खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 521, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ५०१ कालभेदेन च प्रागभावादेरपि प्रतियोगिसमानाधिकरणतयाऽतिव्याप्तेः, कालैक्येन च विशेषणे च तदन्योन्यव्यतिरेकाव्याप्तेरिति । यदपि धर्मान्तरस्य लक्षणमवादि वैधर्म्यस्य विरोधः, स चैकधर्म्यसमावेश इति । तदप्युद्भ्रान्तमनसो भाषितम्; तथाहि-प्रमाणप्रमेययोर्भेदोऽस्ति न वा ? न चेत्तदभिधानस्य पर्यायत्वप्रसङ्गः, किं प्रामाणिका बुद्धिरित्युक्ते बुद्धिविषयेणो- त्तरप्रसङ्गश्च । नापि प्रथमः ; स हि न तावत्स्वरूपलक्षणः, तुलादिद्रव्यस्य एकस्याप्युभय- भावदर्शनात् । अत एव नान्योन्याभावोऽपि । धर्मान्तरं तु तयोर्भेदः परिशिष्यते, यतोऽन्येन रूपेण तत्प्रमाणमन्येन च तदेव प्रमेयमित्युच्यते । तथाच सत्येकधर्म्य- समावेशो लक्षणमव्यापकम् । सोऽयं 'प्रमेयता च तुलाप्रामाण्यवदि'ति पारमर्षमपि परामर्शं व्यस्मार्षीदित्यास्तां विस्तरः । किञ्च—काल-भेद से प्रागभाव और ध्वंसाभाव भी प्रतियोगी के समानाधिकरण हैं, अतः उनमें अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि 'एक काल में जो प्रतियोगी के साथ समानाधिकरण हो' ऐसा निवेश करें, तो 'कालो न' इत्याकारक प्रतीतिसिद्ध अन्योन्याभाव- में अव्याप्ति हो जायगी । कारण काल में काल न होने से कालान्योन्याभाव कालरूप प्रतियोगी से समानाधिकरण नहीं है । आपने यह जो कहा कि “धर्मान्तर' का लक्षण 'वैधर्म्य का विरोध' है और वह विरोध एकधर्मी में असमावेशरूप है” यह भी भ्रान्त पुरुष का भाषण है । देखिये— प्रमाण, प्रमेय में परस्पर भेद है या नहीं ? यदि नहीं है, तो दोनों पर्याय हो जायेंगे । किञ्च—'बुद्धि में क्या प्रमाण है ?' यह पूछने पर चक्षुरादि को न कहकर प्रमेय का ही अभिधान होने लगेगा । प्रमाण, प्रमेय में भेद है, यह प्रथम पक्ष भी अयुक्त है; कारण तुलादि एक ही द्रव्य प्रमाण और प्रमेय उभयरूप है । अतः उन दोनों में स्वरूप-भेद नहीं हो सकता । प्रमाण और प्रमेय दोनों के एकरूप होने से अन्योन्याभावरूप भेद भी नहीं हो सकता, किन्तु वैधर्म्यरूप में भेद हो सकता है। कारण प्रमितिकरणस्वरूप धर्म से वह (तुलादि) प्रमाण है और प्रमितिविषयत्वरूप धर्म से प्रमेय है। यदि ऐसा है, तो उस वैधर्म्यभेद के उदाहरण-स्थल में एकधर्मी में दोनों का समावेश होने से लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । इस तरह आपने 'प्रमेयता च तुलाप्रामाण्यवत्' इस परम ऋषि गौतम के परामर्श को भी भुला दिया ! अतः इस सम्बन्धमें अधिक विस्तार बस हो ।