भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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५४८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ

नापि पञ्चमः ; समानाधिकरण इति प्रतियोगिसमानाधिकरणो विवक्षितः, तादृशश्च निषेधोऽन्योन्याभावः, तत्प्रत्ययश्च तल्लक्षणमित्यस्याप्ययुक्तत्वात् । भावसमानाधिकरणास्यान्योन्याभावस्य 'कुम्भः पटत्वं न भवती'त्यादेरव्यापनात् । तज्जातीयतथात्वं च यं विशेषमन्योन्याभावगतमादाय स्यात्तदेव लक्षणी- भवनसमर्थमुपजीव्यमानमस्य लक्षणस्योपन्यासं प्रत्यादिशति । न च तदपि सम्भवति, अन्योन्याभावसंसर्गाभावभेदखण्डनप्रस्तावे निरस्तत्वात् । प्रकारान्तरस्य चासम्भवात् । न च पटत्वं न भवतीत्ययमेवाभावो घटः पटत्वं न भवतीत्येक एव । एवं प्रतियो- ग्यैक्येन मयाऽत्र तथाऽभ्युपगमादिति क्वचित् प्रतियोगिसमानदेशत्वादपि लक्षण- सिद्धिरिति वाच्यम् । तथापि प्रतियोग्यैक्येन तदत्यन्ताभावस्यैक्यापत्तेः, तादात्म्य- वत्संयोगस्यापि द्विष्टत्वाविशेषादतिव्याप्तेः ।

पञ्चम कल्प भी असङ्गत है । देखिये—यदि 'समानाधिकरण' से प्रतियोगी से समानाधिकरण विवक्षित हो, तो 'प्रतियोगी से समानाधिकरण जो निषेध, तत्प्रतीति' लक्षण हुआ । पर यह असङ्गत है, कारण प्रतियोगी के असमानाधिकरण 'कुम्भः पटत्वं न भवति' इत्याकारक प्रतीतिसिद्ध अन्योन्याभाव में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'प्रतियोगी का समानाधिकरण जो निषेध, तत्प्रतीति-विषयवृत्ति जातीयत्व अन्योन्याभाव है,' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—अन्योन्याभाव में स्थित जिस धर्म का ग्रहण कर उक्त लक्षण करेंगे, उपजीव्य होने से उसी धर्म को लक्षण मानिये । वह लक्षण ही उक्त लक्षण का प्रत्याख्यान कर देगा । फिर, अन्योन्याभाव- संसर्गाभाव के भेद-खण्डन के प्रस्ताव में खण्डित होने से अन्योन्याभावनिष्ठ वैसे किसी धर्म का सम्भव भी नहीं है । इनके अतिरिक्त प्रकारान्तर हो ही नहीं सकता । समर्थन—'पटः पटत्वं न', 'घटः पटत्वं न' इन दो प्रतीतियों के विषय, भेदप्रति- योगियों के एक होने से, एक ही हैं और वह भेद कहीं ( पट में ) प्रतियोगी से समान- धिकरण है । अतः समन्वय होने से यह लक्षण युक्त ही है । खण्डन—यदि प्रतियोगी के एक होने से अभाव एक हो, तो अन्योन्याभाव और संसर्गाभाव भी एक हो जायेंगे । यदि कहें कि 'अन्योन्याभाव का प्रतियोगी तादात्म्य है और वह ( तादात्म्य ) दो में है, अतः दोनों अभाव एक नहीं हैं, तो संसर्ग भी संसर्गाभाव का प्रतियोगी है और वह भी दो में रहता है, अतः दोनों तुल्य ही हैं ।