खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] भेद लक्षण का खण्डन ४६५ यदपि 'तथाऽपि क' इत्यादि 'तिर्यक् चे'त्यन्तम्; तदपि गर्तवर्तिगोधामसांस- विभजनन्यायमनुहरति । पक्षत्रयस्याऽप्युक्तयुक्त्या आच्छादितस्य दर्शयितुम- शक्यत्वेन तद्विभागव्यवस्थितेरनवसरनिरस्तत्वात् । यच्च स्वरूपभेदस्य लक्षणमुक्तम्—ताद्रूप्येणाप्रतीतौ प्रतीतिरिति । तदप्य- वद्यम्; यदेकमेव वस्तु भ्रान्त्या भिन्नमिति प्रतीयते, तत्र ताद्रूप्येणैकस्यैकरूपतया प्रतीतिर्नास्ति । अस्ति च प्रतीतिः, न च स्वरूपभेद इत्यतिव्याप्तिः । ताद्रूप्येणेत्यस्य धर्मान्तररूपभेदासङ्कीर्णोदाहरणार्थत्वात् प्रतीतिरभ्रान्ता विवक्षितेति चेत्; स्वरूपप्रतीतेस्तत्राप्यभ्रान्तत्वात् । यच्च स्वरूपमात्रेण प्रतीयते वस्तु, न तत्ताद्रूप्येण, न च नानात्म- तया, वस्तुगत्या चैकमेव तत्, तत्रापि स्वरूपलक्षणो भेदः स्यात् । नास्त्येवेदृशमुदाहरणम्, ताद्रूप्याताद्रूप्याभ्यामेकस्यावश्यं प्रतीतेरिति चेन्न । 'तथापि कः परमार्थः' इत्यादि से 'तिर्यक् च' यहाँ तक जो ग्रन्थ है, वह भी बिल में स्थित गोधा (गिरगिट) का मांस व्याधों द्वारा बाँटने की तरह है । अर्थात् अप्राप्त विषय होने से उसकी तरह भेद का वह विभागीकरण उपहासास्पद है । उक्त युक्तियों से तीनों प्रकार के भेद खण्डित हैं। एवञ्च उन भेदों को आप दिखा नहीं सकते । इसलिए उनके विभाग का खण्डन अवसरप्राप्त नहीं (अप्रासंगिक) है । फिर, स्वरूप-भेद का आपने जो यह लक्षण किया कि 'ताद्रूप्य से अप्रतीति-काल में प्रतीति स्वरूप-भेद है', वह भी सदोष है । देखिये—जो चन्द्र आदि एक वस्तुरूप है, पर भ्रान्ति से दो (भिन्न) प्रतीत होता है, वहाँ ताद्रूप्य (एकरूप) से एक की एक- रूपेण प्रतीति नहीं है, अतः वह स्वरूप-भेद नहीं है। एवञ्च वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'ताद्रूप्य' शब्द 'वैधर्म्य' और 'अन्योन्याभाव' इन दो भेदों से असंकीर्ण उदाहरण के प्रदर्शनार्थ है और लक्षणघटक प्रतीति यथार्थ ही विवक्षित है । अतः वहाँ अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—वहाँ भी स्वरूप की प्रतीति यथार्थ ही है । किञ्च—जो वस्तु स्वरूपमात्र से प्रतीत हो, एकत्वरूप से या नानारूप से प्रतीत न हो, पर वस्तुतः एकरूप ही वह हो, वहाँ भी स्वरूप-भेद हो जायगा । यदि कहें कि ऐसा उदाहरण नहीं है, कारण ताद्रूप्य या अताद्रूप्य दोनों में से एकरूप से अवश्य प्रतीति होती है, तो 'ऐसी प्रतीति नहीं होती' इस कलह का अवकाश ही नहीं है । कारण 'जो तुमने देखा है, वह एक है या अनेक ?' ऐसा प्रश्न