खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ तर्हीदं लक्षणम् ? न तावत्समानाधिकरणो यो निषेधस्तत्प्रत्ययो यस्तस्य यो विषयः, सोऽन्योन्याभाव इति । नापि स एवान्योन्याभाव इति । नापि यत्र समानाधिकरणो निषेधप्रत्ययस्तत्र योऽस्ति सोऽन्योन्याभाव इत्यस्तु, तद्धर्मस्य सर्वस्यान्योन्याभावत्वापातात्, समानाधिकरणवैयर्थ्यप्रसङ्गाच्च। एतेनैकमुदाहरणमादाय द्वितीयोऽपि निरस्तः । नापि तृतीयः ; तादात्म्यप्रतिसन्धानव्यतिरेकेण तत्प्रतियोगिकत्वस्य प्रत्येतु- मशक्यतया तन्निर्वचनप्रसङ्गात् । तच्चाशक्यम् । तथाहि—तदेकत्वं वा भेदाभावो वा ? स्वरूपं त्वसम्भावितम्, तस्य भेदत्वोपगमात्, तस्मिन् दृष्टेऽपि तन्न वेति तादात्म्यसंशयानवकाशापत्तेः । आद्येऽपि संख्याविशेषो वा धर्मान्तरं वा ? नाद्यः ; गुणादौ तदभावप्रसङ्गात् । यह लक्षण तो ‘चन्द्रे मुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ इस प्रतीति के विषय अत्यन्ताभाव में अतिव्याप्त होने से असङ्गत है । ‘उक्त प्रतीति ही अन्योन्याभाव है’, यह लक्षण भी उक्त प्रतीति के अविषय अन्योन्याभाव में अव्याप्त होने से असङ्गत है । ‘समानाधिकरण निषेध-प्रत्यय जिसमें हो, उसका धर्म अन्योन्याभाव है’, यह लक्षण भी युक्त नहीं । कारण घटादिनिष्ठ धर्ममात्र अन्योन्याभाव हो जायगा । किञ्च— पटनिष्ठ अत्यन्ताभाव में समन्वय होने से उसकी व्यावृत्ति के लिए दिया गया ‘समाना- धिकरण’ पद व्यर्थ हो जायगा । ‘समानाधिकरण’ पद का अर्थ एकाश्रयं है, यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं । कारण ‘चन्द्रे मुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ यहाँ अत्यन्ताभाव में अतिव्याप्ति हो जायगी । ‘तादात्म्य है प्रतियोगी जिसका, वह अन्योन्याभाव है’ यह तृतीय कल्प भी युक्त नहीं है, कारण जबतक तादात्म्य का ज्ञान न हो, तबतक तत्प्रतियोगिक अभाव का ज्ञान अशक्य है । अतः प्रथम तादात्म्य का निर्वचन करना होगा, किन्तु वह असंभव है । देखिये—क्या तादात्म्य एकत्व है या भेदाभाव है ? स्वरूपरूप तो तादात्म्य हो नहीं सकता, कारण स्वरूप भेद है और तादात्म्य भेद का अभावरूप है । किंच यदि तादात्म्य को स्वरूपरूप मानें, तो स्वरूप के प्रत्यक्ष होने पर ‘तत् न वा’ ऐसा तादात्म्य-भ्रम नहीं होना चाहिए । फिर, तादात्म्य एकत्वरूप है, इस प्रथम कल्प में भी वह एकत्व संख्यारूप है या अन्य धर्मरूप है ? संख्यारूप नहीं हो सकता, कारण ‘गुणे गुणानङ्गीकारः’ इस