भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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त्यभिधाय सोऽपि रञ्जितः स्यात् । तावेतौ भवतो रागद्वेषौ निःश्रेयसाय यतमानस्य मानसमास्कन्दमानौ न कल्याणोदर्कौ तर्कयामि । गन्धे गन्धान्तरप्रसञ्जिका न च युक्तिरस्ति । तदस्तित्वे वा का नो हानिः, तस्या अप्यस्माभिः खण्डनीयत्वात् । यदपि अथेतेरे'त्यादि 'निरूपणादि'त्यन्तम् । तदप्ययुक्तम् ; तथाहि— इतरेतराभावज्ञानं भेदव्यवहारहेतुं मन्यते यस्तस्य पक्षो नोपपन्न आत्माश्रय- प्रसङ्गादित्येवं ब्रुवाणस्य न किञ्चिद् बाधकमुक्तं स्यात् । प्रतियोगिरूपत्वेनेत्यादि समाधानं च प्रागेव दूषितम् । अथ 'स्वरूपमेवे'त्यादि 'न दोषः' इत्यन्तं यदुक्तम्; तदप्यस्मदनुक्तदोष- दूषणमित्युपेक्षितम् । करेंगे। मोक्ष के लिए यत्नशील आपके लिए ये पूर्वोक्त राग-द्वेष कल्याणकारी नहीं हैं, ऐसा हमारा अनुमान है । फिर, आपने जो यह दृष्टान्त दिया कि 'अनवस्था से जैसे गन्ध में अन्य गन्ध नहीं होता' इत्यादि, सो भी युक्त नहीं है । कारण गन्ध में अन्य गन्ध की साधक कोई युक्ति नहीं है । यदि युक्ति हो, तो उसे मानने में हानि ही क्या है ? इस प्रकार अनवस्था के भय से गन्ध में गन्ध के तुल्य प्रथम गन्ध भी सिद्ध नहीं होगा—यह दोष अनिर्वचनवादी को आप दे नहीं सकते । कारण इसी अनवस्थारूप युक्ति से प्रथम गन्ध का भी हम खण्डन करते ही हैं । आपने 'इतरेतराभाव' आदि से 'निरूपणात्' तक जो कुछ कहा, वह भी अयुक्त है । देखिये—'इतरेतराभाव भेद-व्यवहार का हेतु है' ऐसा कहनेवाले का पक्ष आत्माश्रय होने से अयुक्त है, इस कथन पर आपने कोई बाधक युक्ति तो दी नहीं । 'प्रतियोगित्वरूप से प्रतियोगी के अस्मृतिकाल में अधिकरणत्वरूप से अधिकरण की प्रतीति तथा अधिकरणत्वरूप से अधिकरण की अप्रतीति-काल में प्रतियोगित्वरूप से प्रतियोगी की स्मृति, भेदज्ञान में कारण है, अतः आत्माश्रय नहीं है,' इस युक्ति का खण्डन तो हम पहले ही कर आये हैं । अर्थात् निषेध्य-निषेध का सांकर्य हो जायगा, यह सब कह ही आये हैं । 'अथ स्वरूप एव' इत्यादि से 'न दोषः' यहाँ तक जो कहा है, वह भी हमारे द्वारा अनुक्त दोष का दूषण (खण्डन) है । अतः हम उसकी उपेक्षा करते हैं ।