भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 530

मुच्यत इति चेन्न । कालादौ गुणादौ च तदनङ्गीकारात् तेषामकारणत्वप्रसङ्गात् । तस्मिन्नेव च तदभावात् , साक्षात्कारिज्ञानादावपि तस्याकारणत्वप्रसङ्गात् । सामग्रीकदेशत्वं कारणत्वमिति चेन्न । एकदेशत्वस्यानिर्वचनीयत्वात् । अवयवत्व-प्रदेशत्वादीनां सामग्रयामसंभवात् । सकलकारणकलापसमवधानस्यैव च मेलकार्थत्वात् तेनैव तन्निर्वचनीयत्वात् । यदनन्तरं कार्यं भवत्येव, सा सामग्रीति चेन्न । विभागानन्तरं संयोगनाशस्य अवश्योत्पत्तेर्विभागस्यापि सामग्रीत्वप्रसङ्गात् । एवं कर्मणो विभागेऽन्त्य- तन्तुसंयोगस्य पटे इत्यादि । कार्यकारणभावो नाम सम्बन्धः कोऽपीति चेत् । न ; तदाऽविशेषेण कार्य- कारणसाङ्कर्यापत्तेः । कार्यकारणविशेषितत्वाद्भेदे तयोः पृथक् निर्वाच्यत्वापत्तेः । खंडन—कालादि और गुणादि में परत्व के न होने से वे अकारण हो जायेंगे। यदि कालादि और गुणादि में परत्व को मान भी लें, तो अनवस्था के भय से परत्व में परत्व को तो मानेंगे नहीं, अतः उसमें अव्याप्ति हो जायगी। फिर परत्वविषयक साक्षात्कार का भी परत्व कारण होता है। समर्थन—'सामग्री का एकदेश कारण है' ऐसा लक्षण करेंगे। खण्डन—'एक- देश' शब्द के अर्थ का निर्वचन न होने से यह लक्षण युक्त नहीं है। कारण एकदेश शब्द के अवयव, प्रदेश आदि अर्थ अन्यत्र ( घटादि स्थलों में ) होते हैं, किन्तु उन अर्थों का सामग्री में सम्भव नहीं है; क्योंकि सामग्री निरवयव होती है। किञ्च— सम्पूर्ण कारणों का समुदाय ही सामग्री है, अतः सामग्री-घटित कारण को लक्षण कहने पर अन्योन्याश्रय हो जायगा। समर्थन—'जिसके अनन्तर कार्य होता ही हो, वह सामग्री है।' खंडन—विभाग के अनन्तर संयोग-नाश अवश्य होता है, अतः विभाग भी संयोगनाश की सामग्री हो जायगा। इसी प्रकार कर्म भी विभाग का और अन्त्य तन्तुसंयोग भी पट का सामग्री हो जायगा। समर्थन—संयोग-समवाय से भिन्न सम्बन्धविशेष को कार्यकारणभाव कहते हैं और तादृश सम्बन्धाधिकरणत्व ही कारणत्व है। खण्डन—यदि कार्यकारणभाव को सम्बन्धरूप मानेंगे, तो सम्बन्ध द्विष्ठ होता है; अतः कार्य ही कारण हो जायगा। यदि कार्य-सम्बन्धित्व को कारणत्व और कारणसम्बन्धित्व को कार्यत्व कहें, तो दोनों का पृथक्-पृथक् निर्वचन करना होगा।