खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
४६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ स्वीकारे तस्या असाधकत्वं स्वीक्रियते, एकस्वीकारेऽपि स्यात्, अविशिष्ट- लक्षणत्वात् । अत एव प्रतिभासमानत्वादेकस्वीकार इत्यप्ययुक्तम् । एकप्रतिभासिकाया युक्तेः सर्वसाधारण्यात् । न हि प्रत्यक्षादेव जायमानः प्रतिभासः प्रमाणं नानुमानादेरित्यत्र युक्तिरभ्युपगमो वा ? न चानवस्थाप्रसञ्जिका युक्तिरनुमानादेरन्या नाम । तर्कस्यापि व्याप्तिमूलत्वम्, सर्वश्वानुमानच्छायामापद्य दूषणमपि प्रवर्तत इति भवतैव व्युत्पादनात् । अतोऽनवस्थाप्रसञ्जिकाया युक्तेर्दोषो वा वक्तव्यः, त्यक्तव्यो वा स्वपक्षः । प्रवाहस्वीकारवदेकस्वीकारे नानवस्थेति चेत्; तत्किमनवस्थाभावविशिष्टा यास्तस्या युक्तेः साधकत्वं मन्यसे ? एवं तर्हि द्वितीयमात्रस्वीकारे नानवस्थेति की अन्यथानुपपत्तिरूप युक्ति भेदप्रवाह की असाधक (आभास) हो, तो वह एक की भी साधक नहीं होगी। कारण भेद-प्रतीति की अन्यथानुपपत्ति जैसे एक में है, वैसे ही प्रवाह में भी है; दोनों स्थलों की युक्ति में कोई भेद नहीं है। समर्थन—प्राथमिक भेद में युक्ति नहीं, प्रत्युत 'घटः पटो न' यह प्रत्यक्ष-प्रमाण है। प्रवाह में ऐसा प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, अतः उसका स्वीकार नहीं किया जा सकता। खण्डन—उस प्रत्यक्ष को आभास माननेवाले को आपको युक्ति अवश्य देनी होगी। वह युक्ति सर्वसाधारण है, अर्थात् प्रवाह की भी साधक है। समर्थन—द्विती- यादि भेदगोचर प्रत्यक्ष में आभासता का सन्देह भी नहीं होगा। खण्डन—केवल प्रत्यक्ष से जायमान प्रतिभास ही प्रमाण है, अनुमानादि से जायमान प्रतिभास प्रमाण नहीं; इसमें आप कोई युक्ति या वचन प्रमाण नहीं दे सकते। समर्थन—भेद-प्रवाह में भी कोई युक्ति नहीं है। यदि कोई अनवस्था की प्रसंजिका युक्ति भी हो तो वह अनुमान है, इसमें प्रमाण नहीं है। खंडन—यदि भेद में अन्य भेद न हो, तो वह प्राप्त भेद भी स्वाश्रय से अभिन्न होकर नष्ट हो जायगा, यह अभेद-प्रवाह के स्वीकार की साधक युक्ति भी अनुमानरूप ही है। समर्थन—यह युक्ति तर्करूप है, अनुमानरूप नहीं। खंडन—तर्क का मूल भी व्याप्ति ही है, अतः तर्क भी प्रमा का जनक है तथा उसका पर्यवसान विपर्यय में ही होता है और वह विपर्यय-पर्यवसान अनुमानरूप ही है। अनवस्था आदि सभी दूषण
परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४६३ द्वितीयस्वीकारप्रसङ्गः । ओमिति चेत् ; परार्धपर्यन्तं प्रवाहस्वीकारं को वारयिता ? नैतावन्मात्रेण तुष्यति भवान्, परार्धादप्यधिकमेकादिकं किं नाभ्युपगम्यत इत्यपि भवता वक्तव्यमेव । तथाच सैवानवस्थेति चेत् ; सत्यं तस्यास्तु भयात् कीदृशमभ्युपगम्यतामिति निपुणं मन्त्रयामहे । द्वचादिकं परित्यज्यतामिति चेत् ; एकस्मिन्नाम कीदृशोऽनुग्रहः, येनान- वस्थाप्रवाहनिवेशविशेषेऽपि द्वयादिकमुपेक्षितम्, एकं तु रक्षितम् ? द्वितीयमादा- यानवस्थेति चेत् ; द्वितीयेऽपि यदि भवतोऽनुग्रहः स्यात् , 'तृतीयमादायानवस्थे'- अनुमान की छाया से युक्त होकर ही प्रवृत्त होते हैं, यह आपने ही कहा है । अतः अनवस्था-प्रसञ्जक युक्ति में दोष कहिये या प्रवाह के तुल्य एक का भी स्वीकार न करिये । समर्थन—प्रवाह के स्वीकार के तुल्य एक के स्वीकार में अनवस्था नहीं है, अतः एक का स्वीकार करते हैं। खण्डन—तो क्या अनवस्था के अभाव से विशिष्ट भेद-प्रतीति की अन्यथानुपपत्तिरूप युक्ति भेद की साधक है, ऐसा मानते हैं, तब तो केवल द्वितीय के स्वीकार में भी अनवस्था नहीं है। अतः द्वितीय का स्वीकार भी करना चाहिए । यदि आप द्वितीय का भी स्वीकार कर लें, तो इसी तरह तृतीय-चतुर्थ के स्वीकार में भी अनवस्था के न होने से तृतीय-चतुर्थ का भी स्वीकार करेंगे। फिर इसी प्रकार परार्धपर्यन्त के स्वीकार का वारण कौन कर सकेगा ? किञ्च—यदि परार्धपर्यन्त से ही आपको संतोष न हुआ, तो परार्ध से अधिक का भी आप स्वीकार क्यों नहीं करेंगे, यह भी आपको कहना चाहिए । यदि कहें कि ऐसा मानने में वही अनवस्था होगी, अतः ऐसा नहीं मानते, तो सत्य है । किन्तु उस अनवस्था के भय से कैसा मानना चाहिए, इसी बात को हम दोनों भलीभाँति विचारें । समर्थन—अनवस्था के भय से द्वितीय आदि को ही छोड़ दीजिये । खंडन— एक के प्रति ही आपका यह कैसा अनुराग है, जिससे अनवस्था के प्रवाह-निवेश में विशेष न होने पर भी द्वितीय आदि की उपेक्षा और एक की रक्षा करते हैं ? समर्थन—प्रथममात्र के स्वीकार में अनवस्था नहीं है और द्वितीय आदि के स्वीकार में अनवस्था है । खण्डन—इसी तरह यदि द्वितीय पर भी आपका अनुग्रह हो, तो 'तृतीय के स्वीकार में अनवस्था है' ऐसा कहकर आप द्वितीय की भी रक्षा
त्यभिधाय सोऽपि रञ्जितः स्यात् । तावेतौ भवतो रागद्वेषौ निःश्रेयसाय यतमानस्य मानसमास्कन्दमानौ न कल्याणोदर्कौ तर्कयामि । गन्धे गन्धान्तरप्रसञ्जिका न च युक्तिरस्ति । तदस्तित्वे वा का नो हानिः, तस्या अप्यस्माभिः खण्डनीयत्वात् । यदपि अथेतेरे'त्यादि 'निरूपणादि'त्यन्तम् । तदप्ययुक्तम् ; तथाहि— इतरेतराभावज्ञानं भेदव्यवहारहेतुं मन्यते यस्तस्य पक्षो नोपपन्न आत्माश्रय- प्रसङ्गादित्येवं ब्रुवाणस्य न किञ्चिद् बाधकमुक्तं स्यात् । प्रतियोगिरूपत्वेनेत्यादि समाधानं च प्रागेव दूषितम् । अथ 'स्वरूपमेवे'त्यादि 'न दोषः' इत्यन्तं यदुक्तम्; तदप्यस्मदनुक्तदोष- दूषणमित्युपेक्षितम् । करेंगे। मोक्ष के लिए यत्नशील आपके लिए ये पूर्वोक्त राग-द्वेष कल्याणकारी नहीं हैं, ऐसा हमारा अनुमान है । फिर, आपने जो यह दृष्टान्त दिया कि 'अनवस्था से जैसे गन्ध में अन्य गन्ध नहीं होता' इत्यादि, सो भी युक्त नहीं है । कारण गन्ध में अन्य गन्ध की साधक कोई युक्ति नहीं है । यदि युक्ति हो, तो उसे मानने में हानि ही क्या है ? इस प्रकार अनवस्था के भय से गन्ध में गन्ध के तुल्य प्रथम गन्ध भी सिद्ध नहीं होगा—यह दोष अनिर्वचनवादी को आप दे नहीं सकते । कारण इसी अनवस्थारूप युक्ति से प्रथम गन्ध का भी हम खण्डन करते ही हैं । आपने 'इतरेतराभाव' आदि से 'निरूपणात्' तक जो कुछ कहा, वह भी अयुक्त है । देखिये—'इतरेतराभाव भेद-व्यवहार का हेतु है' ऐसा कहनेवाले का पक्ष आत्माश्रय होने से अयुक्त है, इस कथन पर आपने कोई बाधक युक्ति तो दी नहीं । 'प्रतियोगित्वरूप से प्रतियोगी के अस्मृतिकाल में अधिकरणत्वरूप से अधिकरण की प्रतीति तथा अधिकरणत्वरूप से अधिकरण की अप्रतीति-काल में प्रतियोगित्वरूप से प्रतियोगी की स्मृति, भेदज्ञान में कारण है, अतः आत्माश्रय नहीं है,' इस युक्ति का खण्डन तो हम पहले ही कर आये हैं । अर्थात् निषेध्य-निषेध का सांकर्य हो जायगा, यह सब कह ही आये हैं । 'अथ स्वरूप एव' इत्यादि से 'न दोषः' यहाँ तक जो कहा है, वह भी हमारे द्वारा अनुक्त दोष का दूषण (खण्डन) है । अतः हम उसकी उपेक्षा करते हैं ।
परिच्छेद ] भेद लक्षण का खण्डन ४६५ यदपि 'तथाऽपि क' इत्यादि 'तिर्यक् चे'त्यन्तम्; तदपि गर्तवर्तिगोधामसांस- विभजनन्यायमनुहरति । पक्षत्रयस्याऽप्युक्तयुक्त्या आच्छादितस्य दर्शयितुम- शक्यत्वेन तद्विभागव्यवस्थितेरनवसरनिरस्तत्वात् । यच्च स्वरूपभेदस्य लक्षणमुक्तम्—ताद्रूप्येणाप्रतीतौ प्रतीतिरिति । तदप्य- वद्यम्; यदेकमेव वस्तु भ्रान्त्या भिन्नमिति प्रतीयते, तत्र ताद्रूप्येणैकस्यैकरूपतया प्रतीतिर्नास्ति । अस्ति च प्रतीतिः, न च स्वरूपभेद इत्यतिव्याप्तिः । ताद्रूप्येणेत्यस्य धर्मान्तररूपभेदासङ्कीर्णोदाहरणार्थत्वात् प्रतीतिरभ्रान्ता विवक्षितेति चेत्; स्वरूपप्रतीतेस्तत्राप्यभ्रान्तत्वात् । यच्च स्वरूपमात्रेण प्रतीयते वस्तु, न तत्ताद्रूप्येण, न च नानात्म- तया, वस्तुगत्या चैकमेव तत्, तत्रापि स्वरूपलक्षणो भेदः स्यात् । नास्त्येवेदृशमुदाहरणम्, ताद्रूप्याताद्रूप्याभ्यामेकस्यावश्यं प्रतीतेरिति चेन्न । 'तथापि कः परमार्थः' इत्यादि से 'तिर्यक् च' यहाँ तक जो ग्रन्थ है, वह भी बिल में स्थित गोधा (गिरगिट) का मांस व्याधों द्वारा बाँटने की तरह है । अर्थात् अप्राप्त विषय होने से उसकी तरह भेद का वह विभागीकरण उपहासास्पद है । उक्त युक्तियों से तीनों प्रकार के भेद खण्डित हैं। एवञ्च उन भेदों को आप दिखा नहीं सकते । इसलिए उनके विभाग का खण्डन अवसरप्राप्त नहीं (अप्रासंगिक) है । फिर, स्वरूप-भेद का आपने जो यह लक्षण किया कि 'ताद्रूप्य से अप्रतीति-काल में प्रतीति स्वरूप-भेद है', वह भी सदोष है । देखिये—जो चन्द्र आदि एक वस्तुरूप है, पर भ्रान्ति से दो (भिन्न) प्रतीत होता है, वहाँ ताद्रूप्य (एकरूप) से एक की एक- रूपेण प्रतीति नहीं है, अतः वह स्वरूप-भेद नहीं है। एवञ्च वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'ताद्रूप्य' शब्द 'वैधर्म्य' और 'अन्योन्याभाव' इन दो भेदों से असंकीर्ण उदाहरण के प्रदर्शनार्थ है और लक्षणघटक प्रतीति यथार्थ ही विवक्षित है । अतः वहाँ अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—वहाँ भी स्वरूप की प्रतीति यथार्थ ही है । किञ्च—जो वस्तु स्वरूपमात्र से प्रतीत हो, एकत्वरूप से या नानारूप से प्रतीत न हो, पर वस्तुतः एकरूप ही वह हो, वहाँ भी स्वरूप-भेद हो जायगा । यदि कहें कि ऐसा उदाहरण नहीं है, कारण ताद्रूप्य या अताद्रूप्य दोनों में से एकरूप से अवश्य प्रतीति होती है, तो 'ऐसी प्रतीति नहीं होती' इस कलह का अवकाश ही नहीं है । कारण 'जो तुमने देखा है, वह एक है या अनेक ?' ऐसा प्रश्न
४६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ प्रतीतिकलहानवकाशात् । भवति हि यद्यथा तत्र दृष्टम्, तत् किमेकमनेकं वेत्य- न्युक्तो नायं विशेषो मया शङ्कितो जिज्ञासितो वा । स्वरूपमात्रन्तु प्रतीत्याह- मुदासीनोऽभूवमित्यभिधत्त इति । ननु तदपि स्वरूपं भेद एव कस्मादपि, तत् कथमुक्तदोषावतार इति । मैवम्; एवं हि ताद्रूप्येणाप्रतीताविति व्यर्थं स्यात् । प्रतीतिमात्रं लक्षणं वक्तव्यम् । यत्प्रमेयं तत् कस्मादप्यवश्यं भिन्नमिति एकस्यैव स्वस्माद्भेदप्रसङ्गनिराकरणार्थमपि ताद्रू- प्येणाप्रतीतावित्युक्तम्, तच्च खण्डितमिति । ताद्रूप्यमन्यरूपत्वं विवक्षितमिति चेन्न । तदा हि तदाऽनुपस्थापितपरामर्श- होने पर 'इस विशेष विषय में मुझे न तो शङ्का हुई, न जिज्ञासा, केवल स्वरूप को देखकर ही मैं उदासीन हो गया था' ऐसा उत्तर कहा जाता है । समर्थन—वह भी स्वरूप किसीसे भिन्न ही है, अतः लक्ष्य होने से लक्षण का जाना भूषण ही है। खण्डन — यदि ऐसा है, तो प्रतीतिमात्र को ही लक्षण कहिये । ताद्रूप्य से अप्रतीति विशेषण व्यर्थ है, कारण जो प्रमेय है, वह अवश्य किसीसे भिन्न है, अतः प्रमेयमात्र लक्ष्य ही है। स्व से स्व में भेद-व्यवहार न हो, इसीलिए ताद्रूप्य से अप्रतीति यह विशेषण है, पर वह उक्त दोष से खण्डित ही है। समर्थन—लक्षण-घटक ताद्रूप्य के एकदेश तद्रूपशब्द से स्वरूप-भेद से अन्य का परामर्श होने से 'स्वरूप-भेद से अन्यत्वरूप से अप्रतीति-काल में जो प्रतीति, वह स्वरूपरूप भेद है,' ऐसा कहेंगे। खण्डन— इस लक्षण के घटक 'अन्य' शब्द से यदि स्वरूपभेद का ग्रहण करें, तो स्वरूप-भेद के लक्षण में स्वरूप-भेद का प्रवेश होने से आत्माश्रय हो जायगा। जैसे अन्य शब्द से अनुपस्थापित अन्यत्व का ताद्रूप्यघटक तद्रूपशब्द के परामर्श से आत्माश्रय होता है। लक्षणघटक अन्य स्वरूप-भेद है और लक्ष्य अन्य है, यह भी नहीं कह सकते, कारण स्वरूप-भेदमात्र लक्ष्य है। यदि लक्षण-घटक 'अन्य'-शब्द अन्योन्याभावपरक मानें, तो अन्योन्याभाव से स्वरूप-भेद का और स्वरूपभेद के प्रतियोगिरूप होने से स्वरूपभेद से अन्योन्याभाव का ज्ञान होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा। यदि लक्षण में वैधर्म्यरूप भेद का प्रवेश करें, तो तदन्योन्याभावसमानाधि- करण धर्म ही तद्वैधर्म्य है, अतः अन्योन्याभाव से वैधर्म्य का और वैधर्म्य
यत् अन्यत्वस्यं स्वरूपभेदत्वे आत्माश्रयः, सर्वस्वरूपाणां लक्ष्यत्वात् । अन्यो- न्याभावत्वे चान्योन्याश्रयः, वैधर्म्ये च चक्रकम् । यदपि—इतरेतराभावस्य लक्षणमबाधितः समानाधिकरणो निषेधप्रत्ययः । एतदप्यशोभनम् ; समानाधिकरण इत्यादि भाषायाः कथं कथमपि तात्पर्यं- गवेषणेऽपि समानाधिकरणो यो निषेधस्तत्प्रत्ययविषयोऽन्योन्याभाव इति पर्यवसाने समानाधिकरण इति किं तुल्याश्रयः , उतैकाश्रयः, उत तादात्म्यप्रति- योगिकः, उत अधिकरणभूतपदार्थवाचिशब्दविशेषणविशेष्यभावव्यवस्थितपदा- भिधेयः , उत अन्यदेव ? तत्र न प्रथमः ; तुहिनमयूखे प्रियामुखे च न दूषणकणस्यापि सम्भव इति प्रत्ययस्यापि दर्शनात् । तत्र मुखचन्द्रयोरन्योन्याभावोऽस्तीति चेन्न । तस्य सत्त्वेऽप्युक्तप्रत्ययस्य तदविषयत्वात् । माऽस्तु तद्विषयो लक्षणं त्वस्यैतत्, तच्च तद्विषयत्वेऽप्यदुष्टमिति चेत्; कीदृशं से स्वरूप-भेद का और स्वरूप-भेद से अन्योन्याभाव का निरूपण होने से चक्रक हो जायगा । ‘इतरेतराभाव’ का जो ‘अबाधित और समानाधिकरण निषेधप्रत्यय’ यह लक्षण है, वह भी अशोभन है। ‘समानाधिकरण’ इत्यादि शब्दों के अभिप्राय का किसी प्रकार अन्वेषण करने पर ‘समानाधिकरण जो निषेध, उसकी प्रतीति का विषय अन्योन्याभाव है’ ऐसा लक्षणार्थ निश्चित होता है। वहाँ ‘समानाधिकरण’ शब्द का अर्थ क्या तुल्याश्रय है, एकाश्रय है, तादात्म्य-प्रतियोगिकत्व है, अधिकरणभूत जो पदार्थ तद्वाचक शब्द के विशेष्य-विशेषणभाव से स्थित पद से अभिधेयत्व है या अन्य ही कुछ अर्थ है ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारण ‘चन्द्रे स्त्रीमुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ इस प्रतीति के विषय अत्यन्ताभाव में अतिव्याप्ति हो जायगी। ‘वहाँ मुख और चन्द्र में परस्पर भेद ही है, अतः वह लक्ष्य ही है’ ऐसा नहीं कह सकते, कारण मुख और चन्द्र का भेद होने पर भी वह ‘चन्द्रे मुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ इस प्रतीति का विषय नहीं है । समर्थन—‘चन्द्रे मुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ इस प्रतीति का विषय भेद न हो, तो हानि क्या है, कारण यह अन्योन्याभाव का लक्षण है। वह लक्षण ‘मुखं न चन्द्रः’ इस प्रतीति को ग्रहण कर उक्त भेद में समन्वित होने से दुष्ट नहीं है। खण्डन— कैसा वह लक्षण है ? ‘समानाधिकरण जो निषेध, तत् प्रतीतिविषय अन्योन्याभाव है’ ६३
४६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ तर्हीदं लक्षणम् ? न तावत्समानाधिकरणो यो निषेधस्तत्प्रत्ययो यस्तस्य यो विषयः, सोऽन्योन्याभाव इति । नापि स एवान्योन्याभाव इति । नापि यत्र समानाधिकरणो निषेधप्रत्ययस्तत्र योऽस्ति सोऽन्योन्याभाव इत्यस्तु, तद्धर्मस्य सर्वस्यान्योन्याभावत्वापातात्, समानाधिकरणवैयर्थ्यप्रसङ्गाच्च। एतेनैकमुदाहरणमादाय द्वितीयोऽपि निरस्तः । नापि तृतीयः ; तादात्म्यप्रतिसन्धानव्यतिरेकेण तत्प्रतियोगिकत्वस्य प्रत्येतु- मशक्यतया तन्निर्वचनप्रसङ्गात् । तच्चाशक्यम् । तथाहि—तदेकत्वं वा भेदाभावो वा ? स्वरूपं त्वसम्भावितम्, तस्य भेदत्वोपगमात्, तस्मिन् दृष्टेऽपि तन्न वेति तादात्म्यसंशयानवकाशापत्तेः । आद्येऽपि संख्याविशेषो वा धर्मान्तरं वा ? नाद्यः ; गुणादौ तदभावप्रसङ्गात् । यह लक्षण तो ‘चन्द्रे मुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ इस प्रतीति के विषय अत्यन्ताभाव में अतिव्याप्त होने से असङ्गत है । ‘उक्त प्रतीति ही अन्योन्याभाव है’, यह लक्षण भी उक्त प्रतीति के अविषय अन्योन्याभाव में अव्याप्त होने से असङ्गत है । ‘समानाधिकरण निषेध-प्रत्यय जिसमें हो, उसका धर्म अन्योन्याभाव है’, यह लक्षण भी युक्त नहीं । कारण घटादिनिष्ठ धर्ममात्र अन्योन्याभाव हो जायगा । किञ्च— पटनिष्ठ अत्यन्ताभाव में समन्वय होने से उसकी व्यावृत्ति के लिए दिया गया ‘समाना- धिकरण’ पद व्यर्थ हो जायगा । ‘समानाधिकरण’ पद का अर्थ एकाश्रयं है, यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं । कारण ‘चन्द्रे मुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ यहाँ अत्यन्ताभाव में अतिव्याप्ति हो जायगी । ‘तादात्म्य है प्रतियोगी जिसका, वह अन्योन्याभाव है’ यह तृतीय कल्प भी युक्त नहीं है, कारण जबतक तादात्म्य का ज्ञान न हो, तबतक तत्प्रतियोगिक अभाव का ज्ञान अशक्य है । अतः प्रथम तादात्म्य का निर्वचन करना होगा, किन्तु वह असंभव है । देखिये—क्या तादात्म्य एकत्व है या भेदाभाव है ? स्वरूपरूप तो तादात्म्य हो नहीं सकता, कारण स्वरूप भेद है और तादात्म्य भेद का अभावरूप है । किंच यदि तादात्म्य को स्वरूपरूप मानें, तो स्वरूप के प्रत्यक्ष होने पर ‘तत् न वा’ ऐसा तादात्म्य-भ्रम नहीं होना चाहिए । फिर, तादात्म्य एकत्वरूप है, इस प्रथम कल्प में भी वह एकत्व संख्यारूप है या अन्य धर्मरूप है ? संख्यारूप नहीं हो सकता, कारण ‘गुणे गुणानङ्गीकारः’ इस
रिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४६६ थमे क्षणे कार्यद्रव्यस्यैकस्यापि स्वातादात्म्यप्रसङ्गात् । वैशेषिकमते व्युत्थाने वैकत्वे तदभावप्रसङ्गात् । उपाधिभिन्नाववलम्बि च तादात्म्यं कथं स्वरूप- मात्रावलम्बेनैकत्वीकर्तुं शक्यम्, विचित्रप्रतिपत्तिकत्वात् । नापि द्वितीयः ; तस्यापि धर्मान्तरापेक्षयाऽनवस्थापातात्, अनपेक्षायां स्वातादात्म्यप्रसङ्गात् । नापि द्वितीयः ; स हि भेदस्याभावो भवन्नप्यन्योन्याभावस्यैव स्यात्, अन्योन्याभावस्य च तत्प्रतिषेधात्मकत्वात् तेनाप्यन्योन्याभावप्रतिषेधात्मना भवितव्यम् ; परस्परप्रतिषेधात्मकत्वान्निषेध्यनिषेधयोः । तथाच सति अन्योन्या- भावप्रतीतिमन्तरेण तन्निरूपणमशक्यं निषेध्यप्रतीतिसापेक्षत्वान्निषेधबुद्धे- रित्यन्योन्याश्रयः । नापि तुरीयः ; 'निर्घटं भूतलमित्यत्रापि प्रसङ्गात् । सिद्धान्त के अनुसार गुण में संख्या के तादात्म्य का अभाव हो जायगा । प्रथम क्षण में एक कार्यद्रव्य में भी स्व का अतादात्म्य हो जायगा । यदि 'गुणे गुणानङ्गीकारः' इस वैशेषिक सिद्धान्त को न भी मानें, तो भी अनवस्था के भय से एकत्व में एकत्व न होने से एकत्व में तादात्म्य का अभाव हो जायगा । किंच-भिन्न-भिन्न धर्मों में स्थित नानारूप तादात्म्य का, एकत्व में एक अनुगमकरूप न होने से, स्वरूपमात्र के प्रतिपादक एकत्व-शब्द से कथन कैसे होगा ? कारण अनुगमक एकरूप न होने से एकत्व की प्रतिपत्ति विभिन्नविषयक है । एकत्व धर्मरूप है, यह द्वितीय कल्प भी अयुक्त है, कारण धर्म में धर्म मानें, तो अनवस्था हो जायगी । यदि धर्म में धर्म न मानें, तो उस धर्म का अतादात्म्य हो जायगा । भेद का अभाव तादात्म्य है, यह द्वितीय कल्प भी अयुक्त है। कारण तादात्म्य भेद का अभाव होनेपर भी स्वरूपरूप या वैधर्म्यरूप भेद का अभाव नहीं है, किन्तु अन्योन्याभावरूप भेद का ही अभाव है। कारण अन्योन्याभाव तादात्म्य का निषेध- रूप है, इसलिए तादात्म्य भी अन्योन्याभाव का निषेधरूप है; क्योंकि निषेध्य-निषेध दोनों परस्पर प्रतिक्षेपरूप होते हैं । तब तो अन्योन्याभाव की प्रतीति के बिना तादात्म्य का ज्ञान अशक्य है, कारण निषेधबुद्धि निषेध्यबुद्धि की अपेक्षा करके ही होती है, अतः अन्योन्याश्रय हो जायगा । 'अधिकरणरूप अर्थ के वाचक पद के साथ विशेष्य-विशेषणभाव से व्यवस्थित पद से.अभिधेय अन्योन्याभाव है' यह चतुर्थ कल्प भी 'निर्घटं भूतलं' इस प्रतीति से सिद्ध अत्यन्ताभाव में अतिव्याप्त होने से असङ्गत है ।
५४८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
नापि पञ्चमः ; समानाधिकरण इति प्रतियोगिसमानाधिकरणो विवक्षितः, तादृशश्च निषेधोऽन्योन्याभावः, तत्प्रत्ययश्च तल्लक्षणमित्यस्याप्ययुक्तत्वात् । भावसमानाधिकरणास्यान्योन्याभावस्य 'कुम्भः पटत्वं न भवती'त्यादेरव्यापनात् । तज्जातीयतथात्वं च यं विशेषमन्योन्याभावगतमादाय स्यात्तदेव लक्षणी- भवनसमर्थमुपजीव्यमानमस्य लक्षणस्योपन्यासं प्रत्यादिशति । न च तदपि सम्भवति, अन्योन्याभावसंसर्गाभावभेदखण्डनप्रस्तावे निरस्तत्वात् । प्रकारान्तरस्य चासम्भवात् । न च पटत्वं न भवतीत्ययमेवाभावो घटः पटत्वं न भवतीत्येक एव । एवं प्रतियो- ग्यैक्येन मयाऽत्र तथाऽभ्युपगमादिति क्वचित् प्रतियोगिसमानदेशत्वादपि लक्षण- सिद्धिरिति वाच्यम् । तथापि प्रतियोग्यैक्येन तदत्यन्ताभावस्यैक्यापत्तेः, तादात्म्य- वत्संयोगस्यापि द्विष्टत्वाविशेषादतिव्याप्तेः ।
पञ्चम कल्प भी असङ्गत है । देखिये—यदि 'समानाधिकरण' से प्रतियोगी से समानाधिकरण विवक्षित हो, तो 'प्रतियोगी से समानाधिकरण जो निषेध, तत्प्रतीति' लक्षण हुआ । पर यह असङ्गत है, कारण प्रतियोगी के असमानाधिकरण 'कुम्भः पटत्वं न भवति' इत्याकारक प्रतीतिसिद्ध अन्योन्याभाव में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'प्रतियोगी का समानाधिकरण जो निषेध, तत्प्रतीति-विषयवृत्ति जातीयत्व अन्योन्याभाव है,' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—अन्योन्याभाव में स्थित जिस धर्म का ग्रहण कर उक्त लक्षण करेंगे, उपजीव्य होने से उसी धर्म को लक्षण मानिये । वह लक्षण ही उक्त लक्षण का प्रत्याख्यान कर देगा । फिर, अन्योन्याभाव- संसर्गाभाव के भेद-खण्डन के प्रस्ताव में खण्डित होने से अन्योन्याभावनिष्ठ वैसे किसी धर्म का सम्भव भी नहीं है । इनके अतिरिक्त प्रकारान्तर हो ही नहीं सकता । समर्थन—'पटः पटत्वं न', 'घटः पटत्वं न' इन दो प्रतीतियों के विषय, भेदप्रति- योगियों के एक होने से, एक ही हैं और वह भेद कहीं ( पट में ) प्रतियोगी से समान- धिकरण है । अतः समन्वय होने से यह लक्षण युक्त ही है । खण्डन—यदि प्रतियोगी के एक होने से अभाव एक हो, तो अन्योन्याभाव और संसर्गाभाव भी एक हो जायेंगे । यदि कहें कि 'अन्योन्याभाव का प्रतियोगी तादात्म्य है और वह ( तादात्म्य ) दो में है, अतः दोनों अभाव एक नहीं हैं, तो संसर्ग भी संसर्गाभाव का प्रतियोगी है और वह भी दो में रहता है, अतः दोनों तुल्य ही हैं ।
परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ५०१ कालभेदेन च प्रागभावादेरपि प्रतियोगिसमानाधिकरणतयाऽतिव्याप्तेः, कालैक्येन च विशेषणे च तदन्योन्यव्यतिरेकाव्याप्तेरिति । यदपि धर्मान्तरस्य लक्षणमवादि वैधर्म्यस्य विरोधः, स चैकधर्म्यसमावेश इति । तदप्युद्भ्रान्तमनसो भाषितम्; तथाहि-प्रमाणप्रमेययोर्भेदोऽस्ति न वा ? न चेत्तदभिधानस्य पर्यायत्वप्रसङ्गः, किं प्रामाणिका बुद्धिरित्युक्ते बुद्धिविषयेणो- त्तरप्रसङ्गश्च । नापि प्रथमः ; स हि न तावत्स्वरूपलक्षणः, तुलादिद्रव्यस्य एकस्याप्युभय- भावदर्शनात् । अत एव नान्योन्याभावोऽपि । धर्मान्तरं तु तयोर्भेदः परिशिष्यते, यतोऽन्येन रूपेण तत्प्रमाणमन्येन च तदेव प्रमेयमित्युच्यते । तथाच सत्येकधर्म्य- समावेशो लक्षणमव्यापकम् । सोऽयं 'प्रमेयता च तुलाप्रामाण्यवदि'ति पारमर्षमपि परामर्शं व्यस्मार्षीदित्यास्तां विस्तरः । किञ्च—काल-भेद से प्रागभाव और ध्वंसाभाव भी प्रतियोगी के समानाधिकरण हैं, अतः उनमें अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि 'एक काल में जो प्रतियोगी के साथ समानाधिकरण हो' ऐसा निवेश करें, तो 'कालो न' इत्याकारक प्रतीतिसिद्ध अन्योन्याभाव- में अव्याप्ति हो जायगी । कारण काल में काल न होने से कालान्योन्याभाव कालरूप प्रतियोगी से समानाधिकरण नहीं है । आपने यह जो कहा कि “धर्मान्तर' का लक्षण 'वैधर्म्य का विरोध' है और वह विरोध एकधर्मी में असमावेशरूप है” यह भी भ्रान्त पुरुष का भाषण है । देखिये— प्रमाण, प्रमेय में परस्पर भेद है या नहीं ? यदि नहीं है, तो दोनों पर्याय हो जायेंगे । किञ्च—'बुद्धि में क्या प्रमाण है ?' यह पूछने पर चक्षुरादि को न कहकर प्रमेय का ही अभिधान होने लगेगा । प्रमाण, प्रमेय में भेद है, यह प्रथम पक्ष भी अयुक्त है; कारण तुलादि एक ही द्रव्य प्रमाण और प्रमेय उभयरूप है । अतः उन दोनों में स्वरूप-भेद नहीं हो सकता । प्रमाण और प्रमेय दोनों के एकरूप होने से अन्योन्याभावरूप भेद भी नहीं हो सकता, किन्तु वैधर्म्यरूप में भेद हो सकता है। कारण प्रमितिकरणस्वरूप धर्म से वह (तुलादि) प्रमाण है और प्रमितिविषयत्वरूप धर्म से प्रमेय है। यदि ऐसा है, तो उस वैधर्म्यभेद के उदाहरण-स्थल में एकधर्मी में दोनों का समावेश होने से लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । इस तरह आपने 'प्रमेयता च तुलाप्रामाण्यवत्' इस परम ऋषि गौतम के परामर्श को भी भुला दिया ! अतः इस सम्बन्धमें अधिक विस्तार बस हो ।
५०२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
ननु भेदप्रतिपत्तेस्तावत् प्रत्यक्षफलस्यार्थेन्द्रियसन्निकर्षः कारणमसाधारणं वक्तव्यम् । तत्र य एवेन्द्रियसन्निकर्षस्य भेदप्रतिपत्तिहेतोर्द्वितीयः सम्बन्धी, स एव भेदोऽस्तु । न; उक्तबाधकैर्बाधितायाः प्रतीतेरर्थसन्निकर्षकारणत्वाभावादिति । कारणत्व-लक्षण-खण्डनम् किं पुनस्तत्कारणत्वम् ? पूर्वभावित्वमिति चेन्न । चिरपध्वस्तानामपि कारणत्वप्रसङ्गात् । अव्यवहित- पूर्वभावित्वमिति चेन्न । व्यापारस्यैव कारणत्वप्रसङ्गात् । व्यापारेण न व्यवधानमिति चेन्न । कारणकारणस्यापि कारणत्वप्रसङ्गात् । कारणस्यातद्व्यापारत्वात् नैवमिति चेन्न । विना विशेषोक्तिं तस्य दुर्विषेकत्वात् । समर्थन—प्रत्यक्ष है फल जिसका, ऐसी जो भेद-प्रतिपत्ति, उसका अर्थ और इन्द्रिय-सन्निकर्ष कारण कहना ही होगा । 'भेद-प्रतिपत्तिजनक उसी सन्निकर्ष का इन्द्रिय से भिन्न जो सम्बन्धी है, वह भेद है', ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—पूर्वोक्त युक्तियों से बाधित उक्त प्रतीति को अर्थ-इन्द्रिय-सन्निकर्ष से जन्य मानने में कुछ प्रमाण नहीं है । कारणत्व-लक्षण का खण्डन फिर वह कारणत्व भी क्या वस्तु है, अर्थात् लक्षण न होने से वह अनिर्वचनीय है । समर्थन—कार्य से पूर्ववर्ती कारण है । खंडन—जो पूर्वभावी होता हुआ भी चिर-नष्ट है, अतएव कार्य से सम्बन्धरहित है, उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'कार्य से अव्यवहित पूर्ववर्ती कारण है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—स्वर्ग से अव्यवहित पूर्ववर्ती होने से अदृष्ट ही स्वर्ग का कारण होगा । अर्थात् यागरूप क्रिया, व्यवधान होने से, कारण न हो सकेगी । समर्थन—अपूर्व यागरूप क्रिया का व्यापार है और व्यापार से व्यापारी का व्यवधान नहीं होता, अतः याग में अव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—घट के कारण (कुलाल) का कारण (कुलाल का पिता) भी घट का कारण हो जायगा । समर्थन— घटरूप कार्य में कुलाल अपने पिता का व्यापार नहीं है । खंडन—जबतक व्यापार का लक्षण न हो, तबतक अपूर्व याग का व्यापार है और कुलाल अपने पिता का व्यापार नहीं है, यह कैसे कह सकते हैं ?
परिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५०३ यद्विना यद्यन्न जनयति, तत् तस्यावान्तरव्यापार इति चेन्न । सहकारिणामपि तथात्वप्रसङ्गात् । तज्जन्यमिति चेन्न । तथापि कारणत्वाव्यवस्थितौ विशेषोक्तेरति- प्रसक्तेः । कथमपि विशेषोक्तौ गगनादेः सर्वत्र कार्ये हेतुत्वप्रसङ्गात् । अनन्यथासिद्धपूर्वभावित्वमिति चेन्न । वक्तव्यं हि कस्मादन्येन प्रकारेण विना, का च सिद्धिरिति ? यदि हि कार्यादन्येन प्रकारेण न निष्पत्तिः, तदा- ऽसिद्धिः, नहि कार्येण कारणस्योत्पादनम् । नापि कार्याद्-येन प्रकारेण न ज्ञप्तिः, प्रत्यक्षादेरपि कारणत्वज्ञप्तेः, न खलु सर्वा कार्यलिङ्गजा कारणस्य ज्ञप्तिः । नापि कारणत्वात् व्यतिरिक्तेन प्रकारेण न निष्पत्तिर्ज्ञप्तिर्वा, ज्ञप्तावात्मा- श्रयात् । प्रकारान्तरवत्तयाऽपि च तदुपगमात् । समर्थन---'जो जिसके बिना जिसे उत्पन्न न कर सके, उस कार्य में वह उसका व्यापार है।' कुलाल के बिना भी उसका पिता घट का उत्पादन कर सकता है, अतः कुलाल व्यापार नहीं है। खण्डन - व्यापार का ऐसा लक्षण करने पर चक्ररूप सहकारी कारण भी दण्ड का व्यापार हो जायगा। कारण चक्र के बिना भी दण्ड घट का उत्पादन नहीं कर सकता । समर्थन-जो जिस स्वजन्यके बिना जिसे उत्पन्न न कर सके, उस कार्य में वह उसका व्यापार है। चक्र दण्डजन्य नहीं है, अतः वह व्यापार नहीं होगा। खण्डन - जबतक कारणत्व का लक्षण न हो, तबतक जन्यत्वघटित व्यापार का लक्षण ही हो नहीं सकता। किसी प्रकार व्यापार का लक्षण करें भी, तो कार्यमात्र के अव्यवहित पूर्ववर्ती होने से गगन भी कारण हो जायगा। समर्थन-'अनन्यथासिद्ध पूर्वभावी कारण है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन-कहिये कि किससे अन्य प्रकार के बिना और सिद्धि क्या वस्तु है, अर्थात् सिद्धि शब्द का क्या अर्थ है ? 'कार्य से अन्य प्रकार से निष्पत्ति का अभाव' यह अर्थ हो, तो वह ठीक नहीं । कारण कार्य से कारण की उत्पत्ति नहीं होती । 'कार्य से अन्य प्रकार से ज्ञान का अभाव' यह अर्थ भी नहीं हो सकता; कारण प्रत्यक्ष से भी कारणत्व का ज्ञान होने से सभी कारणों का कार्यों से ज्ञानं होता हो, ऐसा नियम नहीं है। 'कारणत्व से अन्य प्रकार से निष्पत्ति का अभाव या ज्ञान का अभाव' भी अर्थ नहीं हो सकता । कारण स्व में स्व की उत्पत्ति या ज्ञान न होने से आत्माश्रय हो जायगा । किञ्च - दण्डत्वरूप से भी दण्ड का ज्ञान हो सकने से 'कारणत्व से ही कारण का ज्ञान हो' यह कोई नियम नहीं है।
५०२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ ननु भेदप्रतिपत्तेस्तावत् प्रत्यक्षफलस्यार्थेन्द्रियसन्निकर्षः कारणमसाधारणं वक्तव्यम् । तत्र य एवेन्द्रियसन्निकर्षस्य भेदप्रतिपत्तिहेतोर्द्वितीयः सम्बन्धी, स एव भेदोऽस्तु । न; उक्तबाधकैर्बाधितायाः प्रतीतेरर्थसन्निकर्षकारणत्वाभावादिति । कारणत्व-लक्षण-खण्डनम् किं पुनस्तत्कारणत्वम् ? पूर्वभावित्वमिति चेन्न । चिरापध्वस्तानांमपि कारणत्वप्रसङ्गात् । अव्यवहित- पूर्वभावित्वमिति चेन्न । व्यापारस्यैव कारणत्वप्रसङ्गात् । व्यापारेण न व्यवधानमिति चेन्न । कारणकारणस्यापि कारणत्वप्रसङ्गात् । कारणास्यातद्व्यापारत्वात् नैवमिति चेन्न । विना विशेषोक्तिं तस्य दुर्विवेकत्वात् । समर्थन—प्रत्यक्ष है फल जिसका, ऐसी जो भेद-प्रतिपत्ति, उसका अर्थ और इन्द्रिय-सन्निकर्ष कारण कहना ही होगा । 'भेद-प्रतिपत्तिजनक उसी सन्निकर्ष का इन्द्रिय से भिन्न जो सम्बन्धी है, वह भेद है', ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—पूर्वोक्त युक्तियों से बाधित उक्त प्रतीति को अर्थ-इन्द्रिय-संन्निकर्ष से जन्य मानने में कुछ प्रमाण नहीं है । कारणत्व-लक्षण का खण्डन फिर वह कारणत्व भी क्या वस्तु है, अर्थात् लक्षण न होने से वह अनिर्वचनीय है । समर्थन—कार्य से पूर्ववर्ती कारण है । खंडन -- जो पूर्वभावी होता हुआ भी चिर-नष्ट है, अतएव कार्य से सम्बन्धरहित है, उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'कार्य से अव्यवहित पूर्ववर्ती कारण है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—स्वर्ग से अव्यवहित पूर्ववर्ती होने से अदृष्ट ही स्वर्ग का कारण होगा । अर्थात् यागरूप क्रिया, व्यवधान होने से, कारण न हो सकेगी । समर्थन—अपूर्व यागरूप क्रिया का व्यापार है और व्यापार से व्यापारी का व्यवधान नहीं होता, अतः याग में अव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—घट के कारण (कुलाल) का कारण (कुलाल का पिता) भी घट का कारण हो जायगा । समर्थन— घटरूप कार्य में कुलाल अपने पिता का व्यापार नहीं है । खंडन—जबतक व्यापार का लक्षण न हो, तबतक अपूर्व याग का व्यापार है और कुलाल अपने पिता का व्यापार नहीं है, यह कैसे कह सकते हैं ?
परिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५०३ यद्विना यन्न जनयति, तत् तस्यावान्तरव्यापार इति चेन्न। सहकारिणामपि तथात्वप्रसङ्गात् । तज्जन्यमिति चेन्न। तथापि कारणत्वाव्यवस्थितौ विशेषोक्तेरति- प्रसक्तेः । कथमपि विशेषोक्तौ गगनादेः सर्वत्र कार्ये हेतुत्वप्रसङ्गात् । अनन्यथासिद्धपूर्वभावित्वमिति चेन्न । वक्तव्यं हि कस्मादन्येन प्रकारेण विना, का च सिद्धिरिति ? यदि हि कार्यादन्येन प्रकारेण न निष्पत्तिः, तदा- ऽसिद्धिः, नहि कार्येण कारणस्योत्पादनम् । नापि कार्यादन्येन प्रकारेण न ज्ञप्तिः, प्रत्यक्षादेरपि कारणत्वज्ञप्तेः, न खलु सर्वा कार्यलिङ्गजा कारणस्य ज्ञप्तिः । नापि कारणत्वात् व्यतिरिक्तेन प्रकारेण न निष्पत्तिर्ज्ञप्तिर्वा, ज्ञप्तावात्मा- श्रयात् । प्रकारान्तरवत्तयाऽपि च तदुपगमात् । समर्थन--'जो जिसके बिना जिसे उत्पन्न न कर सके, उस कार्य में वह उसका व्यापार है।' कुलाल के बिना भी उसका पिता घट का उत्पादन कर सकता है, अतः कुलाल व्यापार नहीं है । खण्डन - व्यापार का ऐसा लक्षण करने पर चक्ररूप सहकारी कारण भी दण्ड का व्यापार हो जायगा । कारण चक्र के बिना भी दण्ड घट का उत्पादन नहीं कर सकता । समर्थन-जो जिस स्वजन्यके बिना जिसे उत्पन्न न कर सके, उस कार्य में वह उसका व्यापार है। चक्र दण्डजन्य नहीं है, अतः वह व्यापार नहीं होगा। खण्डन - जबतक कारणत्व का लक्षण न हो, तबतक जन्यत्वघटित व्यापार का लक्षण ही हो नहीं सकता। किसी प्रकार व्यापार का लक्षण करें भी, तो कार्यमात्र के अव्यवहित पूर्ववर्ती होने से गगन भी कारण हो जायगा । समर्थन- 'अनन्यथासिद्ध पूर्वभावी कारण है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन-कहिये कि किससे अन्य प्रकार के बिना और सिद्धि क्या वस्तु है, अर्थात् सिद्धि शब्द का क्या अर्थ है ? 'कार्य से अन्य प्रकार से निष्पत्ति का अभाव' यह अर्थ हो, तो वह ठीक नहीं । कारण कार्य से कारण की उत्पत्ति नहीं होती । 'कार्य से अन्य प्रकार से ज्ञान का अभाव' यह अर्थ भी नहीं हो सकता; कारण प्रत्यक्ष से भी कारणत्व का ज्ञान होने से सभी कारणों का कार्यों से ज्ञान होता हो, ऐसा नियम नहीं है । 'कारणत्व से अन्य प्रकार से निष्पत्ति का अभाव या ज्ञान का अभाव' भी अर्थ नहीं हो सकता । कारण स्व में स्व की उत्पत्ति या ज्ञान न होने से आत्माश्रय हो जायगा । किञ्च - दण्डत्वरूप से भी दण्ड का ज्ञान हो सकने से 'कारणत्व से ही कारण का ज्ञान हो' यह कोई नियम नहीं है ।
५०४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ व्यतिरिक्तत्वमकारणत्वमिष्टमिति चेन्न । उक्तदोषानिवृत्तेः, कारणत्वात् पूर्वं चोत्पत्तिज्ञप्त्योरक्षणिकवादिभिरभ्युपगमात् । अव्यवहितपूर्वतया कदाचित्तदपि कारणम् । एवं तत्पूर्वतरमपि, कस्याश्चित् व्यक्तेरनेवम्भावेऽपि तज्जातीयतया तथाभावित्वविवक्षिततया व्यक्तिव्यभिचारा- प्रयोजकत्वादिति चेन्न । कार्यान्तरेऽपि गगनादेरतथाभावस्य विनिगन्तुमशक्य- त्वात् । कालदेशव्यापकताऽन्यथासिद्धिस्थिति तदिति चेन्न । तथा सति शब्दादौ गगनादेरकारणत्वप्रसङ्गात् । एतेन — अनन्यथासिद्धान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वमपि व्युदस्तम् । गगनादे- र्व्यतिरेकाभावात्, अकारणत्वप्रसङ्गश्चाधिकः । व्यापारवत्त्वं कारणत्वमिति चेन्न । तद्धि व्यापारसमवायित्वं वा व्यापार- समर्थन — 'अन्यथा' शब्द का अर्थ व्यतिरिक्तत्व है और वह अकारणत्व है । एवञ्च 'अकारणत्वरूप से जिसका ज्ञान न हो और जो पूर्ववर्ती हो, वह कारण है' यह समुदायार्थ हुआ । खण्डन — कारणत्व के ज्ञान के बिना अकारणत्व का ज्ञान न होने से आत्माश्रय हो जायगा । किञ्च — स्थिरवादी के मत में कारणत्व से पूर्व भी दण्डादि का दण्डत्वादिरूप से ज्ञान होने से दण्डादि में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन — कदाचित् अव्यवहित-पूर्वक्षणवृत्तित्व होने से उससे पूर्वतर काल में भी वह कारण ही है । अर्थात् 'कार्याव्यवहितपूर्वक्षणसम्बन्धानधिकरणत्व' ही कारणत्व है । वह कारणत्व उस काल में भी विद्यमान है। उत्पन्न-विनष्ट तन्तु में कदाचित् भी पूर्व- क्षणवृत्तित्व न होने पर पूर्वक्षणवृत्ति-तन्तुजातीयत्व होने से ही कारणत्व होता है । जातीयत्वनिवेश की विवक्षा से ही एक-एक व्यक्ति में व्यभिचार नहीं होता । खण्डन — तब तो शब्द से अतिरिक्त घटादि में भी गगन कारण हो जायगा । यदि कहें कि देश तथा काल से व्यापक होने से गगन अन्यथासिद्ध है, तो शब्द में भी गगन कारण नहीं होगा । अन्यथासिद्धि का निर्दुष्ट लक्षण न होने से ही 'अनन्यथासिद्ध अन्वय तथा व्यतिरेक के कार्य में जिसका अनुविधान हो, वह कारण है' यह लक्षण भी खण्डित है । किञ्च — गगन का व्यतिरेक न होने से वह शब्द का अकारण हो जायगा । समर्थन — 'जिसमें व्यापार हो वह कारण है' ऐसा लक्षण करेंगे । कार्यान्तर में गगनादि व्यापार न होने से उसमें अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन — व्यापारवत्त्व क्या
परिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५०५ जनकत्वं वा ? नाद्यः ; यागादेरकारणत्वप्रसङ्गात् । नोत्तरः ; तस्यैव निरूप्य- माणत्वात् । नित्यसत्त्वासत्त्वयोरन्यतरप्रसक्तिनिवारकत्वमिति चेन्न । निवारकपदाव- यवस्य प्रत्ययस्य कारणत्वनिर्वचनं विनाऽनिरूप्यमाणार्थत्वात् । अन्यतरार्थ- स्यैकस्य च निरुक्त्यशक्तेः । यदनभ्युपगमे यस्य तत्पूर्वसत्त्वप्रसङ्गः, तत्तस्य कारणम् , तद्भावश्च कारणत्व- मिति चेन्न । भावस्य विनाशित्वानभ्युपगमे तथा प्रसङ्गेनातिव्यापकत्वात् । तत्पूर्वस्थितत्वेन च विशेषणे सहभावनियतस्याभावेऽपि प्रसङ्गः । तथात्वो- क्या है ? क्या व्यापार का समवाय जिसमें हो, वह विवक्षित है या व्यापार का जनक जो हो वह ? प्रथम पक्ष में याग में अपूर्वरूप व्यापार का समवाय न होने से वह कारण न होगा । द्वितीय पक्ष भी अयुक्त है, क्योंकि तब तो कारणत्व के लक्षण में जनकत्व ( कारणत्व ) का प्रवेश हो गया और वह अद्यापि निरूप्य ही है। समर्थन—‘कार्य का जो नित्य सत्त्व या नित्य असत्त्व, दोनों में एक की प्रसक्ति का निवारक ( निवृत्तिजनक ) कारण है’ ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन—यह लक्षण भी कारण-लक्षण में कारण का प्रवेश होने से अयुक्त है। क्योंकि ‘निवारक’ पद में ल्युट् प्रत्यय का अर्थ कर्ता ( कारणविशेष ) है, जो कारणत्व के निर्वचन के बिना अनिरूप्य है । किञ्च—‘अन्यतर’ शब्द का अर्थ यदि अनिर्धारित प्रत्येक, यह करें तो वह भी असंगत है । कारण अनिर्धारित से ‘निर्धारण का अभाव’ विवक्षित हो, तो अभाव के खण्डित होने से वह सम्भव नहीं । यदि ‘दोनों से जो अन्य, उससे अन्यत्व’ यह अर्थ करें तो भेद खण्डित होने से वह भी नहीं कह सकते । समर्थन—जिसके ( कारण के ) अस्वीकार करने पर स्व ( कार्य ) से पूर्वकाल में जिसकी ( कार्य की ) सत्ता की आपत्ति हो, वह उसका कारण है’ ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—यदि ऐसा कहें, तो ‘भाव विनाशयुक्त न होता, तो स्व से पूर्वकाल में होता’ ऐसी आपत्ति संभव होने से विनाश भी कारण हो जायगा । समर्थन—‘जिस पूर्ववर्ती के अनभ्युपगम में कार्य के पूर्वकाल में सत्त्व की आपत्ति हो, वह कारण है’ ऐसा कहेंगे। अर्थात् ‘कार्यपूर्वसत्त्वे सति कार्यपूर्वसत्त्वापादकान- भ्युपगमविषयत्वं कारणत्वम्’ यह कहेंगे । एवञ्च विनाश पूर्वभावी नहीं है, अतः वह कारण नहीं हो सकेगा । खंडन—सहभाव से नियत रूपादि का प्रागभाव भी रस का ६४
५०६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ पगमे सामग्र्यामपि प्रसङ्गः । तस्या अपि च तथात्वोपगमे कार्यद्वयैक्यप्रसङ्गः । असाधारण्यञ्च विशेषापेक्षित्वे, अतिव्याप्तिरविशेषे, भाविपूर्वार्थविकल्पावकाशश्च । नियतप्राग्भावित्वमिति चेन्न । अवश्यम्भावस्य नियमार्थत्वे गगनादेः सर्वकार्य- हेतुत्वप्रसङ्गस्य तदवस्थत्वात् । अवयवरूपादेश्च अवयवितद्रसादिषु कारणत्वप्रसङ्गात् । अनौपाधिकत्वं नियमार्थ इति चेत् । एवं ह्यनौपाधिकपूर्वभावो हेतुत्वमि- त्युक्तं भवति । तथाच पिपीलिकोत्थानादेर्वृष्ट्यादौ जनकत्वप्रसङ्गः, सह- भाविसामग्र्या वा । कारण हो जायगा, क्योंकि 'यदि रूपप्राग्भावो न स्यात्तर्हि स रसपूर्ववर्ती स्यात्' ऐसा आपादन किया जा सकता है। यदि रूप-प्राग्भाव को रस का कारण मान लें, तो रूप की सामग्री भी रस-सामग्री हो जायगी । यदि रूप की सामग्री को रस-सामग्री भी मान लें, क्योंकि पाकज-स्थल में वह कारण होती ही है, तो दोनों कार्यों का ऐक्य हो जायगा। किञ्च—लक्षणघटक यत्-शब्द से यदि दण्डादि विशेष व्यक्ति का ग्रहण करें, तो लक्षण का अननुगम हो जायगा । अर्थात् वह लक्ष्यमात्र का संग्राहक न होगा । एवञ्च जिस कारण व्यक्ति का यत्-शब्द से उपादान करेंगे, उससे अन्यत्र अव्याप्ति हो जायगी । यत्-शब्द से कारणमात्र में वृत्ति एक उपसंग्राहक रूप न होने से कारणमात्र का उपादान नहीं हो सकता । यदि कथञ्चित् यत्-शब्द से सबका उपादान करें ( किसी प्रकार अनुगम कर लें ), तो कारणत्वरूप से अभिमत व्यक्तिमात्र के अनभ्युपगम में कार्यमात्र के पूर्वसत्त्व का भी आपादन संभव होने से कार्यमात्र में वस्तुमात्र कारण हो जायगा । अर्थात् घट में तन्तु भी कारण होने लगेगा । तथाच लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। वक्ष्यमाण पूर्वशब्दार्थ में विकल्प का भी अवकाश है, अर्थात् वक्ष्यमाण विकल्पों के कारण लक्षणघटक पूर्वशब्द के अर्थ का निर्वचन न हो सकने से भी यह लक्षण संभव नहीं है । समर्थन—'जो नियम से पूर्वभावी हो वह कारण है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन— 'नियम' शब्द का अवश्यम्भाव अर्थ करें, तो गगन आदि नित्य पदार्थ सभी कार्यों के कारण हो जायेंगे । साथ ही अवयव का रूप अवयवी के रस का भी कारण हो जायगा । समर्थन—नियम शब्द का, उपाधिरहितत्व अर्थ करेंगे । अर्थात् कार्य के साथ अविनाभावेन पूर्ववृत्तित्व कारणत्व है । एवञ्च पूर्वोक्त अतिव्याप्ति न होगी । खंडन— यदि ऐसा कहें तो पिपीलिकोत्थान भी वृष्टि का कारण हो जायगा । इसी तरह रूप की सामग्री रस का कारण हो जायगी ।
'परिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५०७ न तत्र प्राचि पूर्वभावो नियतः, किन्तु वृष्टेः परं भाव इति चेन्न । प्राग्रूपाणामेव नियतत्त्वात् । तानि कारणमेवेति चेन्न । निदानप्राग्रूपसाङ्कर्य- प्रसङ्गात् । पूर्वार्थश्च वक्तव्यः । पूर्वकालसम्बन्धित्वं पूर्वत्वमिति चेन्न । कालस्याकारणत्वप्रसङ्गात् । तस्यापि किं पूर्वत्वमिति विवेचनीयत्वात् । अतीतोपाध्यवच्छिन्नत्वं तस्य पूर्वत्वमिति चेन्न । अतीत इति निष्ठान्तस्य पूर्वकालवाचिनो विवेचनीयत्वात् । परत्वापरत्वयोर्युगयोर्मध्ये यत्परत्वं तत्पूर्वत्व- समर्थन—पिपीलिकाण्ड-संचार में वृष्टि का पूर्वभाव नियत नहीं है, कारण उसके बिना भी वृष्टि देखी गयी है । अतः उसमें अतिव्याप्ति नहीं होगी । वृष्टि में पिपी- लिका के अण्डों के संचार का परभाव नियत है, यह अलग बात है, कारण उसका प्रकृत लक्षण में कुछ उपयोग नहीं है । खण्डन—रोग-प्राग्रूप में भी निरुपाधिक रोग का पूर्वभावित्व है, अतः वह भी कारण होने लगेगा । प्राग्रूप कारण ही है, ऐसी इष्टा- पत्ति नहीं कह सकते, कारण निदान और प्राग्रूप का साङ्कर्य हो जायगा, वैद्यक शास्त्र में इनको भिन्न-भिन्न कहा गया है¹ । किञ्च—लक्षणघटक ‘पूर्व’ शब्द का अर्थ भी कहना होगा । समर्थन—पूर्वकाल में सम्बन्धी को पूर्व कहते हैं । खंडन—काल में पूर्वकाल का सम्बन्ध न होने से काल कारण न कहलायेगा । किञ्च—काल में पूर्वत्व क्या वस्तु है, इसका भी विचार करना चाहिए । समर्थन—अतीत जो उपाधि उससे अवच्छिन्नत्व (युक्तत्व) ही कालमें पूर्वत्व है । खण्डन—‘अतीत’ इस पद में ‘निष्ठा’ का अर्थ भी पूर्वकाल ही है, अतः आत्मा- श्रय हो जायगा । कारण काल में पूर्वत्व का विवेक काल से ही होगा । समर्थन—‘नियतपूर्ववृत्तित्व कारणत्व है’ इस लक्षण में पूर्वशब्द परत्व गुणपरक है । १. ‘माधव-निदान’ में कहा गया है कि निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय और संप्राप्ति ये व्यस्त और समस्त रूपों से व्याधि के बोधक हैं । यथा— ‘निदानं पूर्वरूपाणि रूपाण्युपशयस्तथा । सम्प्राप्तिश्चेति विज्ञानं रोगाणां पञ्चधा स्मृतम् ॥’ जिस व्याधि का जो रूप है, वही अङ्कुरूप होने से जब अधिक व्यक्त नहीं होता, वह पूर्वरूप है !
मुच्यत इति चेन्न । कालादौ गुणादौ च तदनङ्गीकारात् तेषामकारणत्वप्रसङ्गात् । तस्मिन्नेव च तदभावात् , साक्षात्कारिज्ञानादावपि तस्याकारणत्वप्रसङ्गात् । सामग्रीकदेशत्वं कारणत्वमिति चेन्न । एकदेशत्वस्यानिर्वचनीयत्वात् । अवयवत्व-प्रदेशत्वादीनां सामग्रयामसंभवात् । सकलकारणकलापसमवधानस्यैव च मेलकार्थत्वात् तेनैव तन्निर्वचनीयत्वात् । यदनन्तरं कार्यं भवत्येव, सा सामग्रीति चेन्न । विभागानन्तरं संयोगनाशस्य अवश्योत्पत्तेर्विभागस्यापि सामग्रीत्वप्रसङ्गात् । एवं कर्मणो विभागेऽन्त्य- तन्तुसंयोगस्य पटे इत्यादि । कार्यकारणभावो नाम सम्बन्धः कोऽपीति चेत् । न ; तदाऽविशेषेण कार्य- कारणसाङ्कर्यापत्तेः । कार्यकारणविशेषितत्वाद्भेदे तयोः पृथक् निर्वाच्यत्वापत्तेः । खंडन—कालादि और गुणादि में परत्व के न होने से वे अकारण हो जायेंगे। यदि कालादि और गुणादि में परत्व को मान भी लें, तो अनवस्था के भय से परत्व में परत्व को तो मानेंगे नहीं, अतः उसमें अव्याप्ति हो जायगी। फिर परत्वविषयक साक्षात्कार का भी परत्व कारण होता है। समर्थन—'सामग्री का एकदेश कारण है' ऐसा लक्षण करेंगे। खण्डन—'एक- देश' शब्द के अर्थ का निर्वचन न होने से यह लक्षण युक्त नहीं है। कारण एकदेश शब्द के अवयव, प्रदेश आदि अर्थ अन्यत्र ( घटादि स्थलों में ) होते हैं, किन्तु उन अर्थों का सामग्री में सम्भव नहीं है; क्योंकि सामग्री निरवयव होती है। किञ्च— सम्पूर्ण कारणों का समुदाय ही सामग्री है, अतः सामग्री-घटित कारण को लक्षण कहने पर अन्योन्याश्रय हो जायगा। समर्थन—'जिसके अनन्तर कार्य होता ही हो, वह सामग्री है।' खंडन—विभाग के अनन्तर संयोग-नाश अवश्य होता है, अतः विभाग भी संयोगनाश की सामग्री हो जायगा। इसी प्रकार कर्म भी विभाग का और अन्त्य तन्तुसंयोग भी पट का सामग्री हो जायगा। समर्थन—संयोग-समवाय से भिन्न सम्बन्धविशेष को कार्यकारणभाव कहते हैं और तादृश सम्बन्धाधिकरणत्व ही कारणत्व है। खण्डन—यदि कार्यकारणभाव को सम्बन्धरूप मानेंगे, तो सम्बन्ध द्विष्ठ होता है; अतः कार्य ही कारण हो जायगा। यदि कार्य-सम्बन्धित्व को कारणत्व और कारणसम्बन्धित्व को कार्यत्व कहें, तो दोनों का पृथक्-पृथक् निर्वचन करना होगा।
परिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५०६ कारणत्वं धर्मः कोऽपीति चेन्न । तत्सद्भावे प्रमाणस्य वाच्यत्वात् । क्वचित्प्रत्यक्षः सः, क्वचित् दृष्टानुमेय इति चेन्न । किं हि प्रति कारणतां प्रत्यक्षमुलिखेत् ? न तावदनिर्लुंठितकार्यम् ; अप्रतीतेः, अन्वयव्यतिरेकादे- र्व्यञ्जकस्य च विशेषं प्रत्येव सम्भवात् । नापि सामान्यतो घटादि प्रति; एवं विशेषतो घटाद्यनुत्पत्त्यापत्तेः । ताव- न्मात्रात् विशेषोत्पत्ते र्विशेषेषु विनिगमना न स्यात् । प्रतिविशेषं चोत्पत्तेः प्राग्वर्तमानत्वादसन्निकर्षाद्यक्षविषयतानुपपत्तेः । समर्थन—कारणत्व कारणवृत्ति कोई ( विशेषरूप से अनिर्वचनीय ) धर्म है । अर्थात् कार्यतावच्छेदक और कारणतावच्छेदक से भिन्न पदार्थान्तर है । वह कारणत्व- रूप अखण्डोपाधि से अनुगत कारणपद का शक्यतावच्छेदक है । खण्डन—उस कारणत्व के सद्भाव में प्रमाण कहना होगा, पर कोई प्रमाण नहीं है । समर्थन—दण्डादि प्रत्यक्षपदार्थनिष्ठ कारणत्व तो प्रत्यक्ष ही है और परमाणु आदि निष्ठ कारणत्व अनुमेय है । खंडन—कारणत्व को विषय करनेवाला प्रत्यक्ष केवल ( निष्प्रतियोगिक ) कारणत्व को विषय करता है अथवा कार्यत्व से युक्त ( सप्रति- योगिक ) कारणत्व को ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है; क्योंकि केवल ( कार्यत्व से अयुक्त ) कारणत्व की प्रतीति नहीं होती । किञ्च—प्रत्यक्ष का सहकारी अन्वय-व्यति- रेक भी कार्य-विशेष से युक्त कारणत्व में ही रहता है, केवल कारणत्व में नहीं । द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं, क्योंकि उक्त प्रतीति सामान्यतः कार्यत्वनिरूपित कारणत्व का उल्लेख नहीं करती । अन्यथा प्रमाण न होने से घटादि विशेष कार्य की कारणता ही सिद्ध नहीं होगी । फिर कारण न होने से घटादि विशेष व्यक्ति उत्पन्न भी होंगे । यदि सामान्यतः कार्यत्व से निरूपित कारण से विशेष की उत्पत्ति मानें, तो वह उत्पत्स्यमान घटादि इसी दण्ड से जन्य है, ऐसा निश्चय नहीं होगा । अतः विशेष घट के जननार्थ कारण-विशेष में प्रवृत्ति नहीं होगी । यदि कहें कि कार्य-विशेष से निरूपित कारणता का उल्लेख प्रत्यक्ष करता है, तो यह विकल्प होता है कि उत्पत्ति से पूर्वकाल में उक्त कारणता का ज्ञान होता है या उत्पत्ति से उत्तरकाल में ? यदि कहें कि उत्पत्ति से पूर्वकाल में, तो उस काल में कार्य है नहीं, अतः कार्यत्वनिरूपित कारणत्वरूप विशिष्ट न होने से—विषय-सन्निकर्ष