भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 548, कुल 610 में से

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पृष्ठ 548

५२६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ चतुर्थ अत एव स्वप्रकाशपक्षेऽप्यनिस्तारः । यावानर्थः स्वप्रकाशे वर्तमानतयोक्त- स्तावत एव परेण ग्रहणे व्यभिचारात्, स्वप्रकाशतायाश्चाधिक्येऽपि विषये विशेषाभावात् । स्वरूपमेव विशेष इति चेन्न । तस्यानुगमाननुगमाभ्यामनुपपत्तेः । प्राक्प्रध्वंसा- भावयोश्च स्वरूपतोऽविशेषेऽपि कतरो भूतव्यवहारस्य कतरश्च अनागतव्यवहार- स्योपाधिरित्यनुयुक्ते कार्यभेदजनकत्या च तन्निरुक्तावुत्तरे पूर्वप्रत्युक्तां पूर्वता- परतानिरुक्तिं विना जन्यजनकत्वाज्ञानमिति । उपाधिभेदाच्च कालभेदे योऽप्येकतयाऽभिमतः कालः, सोऽपि चन्द्रसूर्यक्रिया- द्यसङ्ख्योपाधिभेदसम्भवेन नाना स्यात् । तत्रायमेवोपाधिर्नायमिति चाविनि- 'ज्ञान स्वप्रकाश है' इस मत में भी 'तदाऽसौ दृश्यते' यह आकार होने लगेगा । इसी दोष से वर्तमान का उक्त लक्षण अयुक्त है। कारण जो अर्थ स्वप्रकाश-मत में वर्तमानत्वरूप से उक्त है, उसी अर्थ का 'तदाऽसौ दृष्टः' इस स्थल में अन्य ज्ञान से भी ग्रहण है । 'जो काल स्वप्रकाश ज्ञान का आश्रय हो, वह वर्तमान है' इस प्रकार यदि लक्षण में स्वप्रकाश यह अधिक विशेषण दें, तब भी लक्ष्यभूत वर्तमानरूप विषयों में किसी विशेषण का लाभ नहीं होता । समर्थन—'स्वप्रकाश ज्ञान का ही विषय हो, अन्य का नहीं' इस प्रकार निवेश करने से लक्ष्य में भी विशेष हो जायगा । खंडन— ऐसा लक्षण करने पर लक्षणघटक 'स्व' शब्द से यदि चैत्रज्ञान का ग्रहण करें, तो मैत्रज्ञान में और मैत्रज्ञान का ग्रहण करें, तो चैत्रज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी। यदि लक्ष्यभेद से लक्षण का भेद मान लें, तो अनुगम दोष हो जायगा । किञ्च—प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव दोनों ही अभाव हैं, अतः इनके स्वरूप में तो कोई विशेष है नहीं। फिर 'कौन-सा अभाव भूत-व्यवहार का और कौन-सा अनागत व्यवहार का हेतु है' यह प्रश्न होने पर कार्यभेद (-प्रागवस्था, अनागत-अवस्था ) के जनकत्व से दोनों अभावों में भेद बतलाकर उक्त प्रकार से उत्तर हो नहीं सकता। कारण जबतक अतीतत्व का लक्षण न हो, तबतक कारण का लक्षण न होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा । किञ्च—उपाधि-भेद से वर्तमान आदि कालों के भेद की कल्पना करें, तो जो एक ही वर्तमान काल है, वह भी सूर्य, चन्द्र आदि की क्रियारूप उपाधियों के भिन्न भिन्न होने से अनेकरूप हो जायगा। सूर्य की क्रिया ही उपाधि है, चन्द्र की क्रिया नहीं,

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