खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ स्वीकारे तस्या असाधकत्वं स्वीक्रियते, एकस्वीकारेऽपि स्यात्, अविशिष्ट- लक्षणत्वात् । अत एव प्रतिभासमानत्वादेकस्वीकार इत्यप्ययुक्तम् । एकप्रतिभासिकाया युक्तेः सर्वसाधारण्यात् । न हि प्रत्यक्षादेव जायमानः प्रतिभासः प्रमाणं नानुमानादेरित्यत्र युक्तिरभ्युपगमो वा ? न चानवस्थाप्रसञ्जिका युक्तिरनुमानादेरन्या नाम । तर्कस्यापि व्याप्तिमूलत्वम्, सर्वश्वानुमानच्छायामापद्य दूषणमपि प्रवर्तत इति भवतैव व्युत्पादनात् । अतोऽनवस्थाप्रसञ्जिकाया युक्तेर्दोषो वा वक्तव्यः, त्यक्तव्यो वा स्वपक्षः । प्रवाहस्वीकारवदेकस्वीकारे नानवस्थेति चेत्; तत्किमनवस्थाभावविशिष्टा यास्तस्या युक्तेः साधकत्वं मन्यसे ? एवं तर्हि द्वितीयमात्रस्वीकारे नानवस्थेति की अन्यथानुपपत्तिरूप युक्ति भेदप्रवाह की असाधक (आभास) हो, तो वह एक की भी साधक नहीं होगी। कारण भेद-प्रतीति की अन्यथानुपपत्ति जैसे एक में है, वैसे ही प्रवाह में भी है; दोनों स्थलों की युक्ति में कोई भेद नहीं है। समर्थन—प्राथमिक भेद में युक्ति नहीं, प्रत्युत 'घटः पटो न' यह प्रत्यक्ष-प्रमाण है। प्रवाह में ऐसा प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, अतः उसका स्वीकार नहीं किया जा सकता। खण्डन—उस प्रत्यक्ष को आभास माननेवाले को आपको युक्ति अवश्य देनी होगी। वह युक्ति सर्वसाधारण है, अर्थात् प्रवाह की भी साधक है। समर्थन—द्विती- यादि भेदगोचर प्रत्यक्ष में आभासता का सन्देह भी नहीं होगा। खण्डन—केवल प्रत्यक्ष से जायमान प्रतिभास ही प्रमाण है, अनुमानादि से जायमान प्रतिभास प्रमाण नहीं; इसमें आप कोई युक्ति या वचन प्रमाण नहीं दे सकते। समर्थन—भेद-प्रवाह में भी कोई युक्ति नहीं है। यदि कोई अनवस्था की प्रसंजिका युक्ति भी हो तो वह अनुमान है, इसमें प्रमाण नहीं है। खंडन—यदि भेद में अन्य भेद न हो, तो वह प्राप्त भेद भी स्वाश्रय से अभिन्न होकर नष्ट हो जायगा, यह अभेद-प्रवाह के स्वीकार की साधक युक्ति भी अनुमानरूप ही है। समर्थन—यह युक्ति तर्करूप है, अनुमानरूप नहीं। खंडन—तर्क का मूल भी व्याप्ति ही है, अतः तर्क भी प्रमा का जनक है तथा उसका पर्यवसान विपर्यय में ही होता है और वह विपर्यय-पर्यवसान अनुमानरूप ही है। अनवस्था आदि सभी दूषण