भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४६३ द्वितीयस्वीकारप्रसङ्गः । ओमिति चेत् ; परार्धपर्यन्तं प्रवाहस्वीकारं को वारयिता ? नैतावन्मात्रेण तुष्यति भवान्, परार्धादप्यधिकमेकादिकं किं नाभ्युपगम्यत इत्यपि भवता वक्तव्यमेव । तथाच सैवानवस्थेति चेत् ; सत्यं तस्यास्तु भयात् कीदृशमभ्युपगम्यतामिति निपुणं मन्त्रयामहे । द्वचादिकं परित्यज्यतामिति चेत् ; एकस्मिन्नाम कीदृशोऽनुग्रहः, येनान- वस्थाप्रवाहनिवेशविशेषेऽपि द्वयादिकमुपेक्षितम्, एकं तु रक्षितम् ? द्वितीयमादा- यानवस्थेति चेत् ; द्वितीयेऽपि यदि भवतोऽनुग्रहः स्यात् , 'तृतीयमादायानवस्थे'- अनुमान की छाया से युक्त होकर ही प्रवृत्त होते हैं, यह आपने ही कहा है । अतः अनवस्था-प्रसञ्जक युक्ति में दोष कहिये या प्रवाह के तुल्य एक का भी स्वीकार न करिये । समर्थन—प्रवाह के स्वीकार के तुल्य एक के स्वीकार में अनवस्था नहीं है, अतः एक का स्वीकार करते हैं। खण्डन—तो क्या अनवस्था के अभाव से विशिष्ट भेद-प्रतीति की अन्यथानुपपत्तिरूप युक्ति भेद की साधक है, ऐसा मानते हैं, तब तो केवल द्वितीय के स्वीकार में भी अनवस्था नहीं है। अतः द्वितीय का स्वीकार भी करना चाहिए । यदि आप द्वितीय का भी स्वीकार कर लें, तो इसी तरह तृतीय-चतुर्थ के स्वीकार में भी अनवस्था के न होने से तृतीय-चतुर्थ का भी स्वीकार करेंगे। फिर इसी प्रकार परार्धपर्यन्त के स्वीकार का वारण कौन कर सकेगा ? किञ्च—यदि परार्धपर्यन्त से ही आपको संतोष न हुआ, तो परार्ध से अधिक का भी आप स्वीकार क्यों नहीं करेंगे, यह भी आपको कहना चाहिए । यदि कहें कि ऐसा मानने में वही अनवस्था होगी, अतः ऐसा नहीं मानते, तो सत्य है । किन्तु उस अनवस्था के भय से कैसा मानना चाहिए, इसी बात को हम दोनों भलीभाँति विचारें । समर्थन—अनवस्था के भय से द्वितीय आदि को ही छोड़ दीजिये । खंडन— एक के प्रति ही आपका यह कैसा अनुराग है, जिससे अनवस्था के प्रवाह-निवेश में विशेष न होने पर भी द्वितीय आदि की उपेक्षा और एक की रक्षा करते हैं ? समर्थन—प्रथममात्र के स्वीकार में अनवस्था नहीं है और द्वितीय आदि के स्वीकार में अनवस्था है । खण्डन—इसी तरह यदि द्वितीय पर भी आपका अनुग्रह हो, तो 'तृतीय के स्वीकार में अनवस्था है' ऐसा कहकर आप द्वितीय की भी रक्षा