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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

मुच्यत इति चेन्न । कालादौ गुणादौ च तदनङ्गीकारात् तेषामकारणत्वप्रसङ्गात् । तस्मिन्नेव च तदभावात् , साक्षात्कारिज्ञानादावपि तस्याकारणत्वप्रसङ्गात् । सामग्रीकदेशत्वं कारणत्वमिति चेन्न । एकदेशत्वस्यानिर्वचनीयत्वात् । अवयवत्व-प्रदेशत्वादीनां सामग्रयामसंभवात् । सकलकारणकलापसमवधानस्यैव च मेलकार्थत्वात् तेनैव तन्निर्वचनीयत्वात् । यदनन्तरं कार्यं भवत्येव, सा सामग्रीति चेन्न । विभागानन्तरं संयोगनाशस्य अवश्योत्पत्तेर्विभागस्यापि सामग्रीत्वप्रसङ्गात् । एवं कर्मणो विभागेऽन्त्य- तन्तुसंयोगस्य पटे इत्यादि । कार्यकारणभावो नाम सम्बन्धः कोऽपीति चेत् । न ; तदाऽविशेषेण कार्य- कारणसाङ्कर्यापत्तेः । कार्यकारणविशेषितत्वाद्भेदे तयोः पृथक् निर्वाच्यत्वापत्तेः । खंडन—कालादि और गुणादि में परत्व के न होने से वे अकारण हो जायेंगे। यदि कालादि और गुणादि में परत्व को मान भी लें, तो अनवस्था के भय से परत्व में परत्व को तो मानेंगे नहीं, अतः उसमें अव्याप्ति हो जायगी। फिर परत्वविषयक साक्षात्कार का भी परत्व कारण होता है। समर्थन—'सामग्री का एकदेश कारण है' ऐसा लक्षण करेंगे। खण्डन—'एक- देश' शब्द के अर्थ का निर्वचन न होने से यह लक्षण युक्त नहीं है। कारण एकदेश शब्द के अवयव, प्रदेश आदि अर्थ अन्यत्र ( घटादि स्थलों में ) होते हैं, किन्तु उन अर्थों का सामग्री में सम्भव नहीं है; क्योंकि सामग्री निरवयव होती है। किञ्च— सम्पूर्ण कारणों का समुदाय ही सामग्री है, अतः सामग्री-घटित कारण को लक्षण कहने पर अन्योन्याश्रय हो जायगा। समर्थन—'जिसके अनन्तर कार्य होता ही हो, वह सामग्री है।' खंडन—विभाग के अनन्तर संयोग-नाश अवश्य होता है, अतः विभाग भी संयोगनाश की सामग्री हो जायगा। इसी प्रकार कर्म भी विभाग का और अन्त्य तन्तुसंयोग भी पट का सामग्री हो जायगा। समर्थन—संयोग-समवाय से भिन्न सम्बन्धविशेष को कार्यकारणभाव कहते हैं और तादृश सम्बन्धाधिकरणत्व ही कारणत्व है। खण्डन—यदि कार्यकारणभाव को सम्बन्धरूप मानेंगे, तो सम्बन्ध द्विष्ठ होता है; अतः कार्य ही कारण हो जायगा। यदि कार्य-सम्बन्धित्व को कारणत्व और कारणसम्बन्धित्व को कार्यत्व कहें, तो दोनों का पृथक्-पृथक् निर्वचन करना होगा।

परिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५०६ कारणत्वं धर्मः कोऽपीति चेन्न । तत्सद्भावे प्रमाणस्य वाच्यत्वात् । क्वचित्प्रत्यक्षः सः, क्वचित् दृष्टानुमेय इति चेन्न । किं हि प्रति कारणतां प्रत्यक्षमुलिखेत् ? न तावदनिर्लुंठितकार्यम् ; अप्रतीतेः, अन्वयव्यतिरेकादे- र्व्यञ्जकस्य च विशेषं प्रत्येव सम्भवात् । नापि सामान्यतो घटादि प्रति; एवं विशेषतो घटाद्यनुत्पत्त्यापत्तेः । ताव- न्मात्रात् विशेषोत्पत्ते र्विशेषेषु विनिगमना न स्यात् । प्रतिविशेषं चोत्पत्तेः प्राग्वर्तमानत्वादसन्निकर्षाद्यक्षविषयतानुपपत्तेः । समर्थन—कारणत्व कारणवृत्ति कोई ( विशेषरूप से अनिर्वचनीय ) धर्म है । अर्थात् कार्यतावच्छेदक और कारणतावच्छेदक से भिन्न पदार्थान्तर है । वह कारणत्व- रूप अखण्डोपाधि से अनुगत कारणपद का शक्यतावच्छेदक है । खण्डन—उस कारणत्व के सद्भाव में प्रमाण कहना होगा, पर कोई प्रमाण नहीं है । समर्थन—दण्डादि प्रत्यक्षपदार्थनिष्ठ कारणत्व तो प्रत्यक्ष ही है और परमाणु आदि निष्ठ कारणत्व अनुमेय है । खंडन—कारणत्व को विषय करनेवाला प्रत्यक्ष केवल ( निष्प्रतियोगिक ) कारणत्व को विषय करता है अथवा कार्यत्व से युक्त ( सप्रति- योगिक ) कारणत्व को ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है; क्योंकि केवल ( कार्यत्व से अयुक्त ) कारणत्व की प्रतीति नहीं होती । किञ्च—प्रत्यक्ष का सहकारी अन्वय-व्यति- रेक भी कार्य-विशेष से युक्त कारणत्व में ही रहता है, केवल कारणत्व में नहीं । द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं, क्योंकि उक्त प्रतीति सामान्यतः कार्यत्वनिरूपित कारणत्व का उल्लेख नहीं करती । अन्यथा प्रमाण न होने से घटादि विशेष कार्य की कारणता ही सिद्ध नहीं होगी । फिर कारण न होने से घटादि विशेष व्यक्ति उत्पन्न भी होंगे । यदि सामान्यतः कार्यत्व से निरूपित कारण से विशेष की उत्पत्ति मानें, तो वह उत्पत्स्यमान घटादि इसी दण्ड से जन्य है, ऐसा निश्चय नहीं होगा । अतः विशेष घट के जननार्थ कारण-विशेष में प्रवृत्ति नहीं होगी । यदि कहें कि कार्य-विशेष से निरूपित कारणता का उल्लेख प्रत्यक्ष करता है, तो यह विकल्प होता है कि उत्पत्ति से पूर्वकाल में उक्त कारणता का ज्ञान होता है या उत्पत्ति से उत्तरकाल में ? यदि कहें कि उत्पत्ति से पूर्वकाल में, तो उस काल में कार्य है नहीं, अतः कार्यत्वनिरूपित कारणत्वरूप विशिष्ट न होने से—विषय-सन्निकर्ष

५१० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थे कार्यसत्त्वकालश्च सामग्र्यभावात् न तज्जननकाल इति तदानीं तज्जननविशिष्टता कथमध्यक्ष्या स्यात् , प्राक्‌तदग्रहणेन संस्कारसाचिव्यस्याप्यसम्भवात् । एवं क्वचिदपि हेतुत्वे साक्षात्कारासम्भवेन किंमूलव्याप्तिग्रहात्तत्रानुमाऽपि स्यात् । प्रतिबन्दी चानिर्वचनवादिनि न स्थाने । कादाचित्कत्वानुपपत्त्या तद्ग्रह इति चेन्न । वैयधिकरण्यात् । कथमपि सामानाधिकरण्ये तदुपपादकस्योपपाद्यवदनुपपत्तौ अविशेषादविश्रान्तिः, नानादि- त्वेनाऽपि शक्योपपादना । ही न होने से—प्रत्यक्ष नहीं होगा । उत्पत्ति से उत्तरकाल-में पूर्वकाल के न होने से पूर्वकालवृत्तित्वरूप कारणत्व ही नहीं है, तो किसका प्रत्यक्ष होगा ? पूर्वकाल में कारणता का ज्ञान न होने से इस काल में कारणताविषयक संस्कार भी नहीं है । अतः प्रत्यभिज्ञा में तत्ता के तुल्य, संस्कार के बल से प्रत्यक्ष में कार्यताविशिष्ट कारणता भासती है, यह भी नहीं कह सकते । 'इस तरह जब कभी भी कारणता का प्रत्यक्ष नहीं होता, तो किस प्रमाण के बल पर व्याप्तिग्रह होगा और जब व्याप्तिग्रह नहीं होगा, तो कारणता की अनुमिति भी कैसे होगी ? फिर यदि कारणताग्रह नहीं होता, तो दूसरे के ज्ञानार्थ वाग्व्यवहार में तथा तृषा-निवृत्ति के लिए जलपान में प्रवृत्ति भी कैसे होगी ?' यह प्रतिबन्दी भी ठीक नहीं । कारण अनिर्वचनीयतावादियों के मत में स्वप्नवत् प्रवृत्ति हो ही सकती है । एवञ्च यह प्रतिबन्दी भी खण्डित ही है । समर्थन— भले ही अनुमान से कारणत्व का ग्रह न हो; घट, पट आदि कार्य अनित्य हैं, उनकी अनुपपत्तिरूप अर्थापत्ति प्रमाण से ही उसका ग्रह हो सकता है । खण्डन — यह भी संभव नहीं, क्योंकि कारणत्व कारण में है और अनित्यत्व कार्य में है, अर्थात् दोनों व्यधिकरण हैं । यदि कहें कि कार्य के कादाचित्कत्व से कार्य में ही सकारणत्व की कल्पना होती है । एवञ्च किसी प्रकार दोनों समानाधिकरण हो जायें, तो भी उस कारण में भी कादाचित्कत्व से सकारणत्व की कल्पना, कारण के कारणमें भी वैसी कल्पना—इस प्रकार अनवस्था हो जायगी । अनादि होने से बीजाङ्कुर के तुल्य अनवस्था दोष नहीं है, यह भी नहीं कह सकते । कारण जब कहीं कारणत्व प्रमाणसिद्ध ( इष्ट ) होता, तब अनादित्व से अनवस्था का परिहार हो सकता । जहाँ कारणत्व प्रथमतः सिद्ध ही नहीं, विप्रतिपन्न है, वहाँ बीजाङ्कुर के तुल्य अनादित्व से अनवस्था का परिहार भी कैसे होगा ?

परिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५११

वैयधिकरण्येऽप्युपपाद्यसम्बन्धश्चेदनियमः, सम्बन्धश्चेदविश्रान्तिरिति । एतेन शक्तिः कारणत्वमित्यपि निरस्तम् । किञ्च—प्रत्यक्षप्रमितौ विषयस्यापि सन्निकर्षव्यापारकस्य कारणतया स्ववृत्त्यापत्तेः । अन्यथाऽक्षस्यापि तत्र कारणत्वं न स्यात्, अनुविधानाविशेषात् । विषयाविशेषितात्सन्निकर्षस्य तथात्वेऽत्यापत्तेः, क्वचित् कारणत्वाकारणत्व- विवादस्य चानुच्छेद्यत्वापत्तेः । किञ्च—उपपाद्य और उपपादक का परस्पर सम्बन्ध है या नहीं ? यदि नहीं, तो 'इस उपपादक से इस उपपाद्य की कल्पना होती है' यह नियम नहीं होगा । यदि सम्बन्ध है, तो उस सम्बन्ध का भी अन्य सम्बन्ध एवं उत्तरोत्तर सम्बन्ध की कल्पना में अन- वस्था हो जायगी । 'कारण में वृत्ति शक्तिविशेष कारणत्व है' यह मीमांसक का मत भी ठीक नहीं है; कारण पूर्वोक्त रीति से उसका प्रत्यक्ष आदि न होने से उसकी सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है । अर्थात् शक्ति अतीन्द्रिय होने से प्रत्यक्ष नहीं है, अर्थापत्ति से ही उसकी सिद्धि करनी होगी और पूर्वोक्त दोषों से अर्थापत्ति भी उसमें प्रमाण नहीं हो सकती, यह भाव है । किञ्च—प्रत्यक्ष-प्रमा में विषय भी कारण होने से कारणत्व-प्रत्यक्ष में कारणत्व भी विषयरूप से कारण हुआ । एवञ्च कारणत्व में वही कारणत्व मानें, तो स्व में स्ववृत्तित्व होने से आत्माश्रय हो जायगा । यदि अन्य कारणत्व मानें, तो वह अननुगत हो जायगा, परस्पर अध्याप्ति और अनवस्था भी होगी । यदि विषय के साथ प्रत्यक्ष का अन्वय-व्यतिरेक होते हुए भी उसे प्रत्यक्ष में कारण न मान केवल सन्निकर्ष के प्रति ही कारण मानें, तो इन्द्रियाँ भी प्रत्यक्ष में कारण न होंगी; क्योंकि विषय और इन्द्रिय दोनों का अन्वय-व्यतिरेक प्रत्यक्ष में तुल्य है । यदि विषय से अविशेषित सन्निकर्ष को कारण मानें, तो अन्य विषय के साथ सन्निकर्ष होने पर अन्य विषय का प्रत्यक्ष हो जायगा । किञ्च—यदि कारणत्व प्रत्यक्ष है, तो अभाव-प्रत्यक्ष में इन्द्रियसन्निकर्ष की कारणता के विषय में नैयायिक और मीमांसक का जो विवाद होता है, वह न होना चाहिए; क्योंकि प्रत्यक्ष में विवाद ही नहीं होता । यदि प्रत्यक्ष में भी विवाद हो, तो उसका कदापि उच्छेद ही न होना चाहिए ।

५१२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ ] एकेन तस्य दृष्टेरपरेण चादृष्टेः । तल्लक्षणस्य नियतपूर्वभावित्वादेः कथनेन कथितदोषापत्तेः । विना च तच्चिह्नाद् भ्रमसन्देहौ तत्र किं दर्शनादुच्छेद्यौ, अक्षेण हेतुत्व- धर्मिणि दृष्टेऽपि तददृष्ट्या यदवगमोऽक्षसहकारी वाच्यः, तदर्थेन सिद्धेन हेतु- धियोऽर्थवत्त्वे सम्भवति तदन्यार्थकल्पनागौरवं कुतो बलात् सिद्ध्येत् । तस्यान्वयानुविधानादेरनुमेयहेतुत्वे व्योमादावनुपपत्तेस्तदन्यत्वसिद्धिरिति समर्थन—नैयायिक के मत में अभाव-प्रत्यक्ष में सन्निकर्ष की कारणता प्रत्यक्ष है, पर मीमांसक को स्वमत में आग्रहरूप दोष प्रतिबन्धक होने से उसका प्रत्यक्ष नहीं होता, इसीलिए विवाद होता है । फिर जब नियतपूर्ववर्तित्वरूप हेतु से नैयायिक मीमांसकों के कारणत्व का अनुमान कराता है, तो विवाद का उच्छेद हो जाता है, अतः विवाद अनुच्छेद्य नहीं है । खण्डन—पूर्ववर्तित्व आदि लक्षण पूर्वोक्त दोषों से खण्डित हैं, अतः इनसे कारणता का अनुमान संभव न होने से उक्त विवाद का उच्छेद ही न होना चाहिए । किञ्च—कभी-कभी 'इदं कारणं न वा' ऐसा संदेह या अकारण में 'इदं कारणम्' ऐसा भ्रम हो जाता है । यदि कारण का लक्षण न हो, तो किसके दर्शन से उक्त संदेह या भ्रम की निवृत्ति होगी ? इसी तरह कभी-कभी कारण का प्रत्यक्ष होने पर भी कारणता का प्रत्यक्ष नहीं होता । अतः कारणता के प्रत्यक्ष में इन्द्रिय का कोई सहकारी अवश्य मानना होगा । एवञ्च यदि उसी सहकारी से कारणत्वविशिष्ट बुद्धि का निर्वाह हो जाता है, तो उससे अन्य कारणता की कल्पना का गौरव क्यों स्वीकार करें ? समर्थन—दण्डादि में कारणता अन्वय-व्यतिरेक के अनुविधानरूप हेतु से अनुमेय है और गगन आदि में व्यतिरेक न होने से धर्मिग्राहक प्रमाण [ अनुमानादि ] से ही ग्राह्य है । अतः एक अनुगत सहकारी न होने से अतिरिक्त कारणता मानते हैं । खण्डन—'दण्डः घटकारणम्' इस प्रत्यक्ष का विषय 'लक्षण से भिन्न कारणत्व धर्म है' यह सिद्ध होने पर उसे दृष्टान्त मानकर गगन आदि में अतिरिक्त कारणता का अनुमान हो और गगनादि में अन्वय-व्यतिरेक का अनुविधानरूप कारणता का बाध होने पर अतिरिक्त कारणता का अनुमान होने पर अनेकरूप कारणत्व न मानना पड़े,

परिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५१३ चेन्न । अन्योन्याश्रयापत्तेः । प्रत्यक्षस्यान्यस्मिन्विषये सिद्धेऽन्यत्र दृष्टान्तेन तदनुमाम्, तत्सिद्धौ च प्रत्यक्षस्यान्यविषयतासिद्धिः । तस्य चानागन्तुकत्वे प्रागपि तत्सत्त्वादस्तीतिमतिवत् करोतीति प्रमापातः । आगन्तुकत्वे च तदुत्पत्तेः प्राक् कारणत्वं क्वापि न स्यात् । तथाप्यजातत्वे घटाद्यपि किं न तथा स्यात् । व्यावृत्तेषु तेष्वनुगतौ च सर्वं प्रति सर्वकारणत्वापातात् । प्रतिकार्यव्यक्ति तत् पृथगिति चेन्न । साधारणस्यापि तद्गतस्य स्वरूपस्य घटादिकारणतामतयाऽनुवृत्तौ घटकारणत्वस्यापि तन्तुकारणत्वापत्तेः । कारणत्वमात्रेण तदनुगतं रूपं न घटकारणत्वादिनेति चेन्न । घटादि- इसलिए 'दण्डः घटकारणम्' इस प्रत्यक्ष का विषय अतिरिक्त कारणत्व है—यह सिद्ध हो, इस प्रकार अन्योन्याश्रय हो जायगा । किञ्च—कारणत्व नित्य है या अनित्य ? प्रथम पक्ष में घट की उत्पत्ति से पूर्वकाल में भी कारणत्व रहने से पूर्वकाल में 'दण्डोऽस्ति' इस व्यवहार के तुल्य 'दण्डः करोति' यह व्यवहार भी हो जायगा । द्वितीय पक्ष में कारणत्व की उत्पत्ति से प्राक् कारणत्व-व्यवहार कहीं भी न होना चाहिए । एवञ्च कारणत्व का कोई उत्पादक न होने से उसकी उत्पत्ति ही नहीं होगी । यदि अनित्य होते हुए भी कारणत्व को अजात मानें, तो घट-आदि को भी अजात क्यों न मानें ? किञ्च—यदि स्वरूप से भिन्नरूप दण्ड, वेमा आदि कारणों में अनुगत एक कारणत्व मानें, तो सब कारणों से सब कार्यों की उत्पत्ति होनी चाहिए । कारण दण्ड में जो कारणता है, वह सब कार्यों के प्रति एक-सी है । जैसे गौ सबके प्रति 'गौ' है, किसीके प्रति 'अगौ' नहीं है । समर्थन—तत्तत् कार्य के भिन्न-भिन्न जो कारण, उनमें कारणत्व भिन्न-भिन्न है । अतः सबसे सबकी उत्पत्ति नहीं होती । खण्डन—यदि 'इदं कारणम्, इदं कारणम्' इस अनुगत प्रतीति से सिद्ध कारणत्व घटादि कारणस्वरूप ही है, तब घट का कारण तन्तु का कारण क्यों न हो ? : समर्थन—कारण में कारणत्वरूप सामान्य धर्म रहता है और घटादि में तत्तत् कार्यत्व से निरूपित तत्तत्कारणमात्रवृत्ति तत्तत्कारणत्वरूप विशेष धर्म रहता है । इस प्रकार उसमें दो धर्म रहते हैं । अतः दण्ड में सामान्य कारणत्व रहने पर भी , ६५

५१४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ विशेषानुपहितकारणत्वमात्रस्य किंप्रतीत्यनिर्देश्यस्य सद्भावे प्रमाणाभावात् । अन्यथा यदि किञ्चित्प्रति कारणे सामान्यतः कारणत्वं नाम धर्मः स्यात्, तदा तस्या एव व्यक्तेः किञ्चित्प्रत्यकारणत्वादकारणत्वमपि रूपं तत्र स्यादिति अनपेक्षितविशेषकारणत्वाध्यासाद् भेदेनेकमात्रमेवोच्छिद्येत । किञ्च—कार्यव्यक्तेः कारणमस्ति न वा ? न चेन्नित्यसत्त्वासत्त्वयोरन्यतर- प्रसङ्गः । अस्ति चेत् किं तत् कारणम् ? व्यक्तिविशेष इति चेन्न । पूर्वभावस्य रासभादिसाधारणत्वात् तां कार्यव्यक्तिं प्रति तस्याः किं तत्कारणत्वम् । स्वरूपमेवेति चेन्न । तस्य व्यावृत्तत्वात् । तस्यास्तत्कारणात्मत्वे चातदात्मनां तत्कारणत्वविरोधात्, तत्कारणत्वस्य च समवाय्यसमवायिनिमित्तभूतानेकव्यक्ति- पटादिनिरूपित विशेष कारणत्व न होने से दण्ड से पट की उत्पत्ति नहीं होती । खण्डन—कार्यविशेष के कारणविशेष में ही अन्वय-व्यतिरेक हैं, अतः अन्वय-व्यतिरेक से घटादि-कारणत्वविशेष ही सिद्ध होते हैं। उससे अतिरिक्त कारणत्व-सामान्य में कोई प्रमाण नहीं है । अर्थात् ‘घटकारणम्, पटकारणम्’ ऐसी ही प्रतीति होती है, ‘कारणम्, कारणम्’ ऐसी कार्यविशेष से अनालिङ्गित प्रतीति नहीं होती; अतः उसकी सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है । अन्यथा यदि कारण में कारणत्वरूप सामान्य धर्म मानें, तो वही कारण व्यक्ति किसीका अकारण भी होने से वहाँ अकारणत्वरूप सामान्य धर्म भी मानना पड़ेगा । इस तरह यदि अकारणत्वरूप सामान्य को भी मानें, तो विशेष की अपेक्षा से रहित उक्त कारणत्व और अकारणत्व परस्पर विरुद्ध हैं । एवञ्च परस्पर विरुद्ध दो धर्मों का अध्यास भेद का जनक होने से कहीं भी एक कारण सिद्ध न होगा । किंच—कार्यव्यक्ति का कारण है या नहीं ? यदि नहीं, तो कार्य का सर्वदा सत्त्व या सर्वदा असत्त्व होना चाहिए । यदि है, तो वह कारण क्या है ? व्यक्तिविशेष कारण है, यह तो कह नहीं सकते ; क्योंकि पूर्ववर्तित्वरूप कारणत्व अकारण रासभ में भी है । फिर उस कार्यव्यक्ति का उसमें कारणत्व क्या है, जो कारणमात्र में ही रहता है और रासभादि में अतिव्यास नहीं होता । समर्थन—कारण का स्वरूप ही कारणत्व है । रासभ के कारण न होने से उसका स्वरूप कारणत्व नहीं है । खण्डन—स्वरूप प्रतिव्यक्ति भिन्न-भिन्न होता है । अतः यदि दण्ड के स्वरूप को कारणत्व मानें, तो चक्र का स्वरूप कारण न होगा । एक कार्य का एक ही कारण होता है, ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि एक कार्य के समवायी,

परिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५१५ साधारणत्वात् । अनेकस्य चैकानुगतव्यवहारबुद्धिनिदानत्वे गोत्वाद्युच्छेदप्रसङ्गस्य दर्शितत्वात् । नियतपूर्वभावित्वमिति चेन्न । व्याप्त्यर्थस्य नियमस्यैकस्य सर्वत्र व्यक्ताव- सम्भवात्, पूर्वमात्रस्य चातिप्रसञ्जकत्वात् । तज्जातीयं प्रति नियततज्जातीय- त्वमिति चेन्न । तस्य तज्जातीयव्यक्त्यन्तरसाधारणत्वात् । नियततज्जातीयत्वे सति तत्पूर्वत्वमिति चेन्न । तत्समानकालोत्पत्तिककार्य- व्यक्तिशतजनकव्यक्तिशतसाधारणत्वात् । तथाऽभ्युपगमे चैकसमवाय्यादिनाशे सर्वतत्कार्यनाशप्रसङ्गः । असमवायी और निमित्त भेद से अनेक कारण होते हैं। किञ्च—यदि कारण के स्वरूप को ही कारणत्व मानें, तो स्वरूप के प्रतिव्यक्ति व्यावृत्त होने से कारणमात्र में एक अनुगत धर्म न होने से अनुगत प्रतीति या व्यवहार नहीं होगा । यदि भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में अनुगत, एक कारणत्व न होने पर भी अनुगत प्रतीति या व्यवहार मान लें, तो कारण के तुल्य भिन्न-भिन्न गोव्यक्तियों में अनुगत गोत्व-जाति के बिना भी अनुगत-बुद्धि या व्यवहार हो जाने से गोत्वादि जातियों का ही उच्छेद हो जायगा । समर्थन —'नियम से पूर्वभावी कारण है' यही लक्षण करेंगे । वह सबमें अनुगत है और रासभादि में अतिव्याप्त भी नहीं है । खण्डन—'नियम' शब्द का अर्थ व्याप्ति है और वह व्याप्ति सभी कारण व्यक्तियों में एक नहीं हो सकती । अर्थात् घट-सामान्य की दण्डसामान्य में ही व्याप्ति होती है। यदि नियम का निवेश न कर पूर्वभावित्वमात्र लक्षण करें, तो रासभ में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'तज्जातीय के प्रति नियम से पूर्ववर्त्तिजातीयत्व कारणत्व है ।' घटत्वा- वच्छिन्न कार्य के प्रति दण्डादि की नियतपूर्ववर्तिता सुग्राह्य ही है । खण्डन—एक घटव्यक्ति का जो कारण, वह तज्जातीय अन्य घट व्यक्ति का भी कारण हो जायगा । समर्थन—'नियत तज्जातीयत्व से विशिष्ट तत्पूर्वत्व कारणत्व है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—जिस काल में एक घटकार्य उत्पन्न होता है, उसी काल में अनेक घटकार्य देश- भेद से उत्पन्न होते हैं। अतः एक घट से नियत पूर्ववर्त्तिजातीयत्व और तद्घट- पूर्वत्व अन्य घट के कारण में भी होने से पूर्ववत् अतिव्याप्ति हो जायगी। यदि एक घट के कारण को घटमात्र का कारण मान लें, तो एक घट के समवायी या असमवायी कारण का नाश हो जाने पर घटमात्र का नाश हो जायगा । कारण नैयायिक समवायी या असमवायी कारण के नाश से कार्य का नाश मानते हैं ।

५१६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ तत्कालतज्जातीयसर्वसामग्रीतः सर्वतत्कालतज्जातीयोत्पत्तौ सामग्रीभेदस्य कार्यभेदहेतुतया प्रत्येकमिलितसामग्रीत्वविकल्पेन कार्यव्यक्त्यभेदप्रतिव्यक्ति- स्वरूपभेदयोरन्यतरप्रसङ्गश्च । समवायित्वं प्रत्यपि साधर्म्यानुविधायिनि नियमेऽत्यापत्तेः । व्यावृत्तत्वे चानियमात् । नियततज्जातीयत्वे सति तत्सादेश्यमिति चेन्न । समवायिदेशापेक्षया कार्य- किञ्च—यदि समानकालिक और समानजातीय सब सामग्रियों से समानकालिक सजातीय सब कार्यों की उत्पत्ति मानें, तो सामग्री-भेद ही कार्यभेद का हेतु होने से अब सामग्रीभेद नहीं रहा । अतः यदि सामग्री-समुदाय को सब कार्यों का जनक मानें, तो सब कार्यों का ऐक्य हो जायगा । यदि एक-एक सामग्री को सब कार्यों का जनक मानें, तो एक-एक कार्य भिन्नरूप हो जायगा । समवायिकारण-स्थल में भी यदि तन्तुत्वरूप से तन्तु को पट का समवायी कारण मानें, तो सब पटों में सब तन्तु समवायी कारण हो जायँगे । एवञ्च किञ्चित् तन्तु का नाश होने पर सभी पटों का नाश होने लगेगा । यदि तत्पट में तत्तन्तु को कारण मानें, तो कारणत्व का ज्ञान नहीं होगा, क्योंकि कारणत्व के शरीर में नियम ( व्याप्ति ) का प्रवेश है और सामान्य का ही सामान्य में नियम-ग्रह होता है । अतः तत्-तन्तु में व्याप्तिज्ञान न होने से कारणत्व का ज्ञान ही नहीं होगा । समर्थन—'तत्-पट के समान देश में विद्यमान तन्तु तत्-पट में समवायी कारण है' ऐसा कहेंगे । एवञ्च तन्तुमात्र पट में कारण नहीं होगा । खण्डन—तन्तु संयोग सम्बन्ध से भूतल में है और पट समवाय से तन्तु में । अतः दोनों एकदेश में न होने से सादेश्य न होने के कारण असम्भव हो जायगा । यदि कहें कि हम समवाय सम्बन्ध से अवयव-अवयवी का सादेश्य नहीं कहते, प्रत्युत संयोग सम्बन्ध से कहते हैं । एवञ्च संयोग से पट भी भूतल में है, तो तन्तु- पटस्थल में तो सादेश्य हो जायगा, तो यह भी ठीक नहीं। कारण रूप, रस आदि गुण संयोग से नहीं रहते, अतः गुणरूप कार्य के समवायी कारण-स्थल में अव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि स्वाश्रय-संयोग सम्बन्ध से वह समवायी कारण के अधिकरण में है, १. अबतक सामान्यतः कारणत्वका खण्डन किया जा चुका। अब वैशेषिकाभिमत कारण- विशेष समवायिकारण का खण्डन करते हैं—'समवायित्वम्' इत्यादिसे ।

परिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५१७ कारणयोः सादेश्यनियमानभ्युपगमात् संयोगिदेशापेक्षया गुणादावसम्भवात् । यथाकथञ्चित्सादेश्यमात्रस्य चातिप्रसञ्जकत्वात् । अदृष्टादेभिन्नदेशस्यापि कारणत्वोपगमे सर्वं प्रति सर्वकार्यसामग्र्याः कारण- त्वापातात्, पूर्वभावनियमादेस्तुल्यत्वात् । अनुगते च रूपेऽन्वयव्यतिरेकसम्भवात् व्यक्तिगतसामान्ययोरेव कार्य- कारणत्वापत्तेः । तद्गतसामान्ययोरेवान्वयव्यतिरेकादिनियमः, व्यक्त्योश्च कार्य- कारणतेति लक्ष्यलक्षणभाववैयधिकरण्यात् । सामान्याकारप्रविष्टां व्यक्तिमादायान्वयव्यतिरेके विशेषस्याकारणत्वं स्यात् , सामान्याकारेण च पूर्वसतः कार्यत्वम् । अतः अव्याप्ति नहीं, तो यथाकथंचित् (स्वसजातीय-संयोग सम्बन्ध से) तन्तुमात्र पटमात्र के अधिकरण में होने से तन्तुमात्र में समवायी कारणत्व की आपत्ति हो जायगी । किञ्च —अदृष्ट (धर्माधर्म) घटादि कार्यदेश से अन्यत्र (आत्मा में) रहकर भी कारण होता है । अतः कार्य-समानदेश ही कारण हो, यह नियम नहीं है । एवञ्च समानकाल में उत्पन्न कार्यमात्र में समानजातीय कारणमात्र की कारणता की आपत्ति हो जायगी, क्योंकि नियतपूर्ववर्तिता-जातीयता उभयत्र तुल्य है । किञ्च —दण्ड व्यक्ति और घट व्यक्ति में कार्यकारणभाव ही न होगा । कारण पूर्ववर्तिता-नियम सामान्यद्वय में ही विश्रान्त है । यदि कहें कि ‘निर्विशेषं न सामान्यम्’ इस न्याय से सामान्यावच्छेदेन भी व्यक्ति में ही कारणता पर्यवसित होती है, तो वह भी ठीक नहीं। कारण फिर भी सामान्यों का नियत पौर्वापर्य्यरूप कार्य-कारणभाव का लक्षण सामान्यों में ही रहेगा, दण्ड, घट आदि लक्ष्य में नहीं । एवञ्च लक्ष्य-लक्षण- भाव का वैयधिकरण्य हो जायगा । यदि कहें कि निर्विशेष सामान्य न होने से सामान्यनिष्ठ कार्यत्व-कारणत्व विशेष में भी रहता है, अतः लक्ष्य-लक्षणभाव में भी वैयधिकरण्य नहीं है, तो सामान्यविशिष्ट विशेष में कार्यत्व-कारणत्व और शुद्ध विशेष में लक्ष्यत्व होने से वैयधिकरण्य तद- वस्थ ही है। ‘सामान्य लक्ष्य भी है, अतः लक्ष्यलक्षणभाव का वैयधिकरण्य नहीं है’ यह भी नहीं कह सकते । कारण सामान्य नित्य होने से कार्य नहीं हो सकता । किंच सामान्य को कार्य मानें, तो उसके पहले से ही सिद्ध होने के कारण सत्कार्यवाद की आपत्ति आ जायगी, जो असत्कार्यवादी नैयायिकों के लिए अपसिद्धान्त हो जायगा ।

५१८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ द्रव्यसामग्र्या वृक्षसामग्र्या शिंशपासामग्र्या च पृथग्व्यक्तिजननापत्तेः, पृथगेव तासां सामग्रीत्वात् । सर्वासाम्च व्यक्तिं प्रत्येव जनकत्वात्, द्रव्यत्वा- दीनामजन्यत्वात् । शिंशपासामग्र्या वृक्षसामग्रीसहिताया एव सामग्रीभावान्न पृथक् शिंशपा- व्यक्तिरिति चेन्न । वृक्षसामग्र्याः शिंशपासामग्रीमतीत्यापि शालतमालादेर्वृक्षस्य जननात् पृथक्तया वृक्षव्यक्तिजननापत्तेः । साऽपि शिंशपासामग्री तन्मिलिता जनिकेति न व्यक्तिभेद इति चेन्न । शिंशपार्थातिरिक्तवृक्षार्थाभावापत्तेः । वृक्षशिंशपासामग्र्योरेकीभूयोर्जननाविशेषाद् वृक्षसामग्री च वृक्षजनन एव कथं क्वचिच्छिंशपासामग्री क्वचित्तमालसामग्रीमपेक्षत इति स्यात् । किञ्च—‘द्रव्यं वृक्षः शिंशपा च’ यह सामानाधिकरण्य प्रतीति अनुपपन्न हो जायगी; क्योंकि वृक्ष की सामग्री, द्रव्य की सामग्री और शिंशपा की सामग्री से भिन्न-भिन्न कार्य उत्पन्न नहीं होते । किन्तु वे होने चाहिए, कारण इनमें प्रत्येक में सामग्रीत्व रहता है । फिर द्रव्यत्वादि सामान्य अजन्य होने से ये तीनों सामग्रियाँ व्यक्ति की ही जनिका हैं । समर्थन — वृक्ष-सामग्री से युक्त ही शिंशपा-सामग्री में सामग्रीत्व है। अतः वृक्ष से पृथक् शिंशपा-व्यक्ति की उत्पत्ति नहीं होती, किन्तु वृक्षरूप शिंशपा की ही उत्पत्ति होती है । खंडन— ऐसा मानने पर वृक्ष से पृथक् शिंशपा की उत्पत्ति न हो, किन्तु वृक्ष-सामग्री तो शिंशपा-सामग्री की अपेक्षा करती ही नहीं। यदि वृक्ष-सामग्री भी शिंशपा-सामग्री की अपेक्षा करे, तो वृक्ष-सामग्री से ताल-तमाल की उत्पत्ति भी न होनी चाहिए । अतः शिंशपा-स्थल में शिंशपा से पृथक् वृक्ष की उत्पत्ति क्यों न हो ? समर्थन—वृक्ष-सामग्री भी शिंशपा-स्थल में शिंशपा-सामग्री से युक्त ही कार्य का जनन करती है । अतः शिंशपा से पृथक् वृक्ष की उत्पत्ति, नहीं होती । खंडन—यदि ऐसा मानें, तो शिंशपास्थल में शिंशपा से भिन्न ‘वृक्ष’ शब्द के अर्थ का अभाव हो जायगा । कारण सामग्री-भेद से कार्यभेद होता है । शिंशपास्थल में वृक्ष-सामग्री, शिंशपा-सामग्री दोनों एक होकर कार्यजनक हैं । फिर कार्यभेद कैसे होगा ? किंच—वृक्ष-सामग्री से वृक्ष की ही उत्पत्ति होती है, अन्य की नहीं । फिर वृक्ष की उत्पत्ति में ही उक्त सामग्री शिंशपा-सामग्री की और कहीं तालादि-सामग्री की अपेक्षा

परिच्छेद ] वर्तमानत्वादि-लक्षणों का खण्डन ५१६ एकस्य वृक्षलक्षणस्य कार्यस्य सामग्रीभेदे स्वरूपभेदापातात् । अननुगता- याश्च वृक्षसामग्रीत्वे पृथग्वृक्षव्यक्तेः पृथक्शिंशपाव्यक्तेरुत्पत्त्यापत्तेरित्यादि स्वयमूहनीयम् । वर्तमानत्वादि-लक्षण-खण्डनम् नियमे च प्राक्कालीनतयाऽभिधीयमाने प्रागित्यस्य व्यवच्छेद्यौ वर्तमान- भविष्यत्कालौ प्राक्कालश्च व्यवच्छेदको विवेचनीयः । न च तद्विवेचनं शक्यम् । वर्तमानादिबुद्धय एव स्वविषयवैचित्ये प्रमाणमिति चेन्न । तथाहि--वर्त- करती है, यह कैसे हो सकता है ? अन्यथा ( यदि अपेक्षा करे तो ) जैसे दण्डमात्र चक्र की अपेक्षा करने से सामग्री नहीं है, वैसे ही उक्त सामग्री भी अपेक्षा करनेमात्र से सामग्री न कहलायेगी । फिर, यदि एक ही शिंशपारूप वृक्ष की उत्पत्ति में वृक्ष-सामग्री, शिंशपा-सामग्री दोनों परस्पर निरपेक्ष समर्थ हों, तो एक ही कार्य का स्वरूप-भेद हो जाना चाहिए । कारण जब वृक्ष-सामग्री से पृथक् शिंशपा-सामग्री है, तब वृक्ष से पृथक् शिंशपा की उत्पत्ति की आपत्ति क्यों न हो ? इस प्रकार के खण्डन की स्वयं भी ऊहा कर लेनी चाहिए । वर्तमानत्वादि के लक्षणों का खण्डन किञ्च—'प्राक्कालवृत्तित्वरूप सम्बन्ध से जो कार्य का व्यापक हो, वह कारण है' इस लक्षण में प्रविष्ट व्यवच्छेदक ( इतरनिषेधक ) प्राक्काल तथा व्यवच्छेद्य ( निषेध्य ) वर्तमान और भविष्यत् काल के लक्षणों का भी विचार करना चाहिए । किन्तु इनके लक्षणों का निश्चय नहीं हो सकता । अतः कारणत्व अनिर्वचनीय है। समर्थन—वर्तमान काल, अतीत काल और भविष्यत् काल की बुद्धियाँ ही अपने- अपने विषय वर्तमान आदि कालों के भेद में प्रमाण हैं । संडन—यह युक्त नहीं, कारण जबतक इस बात का निश्चय न हो कि इन बुद्धियों के विषय क्या हैं, तब- तक इन बुद्धियों के प्रामाण्य का ग्रह ही नहीं होगा । अर्थात् विषय के यथार्थत्व के अधीन ही ज्ञान का प्रामाण्य है । अतः विषय के स्वरूप के ज्ञान के बिना ज्ञान में

५२० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ मानादिबुद्धेरेव को विषयः ? कालविशेष इति चेन्न । कालस्य विशेषः स्वाभाविक औपाधिको वा ? नाद्यः ; कालस्य भवद्भिरेकत्वाभ्युपगमात् , य एव कालो वर्तमानः प्रतीयते, स एव पूर्वं भावीति पश्चात् भूत इति च न प्रतीयेत । त्रिविधस्वभाव एवासाविति चेन्न । भेदप्रसङ्गात् , व्यवस्थानुपपत्तिप्रसङ्गाच्च । यदैव वर्तत इति प्रत्ययस्तदैव वृत्तो वर्तिष्यत इति प्रत्ययप्रसङ्गात् । द्वितीयश्चेदुपाधिरभिधीयताम् । सूर्यादिक्रियासम्बन्धभेदः स इति चेन्न । भूतभविष्यतोरपि क्रियासम्बन्धप्रत्ययस्यावश्यं वक्तव्यत्वात् । य एव दिवसः सूर्यगतिविशेषावच्छिन्नो वर्तत इति प्रतीतः, स एव हि तदवच्छिन्नो वृत्त इत्य- वगम्यते वर्त्स्यन्निति च । न हि निर्विशेषस्य कालस्य तदतीतत्वं प्रतीयतेऽनाग- तत्वं वा, किन्तु उपाधिविशेषेणैवावच्छिन्नस्य । येनैवासौ पूर्वं दिनान्तरात् प्रामाण्य का ज्ञान दुर्लभ होने से अन्योन्याश्रय है । यदि कहें कि कालविशेष वर्तमान है, तो काल का वह विशेष स्वाभाविक है या औपाधिक ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारण काल को आप एक मानते हैं । अतः जो काल वर्तमानत्वरूप से प्रतीत होता है, वही पहले भविष्यत्त्वरूप से और पीछे भूतत्वरूप से प्रतीत नहीं होगा । एक ही काल का त्रिविध स्वभाव है, यह कथन भी युक्त नहीं । कारण स्वभाव के भेद से काल का भी भेद हो जायगा । यदि विरुद्ध धर्मत्रय को एक काल का स्वभाव मान लें, तब भी जिस काल में 'वर्तते' यह प्रतीति होती है, उसी काल में 'वृत्तः, वर्तिष्यते' ऐसी प्रतीति हो जायगी । कारण तीनों स्वभाव काल में रहते हैं, अतः सदा तीनों व्यवहार होने चाहिए । काल का विशेष औपाधिक है, यह द्वितीय पक्ष मानें, तो उपाधि क्या है, यह कहिये । यदि कहें कि सूर्यादि-क्रिया का सम्बन्ध उपाधि है, तो भूत-भविष्यत् में भी सूर्य-क्रिया के सम्बन्ध की प्रतीति अवश्य मानेंगे । कारण जिस सूर्य के गतिविशेष से युक्त जो दिवस 'वर्तते' इस प्रतीति का विषय है, वही उसी सूर्यक्रिया से युक्त 'वृत्तः, वर्तिष्यते' इस प्रतीति का भी विषय होता है । विशेष उपाधि से रहित काल में अतीतत्व, अनागतत्व की प्रतीति नहीं होती, किन्तु उपाधिविशेष ( सूर्यक्रिया ) से अवच्छिन्न में ही अतीतत्वादि की प्रतीति होती है । जिस उपाधि से अवच्छिन्न वह

[रिच्छेद ] वर्तमानत्वादि-लक्षणों का खण्डन ४२१ व्यवच्छिन्नो वर्तत इति प्रतीतः, तेनैवोपाधिना तत एव व्यवच्छिन्नो वृत्त इति वर्तिष्यत इति च कदाचित् ज्ञायते । ननु सत्यमेतत्, परं यदा तदुपाधिसम्बन्धस्तस्य स्वरूपेणावतिष्ठमान- स्तदा वर्तमानप्रत्ययः, यदा स एव विनष्टो भवति तदा भूतप्रत्ययः, यदाऽनागत- स्तदा भविष्यत्प्रत्यय इति । नैतदस्ति ; यद्यत्र लटो विवक्षितोऽर्थस्तदा तज्ज्ञानस्यैव तज्ज्ञानोपायत्वमिति आत्माश्रयानवस्थयोरन्यतरप्रसङ्गः । विनष्टादिशब्दाश्च अतीतादिपर्यायास्तेषां सर्वेषामेवार्थे निरूप्यमाणे , तन्मध्यपतितमेकं शब्दं प्रयुज्य तन्निर्वृक्तिं कुर्वाणः श्लाघनीयप्रज्ञो मातापितृमानसि । क्रियावच्छिन्नः कालो वर्तमानः, तत्प्रागभावावच्छिन्नो भूतः, तत्प्रध्वंसाव- दिवस पूर्वकाल में अन्य दिवसों से व्यवच्छिन्न होकर 'वर्तते' इस प्रतीति का विषय था, उसी उपाधि से उसी अन्य दिवस से व्यावृत्त वह दिवस किसी काल में 'वृत्तः, वर्तिष्यते' इन प्रतीतियों का भी विषय होता है। समर्थन—आपका यह कथन सत्य है, किन्तु जिस काल में उपाधि का उक्त सम्बन्ध स्वरूपतः वर्तमान है, उस काल में 'वर्तते' ऐसी प्रतीति होती है; जिस काल में वह उपाधि नष्ट हो जाती है, उस काल में 'भूतः' इत्याकारक प्रतीति होती है और जब वह उपाधि अनागत रहती है, तब 'भविष्यति' ऐसी प्रतीति होती है । खंडन—यह कथन भी अयुक्त ही है, कारण लक्षणघटक 'वर्तमान' शब्द का अर्थ वर्तमान काल ही है । अतः वर्तमान काल के लक्षण में वर्तमान काल घटक हुआ । वह लक्षणघटक वर्तमान यदि लक्ष्यभूभ वर्तमानरूप ही है, तो आत्माश्रय और यदि अन्य है, तो उसके लक्षण में अन्य वर्तमान घटक है, इस तरह अनवस्था हो जायगी । किञ्च—विनष्ट, अतीत आदि शब्दों का एक ही अर्थ है । अतः उन्हीं सब शब्दों के अर्थों के निरूपण के समय यदि आप विनष्टघटित अतीत का लक्षण करते हों, तो आपकी बुद्धि प्रशंसनीय है और आप माता-पिता आदि गुरुजनों से युक्त हैं। अर्थात् यदि लक्ष्य और लक्षणघटक 'अतीत', 'विनष्ट' शब्दों का अर्थ एक ही है, तो आत्माश्रय और यदि लक्षणघटक अतीत शब्द का अर्थ लक्ष्य से अन्य है, तो इस प्रकार उत्तरोत्तर निवेश से अनवस्था हो जायगी । समर्थन—पाकादि क्रिया से अवच्छिन्न काल वर्तमान है और क्रिया के प्रागभाव ६६

५२२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ

च्छिन्नो भविष्यन्निति चेन्न । अतीतानागतप्रतीतिकालोऽपि क्रियावच्छिन्नः प्रतीयत इति वर्तमानप्रत्ययप्रसङ्गस्य तादवस्थ्यात्, क्रियानवच्छिन्नस्य तत्प्राग्- भावप्रध्वंसाभावावच्छेदानुपपत्तेः । प्रागभावश्च प्रागर्थानिरुक्तौ कथं न दुरधिगमः । प्रध्वंसस्यापि प्राग्- भावात्कथं विशेषो वक्तव्यः ? अभावो विनाशी प्रागभावः, उत्पत्तिमान् प्रध्वंस इत्यनयोर्विशेष इति चेन्न । को हि प्रागभावस्य विनाशो येन विनाशीत्युच्यते ? यदि प्रतियोगिभूतो घटादिः, प्रध्वंसस्यापि प्रागभाववत्प्रतियोगीति सोऽपि विनाशी प्राप्तः । उत्पत्तिमांश्च प्रध्वंस इत्युत्पत्तिपदार्थो विवेचनीयः । यद्यसौ असतः सत्त्वम्, से अवच्छिन्न काल भूत है और क्रिया के ध्वंसाभाव से अवच्छिन्न काल भविष्यत् है। खंडन—अतीत-अनागत की प्रतीतियों के काल में भी क्रिया से अवच्छिन्न ही काल प्रतीत होता है, अतः अतीत आदि की प्रतीति के काल में वर्तमान-प्रत्यय हो जायगा। कारण जो क्रिया से अनवच्छिन्न है, वह क्रिया के प्रागभाव या ध्वंसाभाव से अवच्छिन्न हो नहीं सकता । अर्थात् प्रतियोगी से अविशिष्ट नहीं, किन्तु प्रतियोगी से विशिष्ट ही प्रागभाव या ध्वंस की प्रतीति होती है। अतः ध्वंसादि से अवच्छिन्न काल ध्वंस के विशेषण क्रिया से अवश्य ही अवच्छिन्न रहेगा। कारण विशेषण के अवच्छिन्नत्व के बिना विशिष्ट से अवच्छिन्नत्व कहीं भी नहीं हो सकता। किञ्च—जबतक प्राक् शब्द के अर्थ का निर्वचन न हो, तबतक प्रागभाव शब्द का अर्थ भी दुर्ज्ञेय क्यों नहीं है और ध्वंसाभाव का प्रागभाव से भेद भी किस प्रकार होगा ? समर्थन--'विनाशी अभाव प्रागभाव है और उत्पत्ति से युक्त अभाव ध्वंसाभाव है' यही दोनों अभावों में भेद है। खण्डन—प्रागभाव का विनाश क्या वस्तु है जिससे वह 'विनाशी' कहा जाता है। यदि प्रतियोगीरूप घटादि को प्रागभाव का विनाश मानें, तो वही ध्वंस का भी विनाश है, अतः ध्वंस भी विनाशी हुआ । किञ्च—'उत्पत्तियुक्त अभाव ध्वंस है' यहाँ उत्पत्ति का भी विचार करना चाहिए कि वस्तुतः उत्पत्ति का क्या अर्थ है ? यदि कहें कि असत् का सत्त्व उत्पत्ति है और सत्त्व

परिच्छेद ] वर्तमानत्वादि-लक्षणों का खण्डन ५२३ तच्च सामान्यं तदाऽभावेऽसम्भव एव। अथ स्वरूपसत्त्वं तदा प्रागभावेऽपि प्रसङ्गः, तस्यापि कदाचिदसत्त्वात् । पूर्वमसतः पश्चात्सत्त्वं विवक्षितमिति चेन्न। पूर्वेदानींपश्चादर्थस्यैवा- निरूपणात् । एतेन कारणावच्छिन्नं सत्त्वमुत्पत्तिरित्यपि निरस्तम् । पूर्वापरनिर्वचनमन्त- रेण कारणार्थानिर्वचनात् । अस्तु तावदतीतानागतयोर्यथातथा निरुक्तिः । यत्क्रियावच्छिन्नो यः कालः स तत्क्रियापेक्षया वर्तमानो न त्वन्यापेक्षयेति चेत् ; तदपेक्ष्येति कोऽर्थः— किं तदुपधानेन, उत तदवधिकतया, उत तत्प्रतियोगिकतया, उत तेन प्रकारेणेत्येव ? नाद्यः; उपाध्यवच्छिन्नस्य अतीतानागतप्रतिपत्तिविषयत्वमपि तस्येत्य सकृदुक्तत्वात् । सत्ता जाति है, तो ध्वंसाभाव में सत्ता जाति न होने से असम्भव हो जायगा । यदि स्वरूप-सत्त्व है, तो प्रागभाव का भी कदाचित् कार्य की उत्पत्ति से पूर्व स्वरूपतः सत्त्व है ही । अतः प्रागभाव में ध्वंस के लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'पूर्वकाल में असत् का उत्तरकाल में जो स्वरूपसत्त्व है, वह उत्पत्ति है ।' खंडन—पूर्व, इदानीम्, और पश्चात् शब्दों के अर्थों का अद्यावधि निरूपण नहीं हुआ है । अर्थात् पूर्व (अतीत) के लक्षण में ध्वंसाभाव का, ध्वंसाभाव के लक्षण में उत्पत्ति का और उत्पत्ति के लक्षण में पूर्व का निवेश होने से चक्रक हो जायगा । समर्थन—कारण से अवच्छिन्न (कारण में समवेत) जिसका सत्त्व हो, वह उत्पत्ति है । प्रागभाव का सत्त्व कारण में समवेत नहीं है, अतः अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—कारण के लक्षण में 'पूर्व' का निवेश होने से पूर्वत्व का निर्वचन न होने तक कारणत्व की निरुक्ति नहीं हो सकती । अतः उक्त युक्ति से चक्रक हो जायगा । समर्थन—अतीत और अनागत कालों के चाहे जो लक्षण करें, सम्प्रति वर्तमान काल का यह लक्षण करते हैं कि 'जिस पाकादि क्रिया से अवच्छिन्न जो काल हो, वह उस क्रिया की अपेक्षा वर्तमान है, अन्य क्रिया की अपेक्षा नहीं । खण्डन—इस लक्षण में 'अपेक्षा' शब्द का क्या अर्थ है, क्रिया की उपाधि रूप से, अवधि रूप से, प्रतियोगी रूप से या प्रकार मात्र से अपेक्षा है ? इनमें प्रथम कल्प युक्त नहीं, कारण उक्त रीति से अतीत-अनागत व्यवहार-काल

५२४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ चतुर्थ नापि द्वितीयः ; ‘अस्मादयं दीर्घः' इतिवत् ‘अस्मादयं वर्तते' इत्यवध्यपेक्षा- मन्तरेण प्रतीयमानत्वात् सर्वदैव च त्रिविधावध्यपेक्षया ‘आसीदस्ति भविष्यती'ति प्रत्ययाव्यवस्थाप्रसङ्गात् । अत एव न तृतीयः । नापि चतुर्थः; अतीतानागतप्रतीतिकाले क्रियावच्छेदप्रकारेण वर्तमानप्रत्यय- विषयत्वप्रसङ्गात् । नासौ क्रियावच्छेदलक्षणः प्रकारोऽतीतानागतकाले वर्तत इति चेन्न । वर्त- मानताया अद्याप्यनिरूपणेन वर्तत इत्युक्त्वा विशेषस्य दर्शयितुमशक्यत्वात् । तत्क्रियाकाले तत्क्रियावच्छिन्नः कालो वर्तमान इति चेन्न । कालस्य काला- भी तत्क्रिया से अवच्छिन्न काल है । अतः उस क्रियारूप उपाधि की अपेक्षा उस काल में वर्तमानत्व हो जायगा, यह दोष हम बार-बार कह आये हैं । द्वितीय और तृतीय कल्प भी युक्त नहीं हैं। कारण जैसे ‘अस्मात् अयं दीर्घः' इत्यादि व्यवहार में नियमतः अवधि की अपेक्षा होती है या जैसे ‘घटात् भिन्नः पटः' इत्यादि व्यवहार में भेद प्रतियोगी की अपेक्षा करता है, वैसे ही ‘वर्तते’ इस व्यवहार में नियमतः ‘अस्मात्’ ऐसी अवधि या प्रतियोगी की अपेक्षा नहीं होती । अर्थात् ‘घटो वर्तते' ऐसा व्यवहार होता है, 'घटाद् वर्तते' ऐसा व्यवहार नहीं होता । यदि अवधि को प्रतियोगी की नियमतः अपेक्षा हो, तो 'घटाद् वर्तते' ऐसा व्यवहार भी होने लगेगा । ‘उसे क्रिया की अपेक्षा से' अर्थात् उस क्रियारूप प्रकार से, यह चतुर्थ कल्प भी अयुक्त है । कारण अतीत-अनागत व्यवहार में भी ध्वंसादि के विशेषणत्वरूप से उस क्रिया का अवच्छेद काल में है । अतः उस क्रिया-प्रकार से अतीतादि व्यवहारकाल में भी वर्तमानत्व-व्यवहार हो जायगा । समर्थन—वह क्रियारूप प्रकार अतीतादि व्यवहारकाल में वर्तमान नहीं है । लक्षण में ‘वर्तमान जो क्रियारूप प्रकार, उस प्रकार से वह काल वर्तमान है' ऐसा निवेश होने से उक्त स्थल में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—अभी तक वर्तमान का लक्षण न होने से वर्तमान के निवेशविशेष को आप नहीं दिखा सकते । अर्थात् वर्तमान के लक्षण में वर्तमान का प्रवेश होने से आत्माश्रय हो जायगा । समर्थन—‘उस पाकादि क्रिया-काल में उस क्रिया से अवच्छिन्न काल, उस क्रिया-प्रकार से वर्तमान है।' खण्डन—काल काल का आश्रय नहीं हो सकता, कारण

परिच्छेद ] वर्तमानत्वादि-लक्षणों का खण्डन ५२५ श्रयतया निरूपणसम्भवात्कालान्तरस्यानभ्युपगमात् , तस्यैव कालस्य तदाश्रय- वत्त्वे व्यक्तमात्माश्रयत्वापत्तेः । स्यादेतत्—ग्राहकविज्ञानविषयो ग्राहकविज्ञानाश्रयश्च कालो वर्तमानः, वर्तमानोपाधिप्रागभावावच्छिन्नश्च पूर्वः, तत्प्रध्वंसाभावावच्छिन्नश्चानागतः । प्रागभावप्रध्वंसयोश्च स्वाभाविकमेव भेदमादाय व्यवस्था । प्राग्व्यवस्थाहेतुरभावः प्रागभाव इति स्वभावभूतस्यैव विशेषस्य कार्यमादाय लक्षणम्, अनागत- व्यवस्थानिदानमभावः प्रध्वंस इति च प्रध्वंसस्येति । मैवम् ; ज्ञानास्वप्रकाशतापक्षे स्वोपहितस्य स्वयं ग्रहणानुपपत्तेः कथं वर्तमा- नताग्रहः ? ज्ञानान्तरेण च तथाग्रहे वर्तमानतावभासाङ्गीकारे 'तदाऽसौ दृष्टो मये'ति प्रत्ययस्य 'तदाऽसौ मया दृश्यते' इत्याकारतापत्तिः । वह एक है । दो काल तो आपके मत में भी हैं नहीं। फिर उसी काल को उसी काल का अधिकरण मानें, तो आत्माश्रय हो जायगा । अतः यह भी लक्षण अयुक्त है । समर्थन—'ग्राहक-ज्ञान का विषय होकर ग्राहक-ज्ञान का आश्रय जो काल, वह वर्तमान है' यह वर्तमान का लक्षण हो सकता है । इसी तरह 'वर्तमान जो उपाधि ( सूर्यादि-क्रिया ), उसके प्रागभाव से अवच्छिन्न काल' अतीत है तथा 'वर्तमान उपाधि के ध्वंसाभाव से अवच्छिन्न काल' भविष्यत् है, ऐसे लक्षण कर सकते हैं । प्रागभाव तथा प्रध्वंसाभाव का जो स्वाभाविक भेद ( स्वरूपरूप विशेष ) है, उसको लेकर ही परस्पर भेद-व्यवस्था हो जायगी । प्रागभाव के स्वभावभूत विशेष के प्राग्व्यवस्थारूप कार्य का ग्रहण कर 'प्राग्व्यवस्था ( उपाधि की पूर्व अवस्था ) का हेतु जो अभाव, वह प्रागभाव है', यह लक्षण हो सकता है और अनागत व्यवस्था ( उपाधि की उत्तर अवस्था ) का कारण' ध्वंसाभाव है । खंडन—जो ज्ञान को स्वप्रकाश नहीं मानते, उनके मत में ज्ञानघटित उक्त लक्षण से उपहित वर्तमान काल का ग्रहण कैसे होगा ? यदि कहें कि अन्य ज्ञान से लक्षणघटक ज्ञान का ग्रहण होने से लक्षणयुक्त वर्तमान काल का भी अन्य ज्ञान से ही ग्रहण होगा, तो 'तदाऽसौ दृष्टो मया' इत्याकारक ज्ञान में 'तदाऽसौ दृश्यते' इस प्रकार वर्तमानाकारतापत्ति हो जायगी । कारण 'स्वग्राहक ज्ञान का विषय तथा स्वग्राहक ज्ञान का-आश्रय जो काल, तद्विषय पर देवदत्तरूप' उक्त वाक्यार्थ का उक्त अतीत ज्ञानस्थल में बाध नहीं है, किन्तु सम्भव ही है।

५२६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ चतुर्थ अत एव स्वप्रकाशपक्षेऽप्यनिस्तारः । यावानर्थः स्वप्रकाशे वर्तमानतयोक्त- स्तावत एव परेण ग्रहणे व्यभिचारात्, स्वप्रकाशतायाश्चाधिक्येऽपि विषये विशेषाभावात् । स्वरूपमेव विशेष इति चेन्न । तस्यानुगमाननुगमाभ्यामनुपपत्तेः । प्राक्प्रध्वंसा- भावयोश्च स्वरूपतोऽविशेषेऽपि कतरो भूतव्यवहारस्य कतरश्च अनागतव्यवहार- स्योपाधिरित्यनुयुक्ते कार्यभेदजनकत्या च तन्निरुक्तावुत्तरे पूर्वप्रत्युक्तां पूर्वता- परतानिरुक्तिं विना जन्यजनकत्वाज्ञानमिति । उपाधिभेदाच्च कालभेदे योऽप्येकतयाऽभिमतः कालः, सोऽपि चन्द्रसूर्यक्रिया- द्यसङ्ख्योपाधिभेदसम्भवेन नाना स्यात् । तत्रायमेवोपाधिर्नायमिति चाविनि- 'ज्ञान स्वप्रकाश है' इस मत में भी 'तदाऽसौ दृश्यते' यह आकार होने लगेगा । इसी दोष से वर्तमान का उक्त लक्षण अयुक्त है। कारण जो अर्थ स्वप्रकाश-मत में वर्तमानत्वरूप से उक्त है, उसी अर्थ का 'तदाऽसौ दृष्टः' इस स्थल में अन्य ज्ञान से भी ग्रहण है । 'जो काल स्वप्रकाश ज्ञान का आश्रय हो, वह वर्तमान है' इस प्रकार यदि लक्षण में स्वप्रकाश यह अधिक विशेषण दें, तब भी लक्ष्यभूत वर्तमानरूप विषयों में किसी विशेषण का लाभ नहीं होता । समर्थन—'स्वप्रकाश ज्ञान का ही विषय हो, अन्य का नहीं' इस प्रकार निवेश करने से लक्ष्य में भी विशेष हो जायगा । खंडन— ऐसा लक्षण करने पर लक्षणघटक 'स्व' शब्द से यदि चैत्रज्ञान का ग्रहण करें, तो मैत्रज्ञान में और मैत्रज्ञान का ग्रहण करें, तो चैत्रज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी। यदि लक्ष्यभेद से लक्षण का भेद मान लें, तो अनुगम दोष हो जायगा । किञ्च—प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव दोनों ही अभाव हैं, अतः इनके स्वरूप में तो कोई विशेष है नहीं। फिर 'कौन-सा अभाव भूत-व्यवहार का और कौन-सा अनागत व्यवहार का हेतु है' यह प्रश्न होने पर कार्यभेद (-प्रागवस्था, अनागत-अवस्था ) के जनकत्व से दोनों अभावों में भेद बतलाकर उक्त प्रकार से उत्तर हो नहीं सकता। कारण जबतक अतीतत्व का लक्षण न हो, तबतक कारण का लक्षण न होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा । किञ्च—उपाधि-भेद से वर्तमान आदि कालों के भेद की कल्पना करें, तो जो एक ही वर्तमान काल है, वह भी सूर्य, चन्द्र आदि की क्रियारूप उपाधियों के भिन्न भिन्न होने से अनेकरूप हो जायगा। सूर्य की क्रिया ही उपाधि है, चन्द्र की क्रिया नहीं,

परिच्छेद ] संशय-लक्षण का खण्डन ५२७ गम्यत्वात् । प्रतिक्षणस्वभावभेदादिपन्ते च नानाक्षणेषु वर्तमानत्वादिव्यवहारार्थ- मुपाध्यनुसरणावश्यम्भावेन उक्तोपाधिदोषग्रासस्यैवाऽऽपातादिति । संशय-लक्षण-खण्डनम् ननु तथापि तावद्विषयभेदेनावश्यं भवितव्यम्, प्रतीतिभेदस्य दुरपह्नवत्वात् । अतः सामान्यतः सिद्धौ विशेषतो विवेचनाशक्तौ भेदे संशय एवास्तामिति चेन्न । संशयस्यापि निर्वक्तुमशक्यत्वात् । तथाहि-- संशयस्य निश्चयात्किमुपाधिकृतो विशेषः, उत जातिकृतः ? आद्ये किं विषयविशेषेणोपाधिना, उत कारणविशेषेण, उतान्येनैव केन- चित्सम्बन्धिना कृतः ? न प्रथमः; तस्यानिर्वचनात् । उभयकोटिविषयः संशय इति चेन्न । कोटिद्वयसमुच्चयनिश्चयस्यापि संशयत्व- इसमें कुछ प्रमाण नहीं। इसी तरह जो बौद्ध प्रतिक्षण काल का स्वाभाविक भेद मानते हैं, उनके मत में भी अनेकक्षणसमूह में उपाधि-भेद के बिना वर्तमानादि-व्यवहार हो नहीं सकता । अतः सूर्यादिक्रियारूप उपाधि अवश्य माननी पड़ेगी और उसे मानने में पूर्वोक्त दोष स्पष्ट हैं । संशय-लक्षण का खण्डन समर्थन--वर्तमानादि प्रतीतियों ( 'वर्तते, वर्त्स्यति, अवर्तिष्ट' आदि प्रतीतियों) का भेद अनुभवसिद्ध होने से उनके विषय-भेदों का अपलाप नहीं किया जा सकता । प्रतीति निर्विषय तो हो नहीं सकती, अतः विषय का रहना निर्विवाद है । एवञ्च उस विषय का कालविशेष का लक्षण करना संभव न होने के कारण 'अयमसो' इस प्रकार विशेष-दर्शन असंभव होने से विशेषाग्रहणसहित सामान्यग्रहण काल-विषयक संशय उत्पन्न करता है । तथाच संशयीय एककोटि-प्रविष्टतया काल की सिद्धि हो ही जायगी । खण्डन--संदेह का लक्षण भी आप नहीं कर सकते । देखिये, संदेह में निश्चय से भेद क्या उपाधिकृत है या जातिकृत ? प्रथम पक्ष में विषयविशेष उपाधि है, कारणविशेष या अन्य ही कोई सम्बन्धी उपाधि है, जिससे संदेह में भेद है ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण विषयकृत निश्चय से संशय में भेद है, इसमें कोई प्रमाण नहीं । समर्थन--'एकधर्मी में उभयकोटियों का अवगाही ज्ञान संदेह है।' खंडन--एक