भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 547

परिच्छेद ] वर्तमानत्वादि-लक्षणों का खण्डन ५२५ श्रयतया निरूपणसम्भवात्कालान्तरस्यानभ्युपगमात् , तस्यैव कालस्य तदाश्रय- वत्त्वे व्यक्तमात्माश्रयत्वापत्तेः । स्यादेतत्—ग्राहकविज्ञानविषयो ग्राहकविज्ञानाश्रयश्च कालो वर्तमानः, वर्तमानोपाधिप्रागभावावच्छिन्नश्च पूर्वः, तत्प्रध्वंसाभावावच्छिन्नश्चानागतः । प्रागभावप्रध्वंसयोश्च स्वाभाविकमेव भेदमादाय व्यवस्था । प्राग्व्यवस्थाहेतुरभावः प्रागभाव इति स्वभावभूतस्यैव विशेषस्य कार्यमादाय लक्षणम्, अनागत- व्यवस्थानिदानमभावः प्रध्वंस इति च प्रध्वंसस्येति । मैवम् ; ज्ञानास्वप्रकाशतापक्षे स्वोपहितस्य स्वयं ग्रहणानुपपत्तेः कथं वर्तमा- नताग्रहः ? ज्ञानान्तरेण च तथाग्रहे वर्तमानतावभासाङ्गीकारे 'तदाऽसौ दृष्टो मये'ति प्रत्ययस्य 'तदाऽसौ मया दृश्यते' इत्याकारतापत्तिः । वह एक है । दो काल तो आपके मत में भी हैं नहीं। फिर उसी काल को उसी काल का अधिकरण मानें, तो आत्माश्रय हो जायगा । अतः यह भी लक्षण अयुक्त है । समर्थन—'ग्राहक-ज्ञान का विषय होकर ग्राहक-ज्ञान का आश्रय जो काल, वह वर्तमान है' यह वर्तमान का लक्षण हो सकता है । इसी तरह 'वर्तमान जो उपाधि ( सूर्यादि-क्रिया ), उसके प्रागभाव से अवच्छिन्न काल' अतीत है तथा 'वर्तमान उपाधि के ध्वंसाभाव से अवच्छिन्न काल' भविष्यत् है, ऐसे लक्षण कर सकते हैं । प्रागभाव तथा प्रध्वंसाभाव का जो स्वाभाविक भेद ( स्वरूपरूप विशेष ) है, उसको लेकर ही परस्पर भेद-व्यवस्था हो जायगी । प्रागभाव के स्वभावभूत विशेष के प्राग्व्यवस्थारूप कार्य का ग्रहण कर 'प्राग्व्यवस्था ( उपाधि की पूर्व अवस्था ) का हेतु जो अभाव, वह प्रागभाव है', यह लक्षण हो सकता है और अनागत व्यवस्था ( उपाधि की उत्तर अवस्था ) का कारण' ध्वंसाभाव है । खंडन—जो ज्ञान को स्वप्रकाश नहीं मानते, उनके मत में ज्ञानघटित उक्त लक्षण से उपहित वर्तमान काल का ग्रहण कैसे होगा ? यदि कहें कि अन्य ज्ञान से लक्षणघटक ज्ञान का ग्रहण होने से लक्षणयुक्त वर्तमान काल का भी अन्य ज्ञान से ही ग्रहण होगा, तो 'तदाऽसौ दृष्टो मया' इत्याकारक ज्ञान में 'तदाऽसौ दृश्यते' इस प्रकार वर्तमानाकारतापत्ति हो जायगी । कारण 'स्वग्राहक ज्ञान का विषय तथा स्वग्राहक ज्ञान का-आश्रय जो काल, तद्विषय पर देवदत्तरूप' उक्त वाक्यार्थ का उक्त अतीत ज्ञानस्थल में बाध नहीं है, किन्तु सम्भव ही है।