा । यदि अर्थगत विशेष को मान लें, तो वही भेद हो जायगा, घटत्वादि को भेद मानना व्यर्थ है । यदि भेद को अनन्त मानें, तो वह भेद-परम्परा क्रमशः ज्ञेय है या एककाल में ? यदि क्रमशः ज्ञेय मानें, तो भेद अनन्त होने से भेद-प्रतीति की समाप्ति ही नहीं होगी । यदि एक ही काल में सभी भेदों का ज्ञान मानें, तो सभी भेदों के सदृश होने से ‘किससे कौन भिन्न है, यह इससे भिन्न है या नहीं ?’ इस तरह सर्वत्र सन्देह-विपर्यय होने लगेंगे । फलतः प्रामाण्य में अविश्वास हो जायगा । समर्थन—तीन या चार भेदों का ग्रहण होता है । भेद-परम्परा का ग्रहण नहीं होता । खण्डन—ऐसा मानने पर जिस भेद का ग्रहण न हुआ, उसका स्वाश्रय से अभेद होने पर मूलपर्यन्त अभेद हो जाने से भेद का अत्यन्त अभाव हो जायगा ।
४८४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
जिज्ञासायां तस्य तस्यापि ज्ञेयत्वे तद्बुद्धीनां भेदबुद्धित्वात् तदर्थेष्वनुगतत्व- स्याप्यनुपपत्त्या तेष्वेकजात्याद्यभ्युपगमे तद्भेदेऽपि तदङ्गीकारे परस्पराश्रयाश्रयि- भावप्रसङ्गात् । एवं सत्तादीनामानन्त्यस्वीकारे द्रष्टव्यम् । किञ्च घटत्वादेर्भेदत्वेऽवधिभूतपटत्वादिसापेक्षप्रतिपत्तिकतायां घटत्ववत् पटत्वस्यापि भेदरूपस्य भेदावधिप्रतिपत्तिसापेक्षतयाऽवधेश्च घटत्वादित्वेन घटत्वादिप्रतीत्यपेक्षायामन्योन्याश्रयत्वप्रसङ्गः । भेदस्वरूपत्वे घटत्वादेरवध्यपेक्षा, न तु स्वरूपमात्रप्रतिपत्तौ । स्वरूपमात्रेण चावधित्वम् तत्कृत एवमिति चेन्न । भेदरूपता यदि तस्य स्वात्मैव तदा
समर्थन—उस काल में किन्हीं भेदों का ज्ञान न होने पर भी जिज्ञासा होने पर क्रमशः भेदों का ज्ञान होता ही है। भाव यह है कि जो कभी भी उपलब्ध नहीं होता, वह असत् होता है । अनन्त भेद नियमतः उपलब्ध नहीं होते, ऐसी बात नहीं । किन्तु जब यद्विषयक जिज्ञासा हो, तब वह भेद प्रतीत होता है, ऐसा नियम मानेंगे । एवञ्च भेद का भान हो जाने से मूलपर्यन्त अभेद नहीं होगा। खण्डन—उन सब भेद- बुद्धियों के भेदबुद्धि होने से उनके विषय भेदों में अनुगत एक धर्म न मानने पर एकाकार बुद्धि न होगी । अतः एक धर्म या जाति अवश्य माननी होगी । फिर उस जाति में भी भेद मानेंगे और उस भेद में उस जाति को मानेंगे—इस तरह परस्पर भेद और जाति में आधाराधेयभाव हो जायगा । इसी प्रकार सत्ता में सत्ता मानने में अनवस्था तथा उन सत्ताओं के क्रमशः ज्ञेयत्व में प्रतीति का अपर्यवसान और युगपद् ज्ञेयत्व में सत्ताज्ञान में प्रामाण्य का अविश्वास आदि दोषों को जानना चाहिए । किंच—यदि घटत्वादि को भेदरूप मानें, तो पटत्वादि का ज्ञान घटत्वादिरूप जो अवधि उसकी अपेक्षा से होगा। एवञ्च घटत्व के तुल्य पटत्व भी भेदरूप होने से उसका ज्ञान भी पटत्वरूप अवधि के ज्ञान की अपेक्षा से होगा । अतः भेदरूप होने से पटत्वादि अवधि को घटत्वादिरूप से घटत्वादि की अपेक्षा होने से अन्योन्या- श्रय हो जायगा । समर्थन—घटत्वादि को जिस काल में भेदरूप मानते हैं, उस काल में अवधि की प्रतीति की अपेक्षा होती है । स्वरूपतः घटत्वादि अवधि में सापेक्ष नहीं हैं और स्वरूप से ही अवधि है, अतः अन्योन्याश्रय नहीं है । खण्डन—घटत्व का स्वरूप ही भेद है, तो यह कथन कि 'स्वरूपमात्र की प्रतिपत्ति के काल में अवधि की अपेक्षा नहीं
परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४८५ स्वरूपमात्रप्रतिपत्तौ नावध्यपेक्षेति शून्यं वचनम् । अथ धर्मान्तरं तदा स एव भेदोऽस्तु, कृतं तद्वत्तया घटत्वादेर्भेदरूपतेति प्रक्रियाकल्पनया । अस्तु स एव धर्मान्तरं भेद इति चेन्न । दूष्यत्वात् । अथापि स्वरूपादित्रयमिदं भेद इति कथं सङ्गच्छते, तद्व्यवहारस्यैकाकारस्य नानानिमित्तत्वे गोत्वाद्यनुगताकारप्रतीतेरपि कथमेकनिमित्तत्वसिद्धौ प्रामाण्यं व्यभिचारात् । सामान्यविशेषैरेव परसामान्यबुद्धिव्यवहारोपपत्तौ तत्कल्पनानुपपत्तेः । किञ्च भेदे भेदान्तरमस्ति न वा ? आद्येऽनवस्था । द्वितीये तदभाव एव स्यात्, धर्मिण्येव तत्प्रवेशात् । भेदस्वभावत्वात् स्वात्मन्यपि स्वयमेव तद्व्यवहारमयं करोति, सत्तेव सद्- व्यवहारमिति चेन्न । यदि स्वस्मादभिन्नः स्वस्य भेद इति स्वस्मादित्यवधेयावधि- होती' युक्ति से शून्य है । यदि 'घटत्वादिनिष्ठ अन्य धर्म ही भेद है, घटत्वादि रूप भेद नहीं है' ऐसा कहें, तो उसी धर्म को भेद मानिये । उस धर्म के होने से घटत्वादि भेदरूप हैं' इस प्रक्रिया की कल्पना व्यर्थ है । वही धर्म भेद है, यह नहीं कह सकते, क्योंकि अन्योन्याश्रय दोष होने से वह दूषित है । जबतक तीनों में अनुगतभेदत्वरूप अनुगत धर्म न मानें, तबतक स्वरूप, वैधर्म्य और अन्योन्याभाव यथास्थान तीनों भेद हैं— यह कथन नहीं जँचता । यदि इन तीनों में अनुगत एकरूप न होने पर भी एकाकार व्यवहार मान लें, तो अनुगत गोत्वादि न होने पर भी 'गौः' इत्याकारक गोमात्र में एकाकार व्यवहार हो जाने से गोत्वादि जातियों का स्वीकार भी व्यर्थ है । इसी प्रकार गोत्व, अश्वत्व आदि अपर जातियों से 'द्रव्यम्' इत्याकारक अनुगत प्रतीति का निर्वाह हो जाने से द्रव्यत्वरूप परजाति का तथा द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्वरूप अपर सामान्य से 'सन्' इत्याकारक अनुगत प्रतीति हो जाने से भेद का सत्तारूप पर सामान्य का स्वीकार व्यर्थ हो जायगा । किंच— भेद में अन्य भेद रहता है या नहीं ? यदि रहता है, तो अनवस्था हो जायगी । यदि नहीं रहता तो उसका धर्म के साथ भेद न होने से धर्मी में प्रवेश होने से भेद का अभाव हो जायगा । समर्थन—भेद में भेद न होने पर भी स्वभाव से ही भेद अपने में भेद-व्यवहार कर लेता है । जैसे सत्ता में सत्ता के न होने पर 'सत्ता अस्ति' ऐसा व्यवहार होता है । खंडन—यदि ऐसा मानें, तो 'स्वस्मात् अभिन्नः स्वस्य भेदः' इस प्रतीति
४८६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ भावस्वरूपः स्वयम्, भेदोऽन्यस्माच्च स्वस्य, तदाऽस्य भेदस्य स्वात्मप्रतियोगिक- त्वेन स्वाश्रयत्वेन चाङ्गीकारे स्वस्मादपि स्वयं भिन्नः किं नाङ्गीक्रियते, विरोधाभावात् । स्वीक्रियेताप्येवं यदि तथा प्रतीतिर्व्यवहारो वा स्यादिति चेन्न । अस्त्यपि शब्दाभासादेस्तथा प्रतीतिराभासशब्दव्यवहारश्च । सत्यौ प्रतीतिव्यवहारौ स्वीकारकारणम् । न च तौ स्वात्मन एव स्वस्माद् भेद- विषयौ स्त इति चेन्न । स्वात्मा स्वस्यैवाधिकरणमवधिश्चेत्यपि तर्हि न सत्या प्रतीतिः सम्भवति, न वा व्यवहारः । तत्कथमित्थमङ्गीकुरुषे ? ननु न वयं स्वात्मा स्वाधिकरणं स्वावधिर्वेत्यभ्युपगच्छामः ; किन्तु धर्मा- न्तरे तत्प्रतियोगिके तदाधारे वा स्वीकृते यौ बुद्धिव्यवहारावुपपद्येते तावनवस्था- भयाद्धर्मान्तरमन्तरेणैव स्वभावाद्भेदः करोतीति ब्रूम इति चेत् । तर्ह्यन्यत्र यादृशी के अनुरोध से वही भेद स्व का प्रतियोगी और स्व का आश्रय ( अवधि ) भी हुआ । यदि घटादि से स्व का भेद स्वस्वरूप मान लिया जाय, तो भेद के स्वप्रतियोगिक और स्वाश्रय मानने से 'स्वस्मादपि स्वयं भिन्नः' ऐसी प्रतीति होने लगेगी, कारण इसमें कोई विरोध नहीं रहा । समर्थन--ऐसा स्वीकार करते, यदि स्व से स्व में भेदावगाही व्यवहार या बुद्धि होती । किन्तु वैसा व्यवहार या बुद्धि नहीं होती । अतः स्व से स्व में भेद नहीं मानते । खंडन--शब्दाभासरूप व्यवहार तथा शब्दाभास से स्व से स्व में भेदबुद्धि भी होती ही है । समर्थन--सत्य व्यवहार तथा सत्य बुद्धि उक्त स्वीकार के कारण मानेंगे । स्व से स्व में भेदावगाही सत्यबुद्धि या सत्य व्यवहार नहीं होता । अतः स्व से स्व में भेद सत्य सिद्ध नहीं होता । खण्डन--तब तो भेद स्वयं स्व का अधिकरण है और स्व का प्रतियोगी है ऐसी सत्य प्रतीति या सत्य व्यवहार नहीं होता । फिर आप भेद को स्व ( भेद ) का अधिकरण तथा प्रतियोगी कैसे मानते हैं ? समर्थन--'भेद स्व ( भेद ) का अधिकरण और प्रतियोगी है' ऐसा हम नहीं मानते । किन्तु यदि भेद में अन्य भेद को मान लें, तो उसमें जैसे भेदप्रतियोगिकत्व तथा भेदाश्रयत्व का व्यवहार या बुद्धि होती है, वैसे ही अनवस्था के भय से स्व में अन्य भेद को न मानकर भेद स्वभाव से ही भेद-व्यवहार करता है, ऐसा हम कहते हैं ।
परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४८७
प्रतीतिर्धर्मान्तरविषया तादृश्येवात्र विना धर्मान्तरमुत्पद्यत इति भ्रान्ता स्यात् । यस्य च स्वभावस्य वलेनेदृशी सा जायते स दोषः स्यात् । यथा सत्यरजते रजतप्रतीतो रजतत्वादुत्पन्नाऽन्यत्र विना रजतत्वं जायमाना भ्रान्ता सा भवति, यस्य च सामर्थ्यात् सा तादृशी जायते स दोष इत्युच्यते । तत्र रजतत्वं नास्ति, अत्र धर्मिरूपोऽपि भेद एव सन्नवलम्बनमिति चेत् । मैवम् ; भिन्नप्रतीतिर्विशिष्टविषया भेदतदाश्रयरूपोभयवस्तुविषया अन्यत्र यादृशी सत्याऽङ्गीकृता ततो मात्रयाऽप्यन्यूनाथांया इह जायमानाया यदि द्वयं विषयं नाङ्गीकुरुषे, तदा शक्रेणापि भ्रान्तत्वं दुर्वारम् । अथाङ्गीकुरुषे, तदाऽनवस्थाप्रसङ्गः । अथ तदुभयविषयव्यतिरेकेणैव साऽत्र सत्याऽन्यत्र, तर्हि इतोऽन्यादृशविषया मिथ्या स्यादित्यलं पल्लवेन । यत्तु सत्तेवेत्युक्तम् ; तत् कटकर्गवोदाहरणमनुहरति, यतः सत्ताऽप्यमुना दूषणेनास्माभिः खण्डनीया । खंडन—तब तो भेदविषयक बुद्धि जैसे यहाँ होती है, वैसे ही भेद के बिना अन्य स्थल में भी हो जायगी। अतः वह बुद्धि भ्रम और जिस स्वभाव के बल से वैसी होती है, वह स्वभाव दोष कहलायेगा । जैसे सत्यरजत स्थल में रजतत्व के होने से रजतत्व- बुद्धि होती है, वैसे ही यदि अन्यत्र रजतत्व के बिना रजतत्व-बुद्धि भ्रम कहलाती है और जिसके बल से वह होती है, वह दोष कहलाता है । समर्थन—वहाँ रजत नहीं है और यहाँ तो धर्मिरूप भेद विद्यमान ही अवलम्ब है, अतः दोनों स्थलों में महान् अन्तर है । खण्डन—भेद और भेदाश्रय को विषय करनेवाली विशिष्टविषयक भिन्न बुद्धि अन्यत्र जैसे सत्य होती है, उससे किञ्चित् अन्यून विषयवाली यहाँ जायमान बुद्धि का विषय दोनों को न मानें, तो इन्द्र भी उस बुद्धि के भ्रान्तत्व का निवारण नहीं कर सकता । यदि दोनों को विषय मान लें, तो अनवस्था हो जायगी । यहाँ उभय के विषय न होने पर भी यदि उक्त बुद्धि को सत्य मानें, तो अन्यत्र जहां उभय विषय हैं, वहाँ वह बुद्धि मिथ्या हो जायगी । बस, इतना ही खण्डन पर्याप्त है, विस्तार व्यर्थ है । फिर, आप जिस सत्ता का दृष्टान्त देते हैं, वह दृष्टान्त भी इसी युक्ति से खण्डित होने से शिविर की गौके सादृश्य का अनुकरण करता है । अर्थात् जैसे शिविर में बन्धन से रहित उन्मत्त वृषभ जहाँ-जहाँ दौड़ता हुआ जाता है, वहीं पीटा जाता है, वैसे ही यहाँ भी सत्ता को खण्डित ही जानिये ।
४८८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
यत्पुनरभिधीयते किमेतैर्भेदखण्डनवादिभिरभिहितं भवति — किं भेदज्ञानमेव नास्ति, सदपि नित्यम्, अनित्यमपि वा निर्हेतुकम्, सहेतुकमपि वा निर्वि- षयम्, सविषयमपि वा बाध्यमानविषयम् ? तत्र प्रथमः सर्वतो विरोधादनुत्तरः । द्वितीयः सुषुप्त्यवस्थानुरोधादुपेक्षणीयः । तृतीयोऽपि विरोद्धाद्धेयः । चतुर्थस्तु भेदोल्लेखादेव त्याज्यः । पञ्चमश्चिन्त्यते । किमेतेष्वन्यतमो विषयः तदन्यो वा ? द्वितीये किमेताभि- र्व्यधिकरणाानुपपत्तिभिस्तस्य बाध्यते । एवं हि चौरापराधेन व्यक्तमयं माण्डव्य- निग्रहः । अथान्यतमात्मा, तत्रापि यदि धर्मान्तरमेवेति तत्त्वं तदाऽनवस्थाभिया तदधिकः प्रवाहस्त्यज्यताम् । तस्य कुतस्त्यागः, न ह्यनवस्था प्रतिभासमानमर्थं
समर्थन —उदयनाचार्य कहते हैं कि भेद का खण्डन करनेवाले का क्या अभि- प्राय है ? क्या भेद का ज्ञान ही नहीं होता या भेद का ज्ञान तो होता है, पर वह नित्य है, अथवा अनित्य होता हुआ भी हेतु से रहित है, किंवा सहेतुक होकर भी विषय से रहित है, या सविषय होता हुआ भी बाधित-विषयक है ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारण यदि भेद-ज्ञान नहीं है, तो आपका भेद-खण्डन तथा 'भेदो नास्ति' इत्यादि सभी प्रयोग असङ्गत हो जायेंगे । द्वितीय भी सुषुप्ति-अवस्था के अनुरोध से त्याज्य है । अर्थात् जिस अवस्था में ज्ञान न हो, वह अवस्था सुषुप्ति है । सुषुप्ति अनुभवसिद्ध है, अतः उसके अनुरोध से ज्ञान अनित्य है । 'अनित्य निश्चय ही हेतुजन्य होता है' इस अनुभव से विरोध होने के कारण तृतीय पक्ष भी हेय है । भेदरूप विषय का उल्लेख अनुभव सिद्ध है, अतः चतुर्थ पक्ष भी त्याज्य है । 'भेदज्ञान सविषय होता है, परन्तु बाधित-विषय है' यह पञ्चम पक्ष अवश्य विचारणीय है । क्या भेदज्ञान का विषय स्वरूप, अन्योन्याभाव या वैधर्म्य इन तीनों में से कोई एक है या इनसे अन्य ? यदि इनसे अन्य विषय है, तो इन स्वरूपादि के खण्डन की युक्तियों से उसका खण्डन क्या हुआ ? ऐसा करने पर स्पष्ट ही यह चोर के अपराध में माण्डव्य को ही दण्ड हुआ¹। यदि स्वरूपादि में से एक को विषय मानें, तो उसमें धर्मान्तर (वैधर्म्य) को मानें तो अनवस्था-भय से उस प्रथम वैधर्म्य से अधिक वैधर्म्य-परम्परा का त्याग कीजिये, उस प्रथम वैधर्म्य का त्याग कैसे होगा; कारण
१. पुराणों में यह कथा प्रसिद्ध है कि माण्डव्य मुनि चोर न होते हुए भी उन्हें चोर मानकर शूली पर चढ़ा दिया गया ।
परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४८६ निवर्तयति, किन्तु प्रवाहं परिहारयति गन्धे गन्धान्तरवत् । अथेतरेतराभावमेव भेदज्ञानमालम्बते तदाऽपि काऽऽत्माश्रयः, तेन हि भेदज्ञानमेव न स्यात् । अस्ति च तत्, ततो हेत्वन्तरमाक्षिपेत् , न तु स्वात्मनि स्वयमहेतुत्वे स्वयमेव निवर्तेत । अविद्यावशादिति चेत् ; किञ्चातः ? न ह्यविद्येत्येव आत्माश्रयनिवृत्तिः; तथा सति घटादयोऽपि कुलालादिनिरपेक्षाः स्वयमेव भवेयुः । अथाऽऽत्माश्रयादिदोषोपहततया तन्न तस्यैव कारणम् । अतो यतः कुतश्चि- त्तस्य जन्म, तच्च दुर्निरूपमतोऽविद्येत्युच्यत इति विचारार्थः ; नाम्नि तर्हि विवादः । न च तदपि दुर्निरूपम् , प्रतियोगित्वेन अप्रतीतावधिकरणस्वभावत्वेन अधि- करणप्रतीतिः, अधिकरणस्वभावत्वेनास्मृतौ प्रतियोगिस्मृतिश्च इतरेतराभावग्रहण- कारणमिति निरूपणात् । अनवस्था अनुभव के विषय अर्थ की निवृत्ति नहीं कराती, किन्तु प्रवाह रुकवाती है, जैसे कि गन्ध में अन्य गन्ध का । फिर यदि भेदज्ञान अन्योन्याभावरूप भेद का अवलम्बन करे, तब भी आत्माश्रय कहाँ है ? यदि आत्माश्रय हो, तो भेदज्ञान ही नहीं होगा । किन्तु भेदज्ञान होता है, अतः वह स्व से अन्य हेतु की कल्पना करेगा, कारण स्व में स्वयं हेतु न होने से स्वयं निवृत्त नहीं होता । यदि कहें कि अविद्या से भेद-ज्ञान होता है, तो वह भी ठीक नहीं । कारण अविद्या से क्या होता है ? अविद्या से ही आत्माश्रय की निवृत्ति तो होगी नहीं । कारण यदि अविद्या से आत्माश्रय की निवृत्ति होती हो, तो घटादि भी कुलालादि की अपेक्षा के बिना स्वतः अविद्या से ही उत्पन्न होने लगेंगे । फिर कुलालादि को घटादि का कारण क्यों माना जाय ? यदि कहें कि 'आत्माश्रय दोष होने से घट स्वयं अपना ही कारण नहीं होता, किन्तु अन्य किसीसे जन्य होता है । उस कारण का निरूपण अशक्य है, अतः उसे अविद्या कहते हैं—यही हमारे कथन का आशय है' तब तो केवल दोनों के नामों में ही विवाद रहा । भेद-प्रतीति के कारण को आप 'अविद्या' कहते हैं, तो हम नामान्तर से कहते हैं । फिर, उसके कारण का निरूपण भी अशक्य नहीं है, कारण प्रतियोगित्वरूप से प्रतियोगी के अप्रतीति-काल में अधिकरणत्वरूप से अधिकरण का ज्ञान तथा अधिकरण- ६२
४६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ ... अथ स्वरूपमेव भेदप्रतिभासस्य विषय इति तत्त्वम्; तथापि सहप्रयोग एवानुपपन्नः परिहीयताम्, भेदेन तु किमपराद्धम् ? सोऽपि दृश्यत इति चेत् । सत्यम्; नैमित्तिकस्तु स्यात्, न स्वरूपतः । न हि 'घटमानय, पटमवलोकय' इत्यादौ भेदपदमपि प्रेक्षावानुपादत्ते । व्याख्यायान्तु मूढप्रबोधनार्थं 'घटः कुम्भः' इतिवत् सहप्रयोगेऽपि न दोषः । तथापि कः परमार्थः ? यथायथं त्रयमपि । घटस्य हि घटाद्यात्मना प्रतीतिः, अपटाद्यात्मना च प्रतीतिः, ततो वैशिष्ट्यप्रतीतिश्चेत्यनुभवसिद्धम् । तत्राभावस्य प्रथममात्रम्, अभावान्तरधर्मान्तराभावात् । सामान्यादिषु त्रिषु द्वयम्, धर्मान्तराभावात् । द्रव्यादित्रिषु त्रयम्, त्रयस्यापि सम्भवात् । भवति हि 'पटोऽयं न घटः, तन्तुमयश्चे'ति, 'गन्धोऽयं न रूपं सुरभिश्चे'ति, 'गतिरियं नोत्क्षेपणं तिर्यक् चे'ति । स्वरूप से अधिकरण के अज्ञानकाल में प्रतियोगी की स्मृति अन्योन्याभाव के ग्रहण की कारण है, इस तरह निरूपण हो ही सकता है । फिर, स्वरूपरूप भेद को ही भेद-ज्ञान का विषय मान लीजिये । इससे 'घटो भिन्नः' यह सहप्रयोग अनुपपन्न होता हो, तो उसे ही त्यागिये; भेद का क्या अपराध है कि उसका त्याग हो ? यदि कहें कि 'घटो भिन्नः' ऐसा सहप्रयोग भी देखा जाता है, अतः उसका त्याग नहीं हो सकता; तो ठीक है । सहप्रयोग दीखता है, किन्तु स्वभाव से नहीं, किसी निमित्त से । कारण 'घटमानय, पटमवलोकय' इत्यादि प्रयोगस्थलों में कोई भी बुद्धिमान् 'भिन्नं घटमानय' ऐसा प्रायः नहीं कहता । कहीं-कहीं व्याख्यान-काल में मूढ़ों को समझाने के लिए 'घटः कुम्भः' की तरह 'घटः भिन्नः' ऐसा जो सहप्रयोग होता है, वह दोषाधायक नहीं है । प्रश्न—तब भी इन स्वरूपादि त्रय में मुख्यार्थ कौन है ? उत्तर—यथास्थान तीनों ही ठीक हैं । घट की घट, मृत्कार्य आदि रूप से प्रतीति होती है, अपटादिरूप से प्रतीति होती है तथा उस पट से वैधर्म्यरूप धर्म से भी प्रतीति होती है, यह अनुभव- सिद्ध है । उन तीनों में से प्रथम (स्वरूपभेद) अभावमात्र में रहता है, कारण अभाव में अन्य अभाव या गुण, जाति आदि अन्य धर्म नहीं रहते । सामान्य, विशेष और समवाय इन तीनों में स्वरूपभेद और इतरेतराभाव दोनों रहते हैं । कारण इनमें अन्य धर्म नहीं रहते । द्रव्य, गुण और कर्म तीनों में तीनों अभाव रहते हैं, कारण तीनों का सम्भव है । 'यह
परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४६१ लक्षणन्तु स्वरूपभेदस्य ताद्रूप्येणाप्रतीतौ प्रतीतिः। इतरेतराभावस्य त्वबाधितः समानाधिकरणो निषेधप्रत्ययः। वैधर्म्यस्य तु विरोधः, स चैकधर्मसमावेश इत्येषा दिगिति। अत्रोच्यते। तथाहि यत्तावत् पृष्टं किमेतेष्वन्यतमात्माऽस्य विषयः तदन्यो वेति तन्निर्वचनवादिनि शोभते, नास्मासु। प्रतिभासमानोऽयं भेदः स्वरूपादि- पक्षान्तर्भावानन्तर्भावाभ्यां वा सदसत्त्वाभ्यां वा अन्येनापि धर्मेण येन केनचिन्निरू- प्यमानोऽन्वयेन च व्यतिरेकेण वा बाध्यतामिति तेन सर्वेणानिर्वचनीय इति ब्रूमः। एतच्च न केवलं भेदस्यापि, तर्हि जगत एव। अनिर्वचनीयवादश्चायं यथा तथोदितं प्राक्। यदप्युक्तम् अथान्यतमेत्यादि गन्धे गन्धान्तरवदित्यन्तम्। तदपि न साधु; यया युक्त्यैकस्वीकारस्तयैव प्रवाहस्वीकारस्य दुर्वारत्वात्। तत्र यदि प्रवाह- 'पट है, घट नहीं है, तन्तुमय है', 'यह गन्ध है, रूप नहीं, सुरभि है'—'यह गति है, उत्क्षेपण नहीं है, तिर्यक् है' ऐसी प्रतीतियाँ होती हैं। 'तादात्म्य के प्रतियोगित्वरूप से अप्रतीति-काल में जो प्रतीति हो, उसका विषय' स्वरूपभेद का लक्षण है। 'समानाधिकरण और अबाधित निषेधप्रत्यय' इतरेतराभाव का लक्षण है। विरोध ही वैधर्म्य का लक्षण है। यह विरोध एकधर्मी में असमावेश है। भेद-समर्थन की यह दिक् ( संकेतमात्र ) है। खण्डन—अब समाधान करते हैं। श्रवण कीजिये, जो आपने यह प्रश्न किया है कि 'भेद-प्रतीति का विषय भेद स्वरूपादि रूप है या अन्यरूप ? यह निर्वचन- वादी के लिए ही फबता है, हम अनिर्वचनवादी के लिए नहीं। "प्रति- भासमान भी यह भेद स्वरूपादि तीनों पक्षों में अन्तर्भाव-अनन्तर्भाव से, सत्त्व-असत्त्व से या अन्य किसी धर्म से निरूपित होने पर अन्वय या व्यतिरेक से बाधित होता है, अतः उन सभी रूपों से वह अनिर्वचनीय है"—यही हम कहते हैं। हमारे मत से यह अनिर्वचनीयत्व केवल भेद का ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण जगत् का ही है। यह अनिर्वचनीयतावाद जिस प्रकार सिद्ध होता है, वह पीछे कह ही आये हैं। जो आपने 'अथ अन्यतमेत्यादि' से 'गन्धे गन्धान्तरवत्' तक कहा है, वह ठीक नहीं है। कारण जिस भेदप्रतीति की अन्यथानुपपत्तिरूप युक्ति से एक का स्वीकार आप करते हैं, उसी युक्ति से प्रवाह का भी स्वीकार करना होगा। यदि भेद-प्रतीति
४६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ स्वीकारे तस्या असाधकत्वं स्वीक्रियते, एकस्वीकारेऽपि स्यात्, अविशिष्ट- लक्षणत्वात् । अत एव प्रतिभासमानत्वादेकस्वीकार इत्यप्ययुक्तम् । एकप्रतिभासिकाया युक्तेः सर्वसाधारण्यात् । न हि प्रत्यक्षादेव जायमानः प्रतिभासः प्रमाणं नानुमानादेरित्यत्र युक्तिरभ्युपगमो वा ? न चानवस्थाप्रसञ्जिका युक्तिरनुमानादेरन्या नाम । तर्कस्यापि व्याप्तिमूलत्वम्, सर्वश्वानुमानच्छायामापद्य दूषणमपि प्रवर्तत इति भवतैव व्युत्पादनात् । अतोऽनवस्थाप्रसञ्जिकाया युक्तेर्दोषो वा वक्तव्यः, त्यक्तव्यो वा स्वपक्षः । प्रवाहस्वीकारवदेकस्वीकारे नानवस्थेति चेत्; तत्किमनवस्थाभावविशिष्टा यास्तस्या युक्तेः साधकत्वं मन्यसे ? एवं तर्हि द्वितीयमात्रस्वीकारे नानवस्थेति की अन्यथानुपपत्तिरूप युक्ति भेदप्रवाह की असाधक (आभास) हो, तो वह एक की भी साधक नहीं होगी। कारण भेद-प्रतीति की अन्यथानुपपत्ति जैसे एक में है, वैसे ही प्रवाह में भी है; दोनों स्थलों की युक्ति में कोई भेद नहीं है। समर्थन—प्राथमिक भेद में युक्ति नहीं, प्रत्युत 'घटः पटो न' यह प्रत्यक्ष-प्रमाण है। प्रवाह में ऐसा प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, अतः उसका स्वीकार नहीं किया जा सकता। खण्डन—उस प्रत्यक्ष को आभास माननेवाले को आपको युक्ति अवश्य देनी होगी। वह युक्ति सर्वसाधारण है, अर्थात् प्रवाह की भी साधक है। समर्थन—द्विती- यादि भेदगोचर प्रत्यक्ष में आभासता का सन्देह भी नहीं होगा। खण्डन—केवल प्रत्यक्ष से जायमान प्रतिभास ही प्रमाण है, अनुमानादि से जायमान प्रतिभास प्रमाण नहीं; इसमें आप कोई युक्ति या वचन प्रमाण नहीं दे सकते। समर्थन—भेद-प्रवाह में भी कोई युक्ति नहीं है। यदि कोई अनवस्था की प्रसंजिका युक्ति भी हो तो वह अनुमान है, इसमें प्रमाण नहीं है। खंडन—यदि भेद में अन्य भेद न हो, तो वह प्राप्त भेद भी स्वाश्रय से अभिन्न होकर नष्ट हो जायगा, यह अभेद-प्रवाह के स्वीकार की साधक युक्ति भी अनुमानरूप ही है। समर्थन—यह युक्ति तर्करूप है, अनुमानरूप नहीं। खंडन—तर्क का मूल भी व्याप्ति ही है, अतः तर्क भी प्रमा का जनक है तथा उसका पर्यवसान विपर्यय में ही होता है और वह विपर्यय-पर्यवसान अनुमानरूप ही है। अनवस्था आदि सभी दूषण
परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४६३ द्वितीयस्वीकारप्रसङ्गः । ओमिति चेत् ; परार्धपर्यन्तं प्रवाहस्वीकारं को वारयिता ? नैतावन्मात्रेण तुष्यति भवान्, परार्धादप्यधिकमेकादिकं किं नाभ्युपगम्यत इत्यपि भवता वक्तव्यमेव । तथाच सैवानवस्थेति चेत् ; सत्यं तस्यास्तु भयात् कीदृशमभ्युपगम्यतामिति निपुणं मन्त्रयामहे । द्वचादिकं परित्यज्यतामिति चेत् ; एकस्मिन्नाम कीदृशोऽनुग्रहः, येनान- वस्थाप्रवाहनिवेशविशेषेऽपि द्वयादिकमुपेक्षितम्, एकं तु रक्षितम् ? द्वितीयमादा- यानवस्थेति चेत् ; द्वितीयेऽपि यदि भवतोऽनुग्रहः स्यात् , 'तृतीयमादायानवस्थे'- अनुमान की छाया से युक्त होकर ही प्रवृत्त होते हैं, यह आपने ही कहा है । अतः अनवस्था-प्रसञ्जक युक्ति में दोष कहिये या प्रवाह के तुल्य एक का भी स्वीकार न करिये । समर्थन—प्रवाह के स्वीकार के तुल्य एक के स्वीकार में अनवस्था नहीं है, अतः एक का स्वीकार करते हैं। खण्डन—तो क्या अनवस्था के अभाव से विशिष्ट भेद-प्रतीति की अन्यथानुपपत्तिरूप युक्ति भेद की साधक है, ऐसा मानते हैं, तब तो केवल द्वितीय के स्वीकार में भी अनवस्था नहीं है। अतः द्वितीय का स्वीकार भी करना चाहिए । यदि आप द्वितीय का भी स्वीकार कर लें, तो इसी तरह तृतीय-चतुर्थ के स्वीकार में भी अनवस्था के न होने से तृतीय-चतुर्थ का भी स्वीकार करेंगे। फिर इसी प्रकार परार्धपर्यन्त के स्वीकार का वारण कौन कर सकेगा ? किञ्च—यदि परार्धपर्यन्त से ही आपको संतोष न हुआ, तो परार्ध से अधिक का भी आप स्वीकार क्यों नहीं करेंगे, यह भी आपको कहना चाहिए । यदि कहें कि ऐसा मानने में वही अनवस्था होगी, अतः ऐसा नहीं मानते, तो सत्य है । किन्तु उस अनवस्था के भय से कैसा मानना चाहिए, इसी बात को हम दोनों भलीभाँति विचारें । समर्थन—अनवस्था के भय से द्वितीय आदि को ही छोड़ दीजिये । खंडन— एक के प्रति ही आपका यह कैसा अनुराग है, जिससे अनवस्था के प्रवाह-निवेश में विशेष न होने पर भी द्वितीय आदि की उपेक्षा और एक की रक्षा करते हैं ? समर्थन—प्रथममात्र के स्वीकार में अनवस्था नहीं है और द्वितीय आदि के स्वीकार में अनवस्था है । खण्डन—इसी तरह यदि द्वितीय पर भी आपका अनुग्रह हो, तो 'तृतीय के स्वीकार में अनवस्था है' ऐसा कहकर आप द्वितीय की भी रक्षा
त्यभिधाय सोऽपि रञ्जितः स्यात् । तावेतौ भवतो रागद्वेषौ निःश्रेयसाय यतमानस्य मानसमास्कन्दमानौ न कल्याणोदर्कौ तर्कयामि । गन्धे गन्धान्तरप्रसञ्जिका न च युक्तिरस्ति । तदस्तित्वे वा का नो हानिः, तस्या अप्यस्माभिः खण्डनीयत्वात् । यदपि अथेतेरे'त्यादि 'निरूपणादि'त्यन्तम् । तदप्ययुक्तम् ; तथाहि— इतरेतराभावज्ञानं भेदव्यवहारहेतुं मन्यते यस्तस्य पक्षो नोपपन्न आत्माश्रय- प्रसङ्गादित्येवं ब्रुवाणस्य न किञ्चिद् बाधकमुक्तं स्यात् । प्रतियोगिरूपत्वेनेत्यादि समाधानं च प्रागेव दूषितम् । अथ 'स्वरूपमेवे'त्यादि 'न दोषः' इत्यन्तं यदुक्तम्; तदप्यस्मदनुक्तदोष- दूषणमित्युपेक्षितम् । करेंगे। मोक्ष के लिए यत्नशील आपके लिए ये पूर्वोक्त राग-द्वेष कल्याणकारी नहीं हैं, ऐसा हमारा अनुमान है । फिर, आपने जो यह दृष्टान्त दिया कि 'अनवस्था से जैसे गन्ध में अन्य गन्ध नहीं होता' इत्यादि, सो भी युक्त नहीं है । कारण गन्ध में अन्य गन्ध की साधक कोई युक्ति नहीं है । यदि युक्ति हो, तो उसे मानने में हानि ही क्या है ? इस प्रकार अनवस्था के भय से गन्ध में गन्ध के तुल्य प्रथम गन्ध भी सिद्ध नहीं होगा—यह दोष अनिर्वचनवादी को आप दे नहीं सकते । कारण इसी अनवस्थारूप युक्ति से प्रथम गन्ध का भी हम खण्डन करते ही हैं । आपने 'इतरेतराभाव' आदि से 'निरूपणात्' तक जो कुछ कहा, वह भी अयुक्त है । देखिये—'इतरेतराभाव भेद-व्यवहार का हेतु है' ऐसा कहनेवाले का पक्ष आत्माश्रय होने से अयुक्त है, इस कथन पर आपने कोई बाधक युक्ति तो दी नहीं । 'प्रतियोगित्वरूप से प्रतियोगी के अस्मृतिकाल में अधिकरणत्वरूप से अधिकरण की प्रतीति तथा अधिकरणत्वरूप से अधिकरण की अप्रतीति-काल में प्रतियोगित्वरूप से प्रतियोगी की स्मृति, भेदज्ञान में कारण है, अतः आत्माश्रय नहीं है,' इस युक्ति का खण्डन तो हम पहले ही कर आये हैं । अर्थात् निषेध्य-निषेध का सांकर्य हो जायगा, यह सब कह ही आये हैं । 'अथ स्वरूप एव' इत्यादि से 'न दोषः' यहाँ तक जो कहा है, वह भी हमारे द्वारा अनुक्त दोष का दूषण (खण्डन) है । अतः हम उसकी उपेक्षा करते हैं ।
परिच्छेद ] भेद लक्षण का खण्डन ४६५ यदपि 'तथाऽपि क' इत्यादि 'तिर्यक् चे'त्यन्तम्; तदपि गर्तवर्तिगोधामसांस- विभजनन्यायमनुहरति । पक्षत्रयस्याऽप्युक्तयुक्त्या आच्छादितस्य दर्शयितुम- शक्यत्वेन तद्विभागव्यवस्थितेरनवसरनिरस्तत्वात् । यच्च स्वरूपभेदस्य लक्षणमुक्तम्—ताद्रूप्येणाप्रतीतौ प्रतीतिरिति । तदप्य- वद्यम्; यदेकमेव वस्तु भ्रान्त्या भिन्नमिति प्रतीयते, तत्र ताद्रूप्येणैकस्यैकरूपतया प्रतीतिर्नास्ति । अस्ति च प्रतीतिः, न च स्वरूपभेद इत्यतिव्याप्तिः । ताद्रूप्येणेत्यस्य धर्मान्तररूपभेदासङ्कीर्णोदाहरणार्थत्वात् प्रतीतिरभ्रान्ता विवक्षितेति चेत्; स्वरूपप्रतीतेस्तत्राप्यभ्रान्तत्वात् । यच्च स्वरूपमात्रेण प्रतीयते वस्तु, न तत्ताद्रूप्येण, न च नानात्म- तया, वस्तुगत्या चैकमेव तत्, तत्रापि स्वरूपलक्षणो भेदः स्यात् । नास्त्येवेदृशमुदाहरणम्, ताद्रूप्याताद्रूप्याभ्यामेकस्यावश्यं प्रतीतेरिति चेन्न । 'तथापि कः परमार्थः' इत्यादि से 'तिर्यक् च' यहाँ तक जो ग्रन्थ है, वह भी बिल में स्थित गोधा (गिरगिट) का मांस व्याधों द्वारा बाँटने की तरह है । अर्थात् अप्राप्त विषय होने से उसकी तरह भेद का वह विभागीकरण उपहासास्पद है । उक्त युक्तियों से तीनों प्रकार के भेद खण्डित हैं। एवञ्च उन भेदों को आप दिखा नहीं सकते । इसलिए उनके विभाग का खण्डन अवसरप्राप्त नहीं (अप्रासंगिक) है । फिर, स्वरूप-भेद का आपने जो यह लक्षण किया कि 'ताद्रूप्य से अप्रतीति-काल में प्रतीति स्वरूप-भेद है', वह भी सदोष है । देखिये—जो चन्द्र आदि एक वस्तुरूप है, पर भ्रान्ति से दो (भिन्न) प्रतीत होता है, वहाँ ताद्रूप्य (एकरूप) से एक की एक- रूपेण प्रतीति नहीं है, अतः वह स्वरूप-भेद नहीं है। एवञ्च वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'ताद्रूप्य' शब्द 'वैधर्म्य' और 'अन्योन्याभाव' इन दो भेदों से असंकीर्ण उदाहरण के प्रदर्शनार्थ है और लक्षणघटक प्रतीति यथार्थ ही विवक्षित है । अतः वहाँ अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—वहाँ भी स्वरूप की प्रतीति यथार्थ ही है । किञ्च—जो वस्तु स्वरूपमात्र से प्रतीत हो, एकत्वरूप से या नानारूप से प्रतीत न हो, पर वस्तुतः एकरूप ही वह हो, वहाँ भी स्वरूप-भेद हो जायगा । यदि कहें कि ऐसा उदाहरण नहीं है, कारण ताद्रूप्य या अताद्रूप्य दोनों में से एकरूप से अवश्य प्रतीति होती है, तो 'ऐसी प्रतीति नहीं होती' इस कलह का अवकाश ही नहीं है । कारण 'जो तुमने देखा है, वह एक है या अनेक ?' ऐसा प्रश्न
४६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ प्रतीतिकलहानवकाशात् । भवति हि यद्यथा तत्र दृष्टम्, तत् किमेकमनेकं वेत्य- न्युक्तो नायं विशेषो मया शङ्कितो जिज्ञासितो वा । स्वरूपमात्रन्तु प्रतीत्याह- मुदासीनोऽभूवमित्यभिधत्त इति । ननु तदपि स्वरूपं भेद एव कस्मादपि, तत् कथमुक्तदोषावतार इति । मैवम्; एवं हि ताद्रूप्येणाप्रतीताविति व्यर्थं स्यात् । प्रतीतिमात्रं लक्षणं वक्तव्यम् । यत्प्रमेयं तत् कस्मादप्यवश्यं भिन्नमिति एकस्यैव स्वस्माद्भेदप्रसङ्गनिराकरणार्थमपि ताद्रू- प्येणाप्रतीतावित्युक्तम्, तच्च खण्डितमिति । ताद्रूप्यमन्यरूपत्वं विवक्षितमिति चेन्न । तदा हि तदाऽनुपस्थापितपरामर्श- होने पर 'इस विशेष विषय में मुझे न तो शङ्का हुई, न जिज्ञासा, केवल स्वरूप को देखकर ही मैं उदासीन हो गया था' ऐसा उत्तर कहा जाता है । समर्थन—वह भी स्वरूप किसीसे भिन्न ही है, अतः लक्ष्य होने से लक्षण का जाना भूषण ही है। खण्डन — यदि ऐसा है, तो प्रतीतिमात्र को ही लक्षण कहिये । ताद्रूप्य से अप्रतीति विशेषण व्यर्थ है, कारण जो प्रमेय है, वह अवश्य किसीसे भिन्न है, अतः प्रमेयमात्र लक्ष्य ही है। स्व से स्व में भेद-व्यवहार न हो, इसीलिए ताद्रूप्य से अप्रतीति यह विशेषण है, पर वह उक्त दोष से खण्डित ही है। समर्थन—लक्षण-घटक ताद्रूप्य के एकदेश तद्रूपशब्द से स्वरूप-भेद से अन्य का परामर्श होने से 'स्वरूप-भेद से अन्यत्वरूप से अप्रतीति-काल में जो प्रतीति, वह स्वरूपरूप भेद है,' ऐसा कहेंगे। खण्डन— इस लक्षण के घटक 'अन्य' शब्द से यदि स्वरूपभेद का ग्रहण करें, तो स्वरूप-भेद के लक्षण में स्वरूप-भेद का प्रवेश होने से आत्माश्रय हो जायगा। जैसे अन्य शब्द से अनुपस्थापित अन्यत्व का ताद्रूप्यघटक तद्रूपशब्द के परामर्श से आत्माश्रय होता है। लक्षणघटक अन्य स्वरूप-भेद है और लक्ष्य अन्य है, यह भी नहीं कह सकते, कारण स्वरूप-भेदमात्र लक्ष्य है। यदि लक्षण-घटक 'अन्य'-शब्द अन्योन्याभावपरक मानें, तो अन्योन्याभाव से स्वरूप-भेद का और स्वरूपभेद के प्रतियोगिरूप होने से स्वरूपभेद से अन्योन्याभाव का ज्ञान होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा। यदि लक्षण में वैधर्म्यरूप भेद का प्रवेश करें, तो तदन्योन्याभावसमानाधि- करण धर्म ही तद्वैधर्म्य है, अतः अन्योन्याभाव से वैधर्म्य का और वैधर्म्य
यत् अन्यत्वस्यं स्वरूपभेदत्वे आत्माश्रयः, सर्वस्वरूपाणां लक्ष्यत्वात् । अन्यो- न्याभावत्वे चान्योन्याश्रयः, वैधर्म्ये च चक्रकम् । यदपि—इतरेतराभावस्य लक्षणमबाधितः समानाधिकरणो निषेधप्रत्ययः । एतदप्यशोभनम् ; समानाधिकरण इत्यादि भाषायाः कथं कथमपि तात्पर्यं- गवेषणेऽपि समानाधिकरणो यो निषेधस्तत्प्रत्ययविषयोऽन्योन्याभाव इति पर्यवसाने समानाधिकरण इति किं तुल्याश्रयः , उतैकाश्रयः, उत तादात्म्यप्रति- योगिकः, उत अधिकरणभूतपदार्थवाचिशब्दविशेषणविशेष्यभावव्यवस्थितपदा- भिधेयः , उत अन्यदेव ? तत्र न प्रथमः ; तुहिनमयूखे प्रियामुखे च न दूषणकणस्यापि सम्भव इति प्रत्ययस्यापि दर्शनात् । तत्र मुखचन्द्रयोरन्योन्याभावोऽस्तीति चेन्न । तस्य सत्त्वेऽप्युक्तप्रत्ययस्य तदविषयत्वात् । माऽस्तु तद्विषयो लक्षणं त्वस्यैतत्, तच्च तद्विषयत्वेऽप्यदुष्टमिति चेत्; कीदृशं से स्वरूप-भेद का और स्वरूप-भेद से अन्योन्याभाव का निरूपण होने से चक्रक हो जायगा । ‘इतरेतराभाव’ का जो ‘अबाधित और समानाधिकरण निषेधप्रत्यय’ यह लक्षण है, वह भी अशोभन है। ‘समानाधिकरण’ इत्यादि शब्दों के अभिप्राय का किसी प्रकार अन्वेषण करने पर ‘समानाधिकरण जो निषेध, उसकी प्रतीति का विषय अन्योन्याभाव है’ ऐसा लक्षणार्थ निश्चित होता है। वहाँ ‘समानाधिकरण’ शब्द का अर्थ क्या तुल्याश्रय है, एकाश्रय है, तादात्म्य-प्रतियोगिकत्व है, अधिकरणभूत जो पदार्थ तद्वाचक शब्द के विशेष्य-विशेषणभाव से स्थित पद से अभिधेयत्व है या अन्य ही कुछ अर्थ है ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारण ‘चन्द्रे स्त्रीमुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ इस प्रतीति के विषय अत्यन्ताभाव में अतिव्याप्ति हो जायगी। ‘वहाँ मुख और चन्द्र में परस्पर भेद ही है, अतः वह लक्ष्य ही है’ ऐसा नहीं कह सकते, कारण मुख और चन्द्र का भेद होने पर भी वह ‘चन्द्रे मुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ इस प्रतीति का विषय नहीं है । समर्थन—‘चन्द्रे मुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ इस प्रतीति का विषय भेद न हो, तो हानि क्या है, कारण यह अन्योन्याभाव का लक्षण है। वह लक्षण ‘मुखं न चन्द्रः’ इस प्रतीति को ग्रहण कर उक्त भेद में समन्वित होने से दुष्ट नहीं है। खण्डन— कैसा वह लक्षण है ? ‘समानाधिकरण जो निषेध, तत् प्रतीतिविषय अन्योन्याभाव है’ ६३
४६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ तर्हीदं लक्षणम् ? न तावत्समानाधिकरणो यो निषेधस्तत्प्रत्ययो यस्तस्य यो विषयः, सोऽन्योन्याभाव इति । नापि स एवान्योन्याभाव इति । नापि यत्र समानाधिकरणो निषेधप्रत्ययस्तत्र योऽस्ति सोऽन्योन्याभाव इत्यस्तु, तद्धर्मस्य सर्वस्यान्योन्याभावत्वापातात्, समानाधिकरणवैयर्थ्यप्रसङ्गाच्च। एतेनैकमुदाहरणमादाय द्वितीयोऽपि निरस्तः । नापि तृतीयः ; तादात्म्यप्रतिसन्धानव्यतिरेकेण तत्प्रतियोगिकत्वस्य प्रत्येतु- मशक्यतया तन्निर्वचनप्रसङ्गात् । तच्चाशक्यम् । तथाहि—तदेकत्वं वा भेदाभावो वा ? स्वरूपं त्वसम्भावितम्, तस्य भेदत्वोपगमात्, तस्मिन् दृष्टेऽपि तन्न वेति तादात्म्यसंशयानवकाशापत्तेः । आद्येऽपि संख्याविशेषो वा धर्मान्तरं वा ? नाद्यः ; गुणादौ तदभावप्रसङ्गात् । यह लक्षण तो ‘चन्द्रे मुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ इस प्रतीति के विषय अत्यन्ताभाव में अतिव्याप्त होने से असङ्गत है । ‘उक्त प्रतीति ही अन्योन्याभाव है’, यह लक्षण भी उक्त प्रतीति के अविषय अन्योन्याभाव में अव्याप्त होने से असङ्गत है । ‘समानाधिकरण निषेध-प्रत्यय जिसमें हो, उसका धर्म अन्योन्याभाव है’, यह लक्षण भी युक्त नहीं । कारण घटादिनिष्ठ धर्ममात्र अन्योन्याभाव हो जायगा । किञ्च— पटनिष्ठ अत्यन्ताभाव में समन्वय होने से उसकी व्यावृत्ति के लिए दिया गया ‘समाना- धिकरण’ पद व्यर्थ हो जायगा । ‘समानाधिकरण’ पद का अर्थ एकाश्रयं है, यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं । कारण ‘चन्द्रे मुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ यहाँ अत्यन्ताभाव में अतिव्याप्ति हो जायगी । ‘तादात्म्य है प्रतियोगी जिसका, वह अन्योन्याभाव है’ यह तृतीय कल्प भी युक्त नहीं है, कारण जबतक तादात्म्य का ज्ञान न हो, तबतक तत्प्रतियोगिक अभाव का ज्ञान अशक्य है । अतः प्रथम तादात्म्य का निर्वचन करना होगा, किन्तु वह असंभव है । देखिये—क्या तादात्म्य एकत्व है या भेदाभाव है ? स्वरूपरूप तो तादात्म्य हो नहीं सकता, कारण स्वरूप भेद है और तादात्म्य भेद का अभावरूप है । किंच यदि तादात्म्य को स्वरूपरूप मानें, तो स्वरूप के प्रत्यक्ष होने पर ‘तत् न वा’ ऐसा तादात्म्य-भ्रम नहीं होना चाहिए । फिर, तादात्म्य एकत्वरूप है, इस प्रथम कल्प में भी वह एकत्व संख्यारूप है या अन्य धर्मरूप है ? संख्यारूप नहीं हो सकता, कारण ‘गुणे गुणानङ्गीकारः’ इस