भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 511, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 511

परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४६१ लक्षणन्तु स्वरूपभेदस्य ताद्रूप्येणाप्रतीतौ प्रतीतिः। इतरेतराभावस्य त्वबाधितः समानाधिकरणो निषेधप्रत्ययः। वैधर्म्यस्य तु विरोधः, स चैकधर्मसमावेश इत्येषा दिगिति। अत्रोच्यते। तथाहि यत्तावत् पृष्टं किमेतेष्वन्यतमात्माऽस्य विषयः तदन्यो वेति तन्निर्वचनवादिनि शोभते, नास्मासु। प्रतिभासमानोऽयं भेदः स्वरूपादि- पक्षान्तर्भावानन्तर्भावाभ्यां वा सदसत्त्वाभ्यां वा अन्येनापि धर्मेण येन केनचिन्निरू- प्यमानोऽन्वयेन च व्यतिरेकेण वा बाध्यतामिति तेन सर्वेणानिर्वचनीय इति ब्रूमः। एतच्च न केवलं भेदस्यापि, तर्हि जगत एव। अनिर्वचनीयवादश्चायं यथा तथोदितं प्राक्। यदप्युक्तम् अथान्यतमेत्यादि गन्धे गन्धान्तरवदित्यन्तम्। तदपि न साधु; यया युक्त्यैकस्वीकारस्तयैव प्रवाहस्वीकारस्य दुर्वारत्वात्। तत्र यदि प्रवाह- 'पट है, घट नहीं है, तन्तुमय है', 'यह गन्ध है, रूप नहीं, सुरभि है'—'यह गति है, उत्क्षेपण नहीं है, तिर्यक् है' ऐसी प्रतीतियाँ होती हैं। 'तादात्म्य के प्रतियोगित्वरूप से अप्रतीति-काल में जो प्रतीति हो, उसका विषय' स्वरूपभेद का लक्षण है। 'समानाधिकरण और अबाधित निषेधप्रत्यय' इतरेतराभाव का लक्षण है। विरोध ही वैधर्म्य का लक्षण है। यह विरोध एकधर्मी में असमावेश है। भेद-समर्थन की यह दिक् ( संकेतमात्र ) है। खण्डन—अब समाधान करते हैं। श्रवण कीजिये, जो आपने यह प्रश्न किया है कि 'भेद-प्रतीति का विषय भेद स्वरूपादि रूप है या अन्यरूप ? यह निर्वचन- वादी के लिए ही फबता है, हम अनिर्वचनवादी के लिए नहीं। "प्रति- भासमान भी यह भेद स्वरूपादि तीनों पक्षों में अन्तर्भाव-अनन्तर्भाव से, सत्त्व-असत्त्व से या अन्य किसी धर्म से निरूपित होने पर अन्वय या व्यतिरेक से बाधित होता है, अतः उन सभी रूपों से वह अनिर्वचनीय है"—यही हम कहते हैं। हमारे मत से यह अनिर्वचनीयत्व केवल भेद का ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण जगत् का ही है। यह अनिर्वचनीयतावाद जिस प्रकार सिद्ध होता है, वह पीछे कह ही आये हैं। जो आपने 'अथ अन्यतमेत्यादि' से 'गन्धे गन्धान्तरवत्' तक कहा है, वह ठीक नहीं है। कारण जिस भेदप्रतीति की अन्यथानुपपत्तिरूप युक्ति से एक का स्वीकार आप करते हैं, उसी युक्ति से प्रवाह का भी स्वीकार करना होगा। यदि भेद-प्रतीति