भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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रिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४६६ थमे क्षणे कार्यद्रव्यस्यैकस्यापि स्वातादात्म्यप्रसङ्गात् । वैशेषिकमते व्युत्थाने वैकत्वे तदभावप्रसङ्गात् । उपाधिभिन्नाववलम्बि च तादात्म्यं कथं स्वरूप- मात्रावलम्बेनैकत्वीकर्तुं शक्यम्, विचित्रप्रतिपत्तिकत्वात् । नापि द्वितीयः ; तस्यापि धर्मान्तरापेक्षयाऽनवस्थापातात्, अनपेक्षायां स्वातादात्म्यप्रसङ्गात् । नापि द्वितीयः ; स हि भेदस्याभावो भवन्नप्यन्योन्याभावस्यैव स्यात्, अन्योन्याभावस्य च तत्प्रतिषेधात्मकत्वात् तेनाप्यन्योन्याभावप्रतिषेधात्मना भवितव्यम् ; परस्परप्रतिषेधात्मकत्वान्निषेध्यनिषेधयोः । तथाच सति अन्योन्या- भावप्रतीतिमन्तरेण तन्निरूपणमशक्यं निषेध्यप्रतीतिसापेक्षत्वान्निषेधबुद्धे- रित्यन्योन्याश्रयः । नापि तुरीयः ; 'निर्घटं भूतलमित्यत्रापि प्रसङ्गात् । सिद्धान्त के अनुसार गुण में संख्या के तादात्म्य का अभाव हो जायगा । प्रथम क्षण में एक कार्यद्रव्य में भी स्व का अतादात्म्य हो जायगा । यदि 'गुणे गुणानङ्गीकारः' इस वैशेषिक सिद्धान्त को न भी मानें, तो भी अनवस्था के भय से एकत्व में एकत्व न होने से एकत्व में तादात्म्य का अभाव हो जायगा । किंच-भिन्न-भिन्न धर्मों में स्थित नानारूप तादात्म्य का, एकत्व में एक अनुगमकरूप न होने से, स्वरूपमात्र के प्रतिपादक एकत्व-शब्द से कथन कैसे होगा ? कारण अनुगमक एकरूप न होने से एकत्व की प्रतिपत्ति विभिन्नविषयक है । एकत्व धर्मरूप है, यह द्वितीय कल्प भी अयुक्त है, कारण धर्म में धर्म मानें, तो अनवस्था हो जायगी । यदि धर्म में धर्म न मानें, तो उस धर्म का अतादात्म्य हो जायगा । भेद का अभाव तादात्म्य है, यह द्वितीय कल्प भी अयुक्त है। कारण तादात्म्य भेद का अभाव होनेपर भी स्वरूपरूप या वैधर्म्यरूप भेद का अभाव नहीं है, किन्तु अन्योन्याभावरूप भेद का ही अभाव है। कारण अन्योन्याभाव तादात्म्य का निषेध- रूप है, इसलिए तादात्म्य भी अन्योन्याभाव का निषेधरूप है; क्योंकि निषेध्य-निषेध दोनों परस्पर प्रतिक्षेपरूप होते हैं । तब तो अन्योन्याभाव की प्रतीति के बिना तादात्म्य का ज्ञान अशक्य है, कारण निषेधबुद्धि निषेध्यबुद्धि की अपेक्षा करके ही होती है, अतः अन्योन्याश्रय हो जायगा । 'अधिकरणरूप अर्थ के वाचक पद के साथ विशेष्य-विशेषणभाव से व्यवस्थित पद से.अभिधेय अन्योन्याभाव है' यह चतुर्थ कल्प भी 'निर्घटं भूतलं' इस प्रतीति से सिद्ध अत्यन्ताभाव में अतिव्याप्त होने से असङ्गत है ।