भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 549, कुल 610 में से

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पृष्ठ 549

परिच्छेद ] संशय-लक्षण का खण्डन ५२७ गम्यत्वात् । प्रतिक्षणस्वभावभेदादिपन्ते च नानाक्षणेषु वर्तमानत्वादिव्यवहारार्थ- मुपाध्यनुसरणावश्यम्भावेन उक्तोपाधिदोषग्रासस्यैवाऽऽपातादिति । संशय-लक्षण-खण्डनम् ननु तथापि तावद्विषयभेदेनावश्यं भवितव्यम्, प्रतीतिभेदस्य दुरपह्नवत्वात् । अतः सामान्यतः सिद्धौ विशेषतो विवेचनाशक्तौ भेदे संशय एवास्तामिति चेन्न । संशयस्यापि निर्वक्तुमशक्यत्वात् । तथाहि-- संशयस्य निश्चयात्किमुपाधिकृतो विशेषः, उत जातिकृतः ? आद्ये किं विषयविशेषेणोपाधिना, उत कारणविशेषेण, उतान्येनैव केन- चित्सम्बन्धिना कृतः ? न प्रथमः; तस्यानिर्वचनात् । उभयकोटिविषयः संशय इति चेन्न । कोटिद्वयसमुच्चयनिश्चयस्यापि संशयत्व- इसमें कुछ प्रमाण नहीं। इसी तरह जो बौद्ध प्रतिक्षण काल का स्वाभाविक भेद मानते हैं, उनके मत में भी अनेकक्षणसमूह में उपाधि-भेद के बिना वर्तमानादि-व्यवहार हो नहीं सकता । अतः सूर्यादिक्रियारूप उपाधि अवश्य माननी पड़ेगी और उसे मानने में पूर्वोक्त दोष स्पष्ट हैं । संशय-लक्षण का खण्डन समर्थन--वर्तमानादि प्रतीतियों ( 'वर्तते, वर्त्स्यति, अवर्तिष्ट' आदि प्रतीतियों) का भेद अनुभवसिद्ध होने से उनके विषय-भेदों का अपलाप नहीं किया जा सकता । प्रतीति निर्विषय तो हो नहीं सकती, अतः विषय का रहना निर्विवाद है । एवञ्च उस विषय का कालविशेष का लक्षण करना संभव न होने के कारण 'अयमसो' इस प्रकार विशेष-दर्शन असंभव होने से विशेषाग्रहणसहित सामान्यग्रहण काल-विषयक संशय उत्पन्न करता है । तथाच संशयीय एककोटि-प्रविष्टतया काल की सिद्धि हो ही जायगी । खण्डन--संदेह का लक्षण भी आप नहीं कर सकते । देखिये, संदेह में निश्चय से भेद क्या उपाधिकृत है या जातिकृत ? प्रथम पक्ष में विषयविशेष उपाधि है, कारणविशेष या अन्य ही कोई सम्बन्धी उपाधि है, जिससे संदेह में भेद है ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण विषयकृत निश्चय से संशय में भेद है, इसमें कोई प्रमाण नहीं । समर्थन--'एकधर्मी में उभयकोटियों का अवगाही ज्ञान संदेह है।' खंडन--एक

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