भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 517, कुल 610 में से

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पृष्ठ 517

यत् अन्यत्वस्यं स्वरूपभेदत्वे आत्माश्रयः, सर्वस्वरूपाणां लक्ष्यत्वात् । अन्यो- न्याभावत्वे चान्योन्याश्रयः, वैधर्म्ये च चक्रकम् । यदपि—इतरेतराभावस्य लक्षणमबाधितः समानाधिकरणो निषेधप्रत्ययः । एतदप्यशोभनम् ; समानाधिकरण इत्यादि भाषायाः कथं कथमपि तात्पर्यं- गवेषणेऽपि समानाधिकरणो यो निषेधस्तत्प्रत्ययविषयोऽन्योन्याभाव इति पर्यवसाने समानाधिकरण इति किं तुल्याश्रयः , उतैकाश्रयः, उत तादात्म्यप्रति- योगिकः, उत अधिकरणभूतपदार्थवाचिशब्दविशेषणविशेष्यभावव्यवस्थितपदा- भिधेयः , उत अन्यदेव ? तत्र न प्रथमः ; तुहिनमयूखे प्रियामुखे च न दूषणकणस्यापि सम्भव इति प्रत्ययस्यापि दर्शनात् । तत्र मुखचन्द्रयोरन्योन्याभावोऽस्तीति चेन्न । तस्य सत्त्वेऽप्युक्तप्रत्ययस्य तदविषयत्वात् । माऽस्तु तद्विषयो लक्षणं त्वस्यैतत्, तच्च तद्विषयत्वेऽप्यदुष्टमिति चेत्; कीदृशं से स्वरूप-भेद का और स्वरूप-भेद से अन्योन्याभाव का निरूपण होने से चक्रक हो जायगा । ‘इतरेतराभाव’ का जो ‘अबाधित और समानाधिकरण निषेधप्रत्यय’ यह लक्षण है, वह भी अशोभन है। ‘समानाधिकरण’ इत्यादि शब्दों के अभिप्राय का किसी प्रकार अन्वेषण करने पर ‘समानाधिकरण जो निषेध, उसकी प्रतीति का विषय अन्योन्याभाव है’ ऐसा लक्षणार्थ निश्चित होता है। वहाँ ‘समानाधिकरण’ शब्द का अर्थ क्या तुल्याश्रय है, एकाश्रय है, तादात्म्य-प्रतियोगिकत्व है, अधिकरणभूत जो पदार्थ तद्वाचक शब्द के विशेष्य-विशेषणभाव से स्थित पद से अभिधेयत्व है या अन्य ही कुछ अर्थ है ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारण ‘चन्द्रे स्त्रीमुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ इस प्रतीति के विषय अत्यन्ताभाव में अतिव्याप्ति हो जायगी। ‘वहाँ मुख और चन्द्र में परस्पर भेद ही है, अतः वह लक्ष्य ही है’ ऐसा नहीं कह सकते, कारण मुख और चन्द्र का भेद होने पर भी वह ‘चन्द्रे मुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ इस प्रतीति का विषय नहीं है । समर्थन—‘चन्द्रे मुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ इस प्रतीति का विषय भेद न हो, तो हानि क्या है, कारण यह अन्योन्याभाव का लक्षण है। वह लक्षण ‘मुखं न चन्द्रः’ इस प्रतीति को ग्रहण कर उक्त भेद में समन्वित होने से दुष्ट नहीं है। खण्डन— कैसा वह लक्षण है ? ‘समानाधिकरण जो निषेध, तत् प्रतीतिविषय अन्योन्याभाव है’ ६३

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